छहढाला(28)
अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत
छहढाला(28)
छन्द १४ ( उत्तरार्द्ध )
छह अनायतन तथा तीन मूढ़ता दोष
कुगुरु - कुदेव - कुवृष सेवन की नहिं प्रशंस उचरैं है;
जिनमुनि जिनश्रुत बिन कुगुरादिक, तिन्हें न नमन करै है ॥ १४ ॥
अन्वयार्थः- सम्यग्दृष्टि जीव (कुगुरु-कुदेव-कुधर्म सेवन की) कुगुरु, कुदेव और कुधर्म सेवन की (प्रशंसे) प्रशंसा (नहिं उबरै है) नहीं करता। (जिन) जिनेन्द्रदेव (मुनि) वीतरागी मुनि और (जिनश्रुत) जिनवाणी (बिन) के अतिरिक्त (जो) (कुगुरादि) कुगुरु, कुदेव, कुधर्म हैं (तिन्हें) उन्हें (नमन) नमस्कार (न करें है) नहीं करता।
भावार्थः - कुगुरु, कुदेव, कुधर्म; कुगुरु सेवक, कुदेव सेवक तथा कुधर्म सेवक - यह छह अनायतन (धर्म के अस्थान) दोष कहलाते हैं। उनकी भक्ति, विनय और पूजनादि तो दूर रही, सम्यग्दृष्टि जीव उनकी प्रशंसा भी नहीं करता; क्योंकि उनकी प्रशंसा करने से भी सम्यक्त्व में दोष लगता है। सम्यग्दृष्टि जीव जिनेन्द्रदेव, वीतरागी मुनि और जिनवाणी के अतिरिक्त कुदेव, और कुशास्त्रादि को (भय, आशा, लोभ और स्नेह आदि के कारण भी) नमस्कार नहीं करता, क्योंकि उन्हें नमस्कार करने मात्र से भी सम्यक्त्व दूषित हो जाता है। कुगुरु-सेवा, कुदेव-सेवा तथा कुधर्म-सेवा, ये तीन भी सम्यक्त्व के मूढ़ता नामक दोष हैं। १४।
अव्रती सम्यग्दृष्टि की देवों द्वारा पूजा और गृहस्थपने में अप्रीति
दोषरहित गुणसहित सुधी जे, सम्यगदरश सजै हैं
चरितमोहवश लेश न संजम, पै सुरनाथ जजै हैं ।
गेही, पै गृह में न रचैं ज्यों, जलतैं भिन्न कमल है;
नगरनारि कौ प्यार यथा, कादे में हेम अमल है ।। १५ ।।
अन्वयार्थ :- (जे) जो ( सुधी ) बुद्धिमान पुरुष ऊपर कहे हुए (दोष रहित) पच्चीस दोष रहित तथा (गुणसहित) निःशंकादि आठ गुणों सहित (सम्यग्दरश) सम्यग्दर्शन से (सजें हैं) भूषित हैं, उन्हें (चरितमोहवश) अप्रत्याख्यानावरणीय चारित्रमोहनीय कर्म के उदय वश (लेश) किंचित् भी (संजम) संयम (न) नहीं है, (पे) तथापि (सुरनाथ) देवों के स्वामी इन्द्र उनकी (जजैं हैं) पूजा करते हैं; यद्यपि वे (गेहो) गृहस्थ हैं (पे) तथापि (गृहमें) घर में (न रचें) नहीं राचते। (ज्यों) जिस प्रकार (कमल) कमल (जलतैं) जल से (भिन्न) भिन्न है, तथा (यथा) जिस प्रकार (कादेमें) कीचड़ में (हेम) सुवर्ण (अमल है) शुद्ध रहता है, उसी प्रकार उनका घर में (नगरनारिकौ) वेश्या के (प्यार यथा) प्रेम की भांति (प्यार) प्रेम होता है।
भावार्थः- जो विवेकी पच्चीस दोष रहित तथा आठ अंग (आठ गुण) सहित सम्यग्दर्शन धारण करते हैं, उन्हें अप्रत्याख्यानावरणीय कषाय के तीव्र उदय में युक्त होने के कारण, यद्यपि संयमभाव लेशमात्र नहीं होता; तथापि इन्द्रादि उनकी पूजा (आदर) करते हैं। जिस प्रकार पानी में रहने पर भी कमल पानी से अलिप्त रहता है, उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि घर में रहते हुए भी गृहस्थदशा में लिप्त नहीं होता, उदासीन (निर्मोह) रहता है। जिस प्रकार वेश्या का प्रेम मात्र पैसे से ही होता है, मनुष्य पर नहीं होता; उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि का प्रेम सम्यक्त्व में ही होता है, किन्तु गृहस्थपने में नहीं होता तथा जिस प्रकार सोना कीचड़ में पड़े रहने पर भी निर्मल रहता है, उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि जीव गृहस्थदशा में रहने पर भी उसमें लिप्त नहीं होता, क्योंकि वह उसे त्याज्य (त्यागने योग्य) मानता है।
यहाँ वेश्या के प्रेम से मात्र अलिप्तता की तुलना की गई है। रोगी का औषधि सेवन और बन्दी का कारागृह भी इसके दृष्टान्त हैं।
1 - क्या सम्यक् दृष्टि जीव कुदेव, कुगुरु, कुधर्म की प्रशंसा करता है? (नहीं)
2 - सम्यक् दृष्टि जीव किस की प्रशंसा करता है? (जिन, जिनमुनि, जिन श्रुत की)
3 - कुगुरु-सेवा, कुदेव-सेवा तथा कुधर्म-सेवा, ये तीन सम्यक्त्व के कैसे दोष हैं? (मूढ़ता नामक दोष)
4 - क्या विवेकी सम्यग्दर्शन धारण करने वाले असंयमी लोग इन्द्रादि द्वारा पूजे जाते हैं? (नहीं)
5 - जो गृहस्थ घर में रह कर भी घर से ममत्व नहीं रखते, उसे क्या कहते हैं? (सम्यक् दृष्टि)
6 - गृहस्थ सम्यग्दृष्टि की तुलना किस से की जाती है? (कमल के फूल से)
7 - क्या सम्यग्दृष्टि कुदेव, कुगुरु, कुधर्म की प्रषंसा करता है? (नहीं)
8 - सम्यग्दृष्टि का गृहस्थ से प्रेम किस के समान माना जाता है? (वेश्या के समान)
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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