परिग्रह

प्रश्न- परिग्रह किसे कहते हैं और यह कितने प्रकार का होता है? यह मोक्ष मार्ग में

बाधक क्यों बनता है?

उत्तर- 1. आवश्यकता से अधिक वस्तुओं के संग्रह को परिग्रह कहते हैं।

2. वस्तुओं का संग्रह अधिक न होने पर भी उनको इकट्ठा करने की वांछा होना भी परिग्रह कहलाता है।

3. समस्त पापों का मूल कारण परिग्रह है।

 परिग्रह दो प्रकार का होता है- बहिरंग व अंतरंग।

 बहिरंग परिग्रह 10 प्रकार का होता है।

1. क्षेत्र (खेत)

2. वास्तु (मकान, दुकान आदि)

3. सुवर्ण (सोना)

4. हिरण्य (चांदी)

5. धन (रुपया, पैसा, गाय, भैंस आदि)

6. धान्य (अनाज आदि)

7. दासी (नौकरानी)

8. दास (नौकर)

9. कुप्य (वस्त्र आदि)

10. भाण्ड (बर्तन आदि)

यदि इस परिग्रह की सीमा निश्चित कर ली जाए तो हम इस Luggage के अतिरिक्त भार से बच सकते हैं।

 अंतरंग परिग्रह 14 प्रकार का होता है।

1. मिथ्यात्व (सच्चे देव, गुरु, शास्त्र पर श्रद्धा न करना)

2. वेद (सुख व दुःख का वेदन करना अर्थात् अनुभव करना) 

3. राग

4. द्वेष

5. क्रोध

6. मान

7. माया (छल कपट)

8. लोभ

9. हास्य

10. रति 

11. अरति

12. शोक

13. भय

14. जुगुप्सा (घृणा)

जिसके मन में अंतरंग परिग्रह का अभाव होता है, उसे बाह्य परिग्रह में ममत्व भाव नहीं होता।

आचार्य अनुभव सागर महाराज द्वारा दिए गए एक दृष्टांत के अनुसार-

मान लो एक स्वच्छ दर्पण पर थोड़ा सा तेल लगा हुआ है।  जब हवा में रहने वाले धूल के कणों का स्पर्श उस तेल के साथ होता है तो वे उस पर चिपक जाते हैं और उस दर्पण को मैला कर देते हैं।

हमारी आत्मा स्वच्छ दर्पण के समान है। तेल है परिग्रह में ममत्व भाव। उसी ममत्व भाव के कारण कर्म मल आत्मा के साथ चिपक कर उसे मैला कर देते है। धूल कणों का आना कर्म का आस्रव है। दर्पण से चिपक जाना कर्म बन्ध है।

सबसे पहले हमें कर्म मल को आने से रोकना है। उसे संवर कहते हैं। फिर दर्पण को साफ करना है अर्थात् परिग्रह में अपनेपन की भावना को समाप्त करना है। उसे निर्जरा कहते हैं।

जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष। इन सात तत्वों का श्रद्धान ही मोक्ष का मार्ग है।

।।ओऽम् श्री महावीराय नमः।।

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