छहढाला(30)

अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत

छहढाला(30)

 

  सम्यग्दर्शन के बिना ज्ञान और चारित्र का मिथ्यापना

मोक्षमहलकी प्रथम सीढ़ी, या बिन ज्ञान चरित्रा;

सम्यक्ता न लहै, सो दर्शन, धारो भव्य पवित्रा ।

“दौल” समझ सुन चेत सयाने, काल वृथा मत खोवै;

यह नरभव फिर मिलन कठिन है, जो सम्यक् नहिं होवै ॥ १७ ॥

अन्वयार्थः यह सम्यग्दर्शन (मोक्षमहलको) मोक्षरूपी महल की (प्रथम) प्रथम (सीढ़ी) सीढ़ी है; (या बिन) इस सम्यग्दर्शन के बिना (ज्ञान चरित्रा) ज्ञान और चारित्र (सम्यक्ता) सच्चाई (न लहै) प्राप्त नहीं करते; इसलिये (भव्य) हे भव्य जीवों! (सो) ऐसे (पवित्रा) पवित्र (दर्शन) सम्यग्दर्शन को (धारो) धारण करो। (सयाने दौल) हे समझदार दौलतराम! (सुन) सुन, (समझ) समझ और (चेत) सावधान हो, (काल) समय को (वृथा) व्यर्थ (मत खोवै) न गँवा; क्योंकि (जो) यदि (सम्यक्) सम्यग्दर्शन (नहिं होवै) नहीं हुआ, तो (यह) यह (नर भव) मनुष्य पर्याय (फिर) पुनः (मिलन) मिलना, (कठिन है) दुर्लभ है।

भावार्थः- यह सम्यग्दर्शन ही मोक्षरूपी महल में पहुँचने की प्रथम सीढ़ी है। इसके बिना ज्ञान और चारित्र सम्यक्त्वपने को प्राप्त नहीं होते अर्थात् जब तक सम्यग्दर्शन न हो तब तक ज्ञान - वह मिथ्याज्ञान और चारित्र - वह मिथ्याचारित्र कहलाता है, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यकचारित्र नहीं कहलाते। इसलिये प्रत्येक आत्मार्थी को ऐसा पवित्र सम्यग्दर्शन अवश्य धारण करना चाहिये। 

पण्डित दौलतराम जी अपने आत्मा को सम्बोध कर कहते हैं कि - हे विवेकी आत्मा! तू ऐसे पवित्र सम्यग्दर्शन के स्वरूप को स्वयं सुनकर अन्य अनुभवी ज्ञानियों से प्राप्त करन ेमें सावधान हो; अपने अमूल्य मनुष्य जीवन को व्यर्थ न गँवा! इस जन्म में ही यदि सम्यक्त्व प्राप्त न किया तो फिर मनुष्य पर्याय आदि अच्छे योग पुनः पुनः प्राप्त नहीं होते । १७।

सम्यग्दृष्टि जीव की, निश्चय कुगति न होय।

पूर्वबन्ध तें होय तो सम्यक् दोष न कोय॥

1 - मोक्षमहल की प्रथम सीढ़ी कौन-सी है? (सम्यग्दर्शन)

2 - सम्यक् ज्ञान व सम्यक् चारित्र किसके बिना प्राप्त नहीं किया जा सकता? (सम्यग्दर्शन के बिना)  

3 - सम्यग्दर्शन के बिना प्राप्त किया गया ज्ञान व चारित्र कैसा कहलाता है? (मिथ्या ज्ञान व मिथ्या चारित्र)

4 - प्रत्येक आत्मार्थी को क्या धारण करना चाहिए? (पवित्र सम्यग्दर्शन) 

5 - पण्डित दौलतराम जी अपनी आत्मा को क्या सम्बोधन करते हैं? (विवेकी आत्मा)

6 - हमें व्यर्थ क्या नहीं गंवाना चाहिए? (अमूल्य मनुष्य जीवन को)

7- हमें किसका योग पुनः प्राप्त नहीं होता?  (अमूल्य मनुष्य जीवन का)

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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