छहढाला(29)
अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत
छहढाला(29)
सम्यक्त्व की महिमा, सम्यग्दृष्टि के अनुत्पत्ति स्थान तथा सर्वोत्तम सुख और सर्व धर्म का मूल
प्रथम नरक बिन षट् भू ज्योतिष वान भवन षंड नारी;
थावर विकलत्रय पशुमें नहिं, उपजत सम्यक् चारी ।
तीनलोक तिहुँकाल माँहि नहिं, दर्शन सो सुखकारी;
सकल धर्मको मूल यही, इस बिन करनी दुखकारी ॥ १६ ॥
अन्वयार्थ : (सम्यग्दृष्टि) सम्यग्दृष्टि जीव (प्रथम नरक बिन) पहले नरक के अतिरिक्त (षट् भू) शेष छह नरकों में (ज्योतिष) ज्योतिषी देवों में, (वान) व्यन्तर देवों में, (भवन) भवनवासी देवों में (षंड) नपुंसकों में, (नारी) स्त्रियों में, (थावर) पाँच स्थावरों में, (विकलत्रय) द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय जीवों में तथा (पशुमें) कर्मभूमि के पशुओं में (नहि उपजत) उत्पन्न नहीं होते। (तीनलोक) तीनलोक (तिहुँकाल) तीनकाल में (दर्शन सो) सम्यग्दर्शन के समान (सुखकारी) सुखदायक (नहि) अन्य कुछ नहीं है, (यही) यह सम्यग्दर्शन ही (सकल धरमको) समस्त धर्मों का (मूल) मूल है; (इस बिन) इस सम्यग्दर्शन के बिना (करनी) समस्त क्रियाएँ (दुखकारी) दुःखदायक हैं।
भावार्थः सम्यग्दृष्टि जीव आयु पूर्ण होने पर जब मृत्यु प्राप्त करते हैं, तब दूसरे से सातवें नरक के नारकी, ज्योतिषी, व्यन्तर, भवन-वासी, नपुंसक, सब प्रकार की स्त्री, एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और कर्मभूमि के पशु नहीं होते; नीच कुल वाले, विकृत अङ्गवाले, अल्पायु वाले तथा दरिद्री नहीं होते। विमानवासी देव, भोगभूमि के मनुष्य अथवा तिर्यंच ही होते हैं। कर्मभूमि के तिर्यंच भी नहीं होते। कदाचित नरक में जायें तो पहले नरक से नीचे नहीं जाते। तीन लोक और तीनकाल में सम्यग्दर्शन के समान सुखदायक अन्य कोई वस्तु नहीं है। यह सम्यग्दर्शन ही सर्व धर्मो का मूल है। इसके अतिरिक्त जितने क्रियाकाण्ड हैं, वे दुःखदायक हैं।
ऐसी दशा में सम्यग्दृष्टि प्रथम नरक के नपुंसकों में भी उत्पन्न होता है; उनसे भिन्न अन्य नपुंसकों में उसकी उत्पत्ति होने का निषेध है।
टिप्पणीः जिस प्रकार श्रेणिक राजा सातवें नरक की आयु का बन्ध करके फिर सम्यक्त्व को प्राप्त हुए थे, उससे यद्यपि उन्हें नरक में तो जाना ही पड़ा, किन्तु आयु सातवें नरक से घटकर पहले नरक की ही रही । इस प्रकार जो जीव सम्यग्दर्शन प्राप्त करने से पूर्व तिर्यंच अथवा मनुष्य आयु का बन्ध करते हैं, वे भोगभूमि में जाते हैं, किन्तु कर्मभूमि में तिर्यंच अथवा मनुष्यरूप में उत्पन्न नहीं होते।
1 - सम्यग्दृष्टि जीव का जन्म कौन-से नरक में नहीं होता? (दूसरे से 7वें नरक में)
2 - सम्यग्दृष्टि जीव का जन्म किस देवयोनि में नहीं होता? (ज्योतिष, व्यन्तर और भवनवासी -इन तीनों देवयोनियों में)
3 -सम्यग्दृष्टि जीव का जन्म मध्य लोक में किस योनि में नहीं होता? (नपुंसक, सब प्रकार की स्त्री, एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और कर्मभूमि के पशु योनि में)
4 - सम्यग्दृष्टि जीव का जन्म किस कुल में नहीं होता? (नीच कुल में)
5- सम्यग्दृष्टि जीव कैसे नहीं होते? (विकृत अंग वाले, अल्पायु वाले, दरिद्री)
6 - सम्यग्दृष्टि जीव का जन्म किस योनि में होता है? (वैमानिक देवों में, भोगभूमि के मनुष्यों में, भोगभूमि के तिर्यचों में)
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
विनम्र निवेदन
यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।
धन्यवाद

Comments
Post a Comment