देव-दर्शन

“प्रभु तुम मौन बैठे हो, जगत से वास्ता क्या है?

गुरु तुम तो मुखर हो, ये बता दो रास्ता क्या है?”

जब हम मंदिर में प्रवेश करते हैं तो हमें अरिहंत भगवान की प्रतिमा अपने ध्यान में मग्न दिखाई देती है। वे मुख से बोल कर कोई उपदेश नहीं देते पर इनकी ध्यान-मुद्रा हमें बहुत गंभीर उपदेश देती हुई दिखाई देती है।

वह उपदेश क्या है? इस के बारे में हमारे गुरु हमें बताते हैं क्योंकि वे तो मुखर हैं।

हमें अपने कल्याणकारी वचनों से, अपनी चर्या से, अपने दृष्टिपात से हमें समझा सकते हैं।

आप मंदिर में जाओ तो भगवान से बातें करो।

“हे भगवन्! आप हर समय पद्मासन मुद्रा में क्यों बैठे रहते हो?”

वे कहते हैं कि मैंने जन्म-जन्मांतरों से तीनों लोकों में हर गति में भ्रमण किया है। अब मैंने अपनी गति को विराम दे दिया है ताकि मोक्ष-मार्ग पर चल सकूँ।

“हे भगवन्! आप हर समय हाथ पर हाथ रख कर क्यों बैठे रहते हो?”

वे कहते हैं कि मैंने अनादि काल से अनेक प्रकार के खट्कर्म किए हैं और पुण्य-पाप के कार्यों में उलझा रहा हूँ। अब मैं कृतकृत्य हो गया हूँ अर्थात् करने योग्य कार्योंं को कर चुका हूँ। सभी शुभ-अशुभ कर्मों से ऊपर उठ कर शुद्ध आत्म स्वभाव को प्राप्त हो गया हूँ। अब मेरे लिए कोई काम करना शेष नहीं रह गया है।

“हे भगवन्! कम से कम आँख उठा कर तो देखो। हम आपके दर्शन करने के लिए आए हैं। आप तो पलकें भी नीचे किए बैठे हो।”

वे कहते हैं कि हाँ! मैंने अनादि काल से इस संसार को देखा है। अब मुझे उसमें कोई सार नज़र नहीं आता है। मैंने सारी दुनिया से दृष्टि हटा कर स्वयं पर केन्द्रित कर ली है। मुझे अपनी आत्मा का सच्चा स्वरूप दृष्टिगोचर हो रहा है।

भगवान बिना कुछ कहे भी हमें धर्म का सम्यक् मार्ग दिखाते हैं। अब तो हमें केवल कदम आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।

 

परम पूज्या आर्यिका श्री 105 स्वस्ति भूषण माताजी 

।।ओऽम् श्री महावीराय नमः।।

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