भक्तामर : अंतस्तल का स्पर्श (श्लोक 14 - गुणों का भण्डार)
भक्तामर : अंतस्तल का स्पर्श
श्लोक 14. गुणों का भण्डार
सम्पूर्ण- मण्डल-शशांक-कला-कलाप
शुभ्रा गुणास्-त्रि-भुवनं तव लंघयन्ति ।
ये संश्रितास्-त्रि-जगदीश्वरनाथ-मेकं,
कस्तान् निवारयति सञ्चरतो यथेष्टम् ॥14॥
सम्पूर्ण मण्डल शशांक - सम्पूर्ण चन्द्रमा के बिम्ब की
कला-कलाप - कलाओं के समूह के समान
शुभ्राः - स्वच्छ
गुणाः - गुण
त्रि-भुवनम् - तीनों लोकों को
तव - आपके
लंघयन्ति - लांघ रहे हैं/ फैल रहे हैं
ये - जो
संश्रिताः - आश्रित हैं
त्रि-जगदीश्वरनाथम् - तीनों लोकों के नाथों के नाथ
एकम् - एक
कः - कौन
तान् - उन्हें
निवारयति - रोक सकता है
सञ्चरतः - घूमते हुए
यथेष्टम् - इच्छा के अनुसार
एक आध्यात्मिक और चिन्तनशील साधक को प्रभु की गुणात्मकता का चिन्तन किए बिना संतोष नहीं मिलता। आचार्य मुख-मण्डल की सुन्दरता का वर्णन करते-करते उनके गुणों की गहराई में उतर गए।
हे प्रभो! आपके गुण संपूर्ण चंद्र की कला के समूह के सदृश शुभ्र हैं। जब चंद्रमा की सब कलाएं एक स्थान पर इकट्ठी हो जाती हैं तो वह सकल चन्द्रमा बन जाता है और जब कलाएं बिखर जाती हैं तो उसकी सुन्दरता भी खंड-खंड हो जाती है। सकल चंद्र की कलाओं के समान शुभ्र और धवल हैं आपके गुण!
रंग दो प्रकार के होते हैं - श्वेत और कृष्ण। दुनिया में या तो अंधकार होता है या प्रकाश। गुणों को धवल और प्रकाशमान कहा गया है। दोषों को कृष्ण और अंधकारमय कहा गया है।
गुण भी तीन प्रकार के होते हैं - सत्व, रजस् और तमस्। आचार्य कहते हैं कि आपके गुण सत्व गुण प्रकृति वाले हैं। वे ज्ञान, दर्शन और चारित्र गुण एक स्थान तक सीमित न रह कर तीनों लोकों में व्याप्त हो गए हैं। प्रश्न हुआ कि वे गुण किस माध्यम से तीनों लोकों में फैल रहे हैं?
आचार्य कहते हैं कि उन गुणों ने जिसका आश्रय लिया हुआ है, वे तीनों लोकों के नाथ हैं। क्या कोई सामान्य व्यक्ति तीनों लोकों का स्वामी हो सकता है?
स्वर्ग लोक का नाथ है - इन्द्र। पर स्वर्ग लोक में भी कई इन्द्र होते हैं।
मध्य-लोक का स्वामी है - चक्रवर्ती। पर वह भी केवल 6 खंड का ही अधिपति है।
इसी प्रकार नागेन्द्र पाताल-लोक का स्वामी है।
क्या एक ही व्यक्ति तीनों लोकों का नाथ हो सकता है? हाँ!!..... भगवान तीनों लोकों के नाथ हैं। पर कैसे? इसका अध्यात्म आचार्य ने बहुत सुन्दर समाधान दिया है। तुम अकिंचन बन जाओ कि मेरा कुछ नहीं है। यदि तुम इस सच्चाई को आत्मसात् कर लो तो तुम भी तीन लोक के स्वामी बन सकते हो। जहाँ यह भावना आ जाती है कि मेरा कुछ है, वहीं स्वामित्व की सीमा बंध जाती है।
‘मेरा घर है’, तो तुम घर में सीमित हो गए। ‘मेरा परिवार है’, तो तुम परिवार तक सीमित हो गए। इसी प्रकार मेरा नगर, मेरा प्रांत, मेरा राष्ट्र, ये सब सीमाएं हैं। तुमने इनका परिग्रह कर लिया। तुम्हारे पास कुछ है तो तुम एक सीमा में आबद्ध हो गए। यदि तुम्हारे पास कुछ नहीं है तो तुम निस्सीम हो गए। फिर सब कुछ तुम्हारा हो गया।
एक राजा के मन में विकल्प हुआ कि मैं किसी को अपना गुरु बनाऊँ। सबके मन में प्रश्न उठने लगा कि राजा का गुरु कौन होगा? राजा ने कहा कि मेरा गुरु वह होगा जिसका आश्रम सबसे बड़ा होगा। इस आशय की घोषणा करवा दी गई। सबके अंदर राजा का गुरु बनने की होड़ लग गई।
सैंकड़ों साधु-महात्मा अपनी-अपनी दावेदारी लेकर राजा के पास आए। राजा ने सबको अपनी बात कहने का अवसर दिया। एक ने कहा कि मेरा आश्रम 50 एकड़ में फैला हुआ है। दूसरे ने कहा - मेरा 100 एकड़ में। तीसरे ने बताया - 200 एकड़ में। चौथे ने 500 एकड़, पांचवें ने 1000 एकड़ में बताया। अब तक 1000 एकड़ वाले महात्मा की गुरु बनने की संभावना थी। लोगों ने सोचा कि इससे बड़ा आश्रम तो किसी का नहीं है, शायद यही राजा का गुरु बनने की योग्यता रखता है।
उनमें से एक संन्यासी चुपचाप बैठा रहा। राजा ने कहा कि महाराज! आप भी बताएं कि आपके पास क्या है? संन्यासी ने कहा कि राजन्! मैं आपको यहाँ बैठे-बैठे नहीं बता सकता। आप को मेरे साथ चलना होगा। संन्यासी राजा को एक घने जंगल में ले गया। चारों ओर जंगल ही जंगल, न कोई आश्रम, न कुटिया। बड़ का एक बहुत बड़ा पेड़ था। संन्यासी उसके नीचे जाकर बैठ गया और बोला कि यही मेरा आश्रम है।
राजा ने पूछा कि आपका आश्रम कितना बड़ा है? संन्यासी बोला कि जितना बड़ा ऊपर आकाश है और जितनी बड़ी नीचे पृथ्वी है, वह सब मेरा आश्रम है। इसकी कोई सीमा नहीं है। राजा उसके चरणों में गिर पड़ा और बोला कि महात्मन्! आप ही मेरे गुरु हैं और मैं आपका शिष्यत्व स्वीकार करता हूँ। सब का मन इस असीम आश्रम को देखकर अभिभूत था।
वास्तव में वही किसी का गुरु बन सकता है जिसके पास गुणों की अथाह सम्पत्ति है। ऐसा व्यक्ति ही त्रिलोकीनाथ बन सकता है। जिसने सब कुछ छोड़ दिया, वह सबका नाथ बन गया और जिसने भौतिक साधनों को जुटा लिया, वह अनाथ हो गया। इस संदर्भ में आचार्य मानतुंग के वचन कितने सटीक हैं!!
वे बताते हैं कि आप तीन जगत के ईश्वर क्यों हैं? आप विनीता नगर के राजा थे। आपने राज्य छोड़ा, परिवार छोड़ा, धन-धान्य छोड़ा। अकिंचन होकर वन में चले आए तो त्रिलोक के नाथ बन गए। संसार के सभी गुणों ने आपका आश्रय ले लिया है। अब उन्हें कहीं भी जाने से कोई नहीं रोक सकता। कौन सीमा बांधेगा कि तुम यहाँ-वहाँ विचरण न करो? सभी गुण अपनी इच्छानुसार अत्र-तत्र-सर्वत्र विचरण कर रहे हैं। वास्तव में सब गुण अकिंचन का आश्रय ले लेते हैं।
10 धर्मों में से एक धर्म है - आकिंचन्य अर्थात् जो पूर्णतया अपरिग्रही है। भोगी बटोरता है और योगी छोड़ता है। आचार्य ने भगवान् ऋषभदेव की स्तुति करके एक दार्शनिक सत्य का उद्घाटन किया है। संसार में जो गुण दिखाई देते हैं, वे सब त्याग से उत्पन्न हुए हैं। जहां त्याग की भावना नहीं है, वहां दोष अपना डेरा जमा लेते हैं।
आज गुणात्मक विकास का अभाव होने से ही समाज का ह्रास हो रहा है। शरीर से भी ममत्व का त्याग अकिंचन्यता की पराकाष्ठा है।
भगवान ऋषभदेव ने अपने पुत्रों व पुत्रियों को लौकिक शिक्षा के साथ-साथ आत्म-विद्या व योग-विद्या में भी विशारद बनाया। भगवान ने प्रवचन के माध्यम से नहीं, अपने आचरण के माध्यम से सबको आत्म-ज्ञान दिया। इसलिए सभी गुणों ने उन्हें अपना नाथ स्वीकार किया।
हम इस सच्चाई का अनुशीलन करें - आकिंचन्य में से ही गुण प्रकट होते हैं। जहाँ त्याग है, वहाँ गुणों का स्थाई निवास है।
।।ओऽम् श्री आदिनाथाय नमः।।
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