virag bhawna
विराग - भावना (छन्द-जोगीरासा)
sung by- Bindu Jain, Delhi.
बिजली जैसी जीवन-लीला, चमके और नशावे,
पुत्र-जनम तो होय सवेरे, साँझ चिता जल जावे॥1॥
बोलो जय हो जय हो जय -2
अमर नहीं कोई धरती पर, मरते कौन बचावे,
मन्त्र-तन्त्र कुछ काम न आवे, मरण घड़ी जब आवे।
निर्बल हो या वीरबली हो, कालबली ले जावे,
हाथी पर जाने वाला भी, अर्थी पर आ जावे॥2॥ बोलो जय हो....
तन पिंजरे से प्राण पखेरू, जब बाहर उड़ जावे,
घरवाली द्वारे तक जावे, बेटा अग्नि लगावे।
रोने वाले रोते जावें, जाने वाला जावे,
सुन्दर काया भी मरघट में, राख-राख हो जावे॥3॥बोलो जय हो....
कोई दौलत और हुकूमत, पा करके इतरावे,
यौवन बल सुन्दरता में हो, कोई फूला जावे।
शब्दों का अभिमानी कोई, औरों को समझावे,
चंद दिनों का ठाठ मुसाफिर, फिर डेरा उठ जावे॥4॥बोलो जय हो....
आशा पल-पल बढ़ती जावे, आयु घटती जावे।
काया निशिदिन जर्जर होवे, माया बढ़ती जावे।
आज सरीखा मंगल अवसर, कल आवे ना आवे,
किधर जिन्दगी के किस डग पर, क्या घटना घट जावे॥5॥बोलो जय हो....
कल-कल की कलकल में प्राणी, निजकल्याण भुलावे,
आज और कल में कोई भी, मेल नजर ना आवे।
इच्छाओं का छोर न दीखे, दुनिया तनिक दिखावे,
लाखों सरिताएँ सागर को, तृप्त नहीं कर पावे॥6॥बोलो जय हो....
मन की आशा का होनी से, क्या सम्बन्ध कहावे,
जाने वाला जीवन पावे, जीने वाला जावे।
खाली दीपक ज्योति जगावे, और भरा बुझ जावे,
जग को जिसकी होय न आशा, मौत उसे ले जावे॥7॥बोलो जय हो....
यह जीवन घाटे का सौदा, कौन किसे समझावे।
जीने की तैयारी में ही, सारा जीवन जावे।
अपनी बरबादी पर नर को, आखिर रोना आवे।
मरने को जनमे यह प्राणी, जनम हेतु मर जावे॥8॥बोलो जय हो....
आप अकेला आवे प्राणी, आप अकेला जावे।
ना कछु लावे ना ले जावे, तो भी मन भरमावे।
करनी का परिणाम जगत में आप अकेला पावे।
आप अकेला बैरागी बन, मोक्ष महापद पावे॥9॥बोलो जय हो....
खुशियों में है साथ सभी का, संकट कौन उठावे।
विपदाओं में संगी-साथी, ढूंढत नाहीं दिखावे।
अपने भी तब होंय पराये, जब आफत सर छावे।
मतलब का है प्रेम सभी का, किसका कौन कहावे?॥10॥बोलो जय हो....
नश्वर काया की सेवा में, जन्म वृथा हो जावे।
तन का नित शृंगार करे पर, मन मैला रह जावे।
जन्म धरत ही शोर मचावे, मरतहिं सूतक छावे।
माटी की यह काया आखिर, माटी में मिल जावे॥11॥बोलो जय हो....
नर काया से नर चाहे तो, नरभव सफल बनावे।
ना चाहे तो पाप कमाकर, दुर्गतियों में जावे।
जिनकी खातिर पाप करे नर, वे आखिर ठुकरावे।
कौन कहाँ तक होय सगा जब, देह दगा दे जावे॥12॥बोलो जय हो....
बड़भागी आत्महित चाहे, जड़ को जड़ ही भावे।
बचपन में हित-अहित न जाने, यौवन मौज मनावे।
प्रौढ़ दशा बीते तृष्णा में, फिर बूढ़ापन आवे।
यूँ ही दुर्लभ जन्म गंवा कर, अर्धमृतक पछतावे॥13॥बोलो जय हो....
पुण्य उदय में पापी को भी, कोई आँच न आवे,
पापों का जब पाक पके तब, दुःख में गोता खावे।
विश्वविजेता बीमारी से, अन्त समय दुःख पावे,
मुख पर बैठी माखी गामा, हाय! उड़ा ना पावे ॥14॥बोलो जय हो....
दुनिया के इस नाटक-घर में, कितने खेल दिखावे,
जन्म धरे जब रोवे बालक, मात-पिता हर्षावे।
माँ से दूर चले जब कन्या, अंखियाँ छलकत जावे,
निज संतान भखे कुतिया, जब भूख सही ना जावे ॥15॥बोलो जय हो....
सबकी प्यास बुझाने वाला, प्यासा ही मर जावे,
लाखों का मालिक भी जग में, भिखमंगा हो जावे।
आज यहाँ तो हँसता गाता, कल रोवे चिल्लावे,
यह संसार महादुःखदायी, जो बोवे सो पावे ॥16॥बोलो जय हो....
कर्मन की गति न्यारी जग में, मन की समझ न आवे,
राज्यतिलक की मंगल बेला, राम सिया बन जावे।
पूनम और अमावस जैसे, सुख-दुःख आवे जावे,
समय खिलावे खेल निराले, सबको नाच नचावे ॥17॥बोलो जय हो....
चार दिनों की सुखद चाँदनी, फिर अँधियारी छावे,
कौन कहाँ से आकर जन्मा, मौत कहाँ ले जावे।
अपनी संपद मान धरा को, लाखों आवे जावे,
मुट्ठी बांध जगत में आवे, हाथ पसारे जावे ॥18॥बोलो जय हो....
पल भर के सब रिश्ते नाते, पल भर में मिट जावे,
कल के साथी आज न दीखें, सुधियाँ भर रह जावे।
मिलन विरह की रीत पुरानी, कोई टाल न पावे।
जरत्कुंवर के बाण लगे से, नारायण सो जावे ॥19॥बोलो जय हो....
जिनके एक इशारे में ही, बलशाली थर्रावें,
जिनके पैरों की ठोकर से, पर्वत भी गिर जावे।
कालबली के सन्मुख वे भी, नतमस्तक हो जावें,
यम से टकराने वाला तब, कौन कहाँ से आवे ॥20॥बोलो जय हो....
जीवन का यह उज्ज्वल दीपक, पल-पल बुझता जावे,
मानव मन के महल बनावे, तन कुटिया गिर जावे।
बचपन हँसता रोये जवानी, मौत रहम न खावे,
चेतन दूजी काया धारे, पहली मरघट जावे ॥21॥बोलो जय हो....
आवे जब मदहोश जवानी, एक नशा छा जावे,
भोलापन तब रंच न दीखे, कोई क्या समझावे।
ऐसी मस्ती देख युवक की, कालबली मुस्कावे,
अपनी ही सुंदर काया में, वह कीड़ा हो जावे ॥22॥बोलो जय हो....
अन्तसमय की गोदी में आ, हर कोई सो जावे,
भाग्य-भरोसे साँसें चाले, एक दिवस थम जावे।
इस जीवन की अंतिम बेला, जाने कब आ जावे,
दूल्हे राजा को भी आकर, मौत उठा ले जावे ॥22॥बोलो जय हो....
जिस मुख से प्रभु नाम जपे नर, उसमें क्या-क्या जावे,
शास्त्र अनेकों पढ़कर के भी, जीवन ना पढ़ पावे।
अंतिम घड़ियों में प्रभु सुमिरन, विरला ही कर पावे,
इक तरुवर से दूजे पर फिर, पंछी वास बसावे ॥23॥बोलो जय हो....
जो दिन बीत गया जीवन का, वो फिर से ना आवे,
प्रातः जो कलियाँ मुस्कावें, संध्या को मुरझावें।
जाने की बेला में प्राणी, हाहाकार मचावे,
जन्मतिथि ही पुण्यतिथि बन, मरघट में पहुँचावे ॥24॥बोलो जय हो....
मानवपन के हीरे को नर, काँच समझ ठुकरावे,
संयम-पुष्प बिना जीवन-तरु, कैसे शोभा पावे?
क्या खोया क्या पाया अब तक, कोई सोच न पावे,
इस दुर्लभ नर-भव को प्राणी, जाने फिर कब पावे ॥25॥बोलो जय हो....
ज्यों पंछी दर्पण से जूझे, और स्वयं थक जावे,
भौतिक सुख के पीछे मानव, त्यों ही दुःख उठावे।
चन्दा-सूरज आवे जावे, और उमर ढल जावे,
आँख खोलकर भी अज्ञानी, सोया ही रह जावे ॥26॥बोलो जय हो....
खुशियों के सपने संजो कर, मानव मन बहलावे,
पुण्यकर्मफल मन को भावे, तो भी पाप कमावे।
अपकर्मों में ही यह सारा, जीवन बीता जावे।
काल बिताने वाले को भी, आखिर काल बितावे ।।27।।बोलो जय हो....
प्राणों से भी प्यारी काया, कब तक साथ निभावे,
हर संयोग वियोगमयी है, भोग रोग उपजावे।
जिसको नर अपना माने वह, सपना ही कहलावे,
मरघट तक जावे सम्बन्धी, आगे साथ न जावे ।।28।।बोलो जय हो....
देख स्वयं की अन्तिम हालत, मन को रोना आवे,
जर्जर काया से कैसे तब, कोई धर्म कमावे।
अब तक कितने देह धरे हैं, गिनती कौन गिनावे।
तृष्णा-दाह विषय-ईंधन से, कब कैसे बुझ पावे ।।29।।बोलो जय हो....
भव-भव की पीड़ा के आँसू, कोई पार न पावे,
दुर्घटना अरु अपघातों की, संख्या कौन बतावे ।
माताओं के नयन-सलिल का, कौन हिसाब लगावे,
उनके दुग्धपान के सम्मुख, सागर तनिक दिखावे ।।30।।बोलो जय हो....
तन-मन-धन की चिन्ताओं में, मानव चैन न पावे,
सुख-आभासों के पीछे ही, काल गंवाता जावे।
जानबूझ कर अनजाना बन, अपनी धुन में जावे,
एक दिवस यह गाफिल निद्रा, चिरनिद्रा बन जावे।।31।।बोलो जय हो....
नित्य चिंतन
मैं हूँ कौन? कहाँ से आया? किस द्वार पर है जाना?
इस दुनिया में क्या है मेरा? साथ किसे ले जाना।
क्या खोया क्या पाया अब तक? क्या मुझको है पाना?
कैसा है मम रूप सलोना? कब शिव को है जाना? ।।
घड़ी का उपदेश
होने वाली घड़ी को कौन लौटा पायेगा?
इस धरा का इस धरा पर, सब धरा रह जायेगा।
जिन्दगी भर का कमाया, साथ में क्या जायेगा?
यह सुअवसर खो दिया तो अन्त में पछतायेगा।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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