चारों अनुयोगों का परिचय

चारों अनुयोगों का परिचय

हम प्रतिदिन सुनते हैं कि हमारे आचार्यों ने जिन-वाणी को चार अनुयोगों में विभाजित करके हम पर बहुत उपकार किया है।

  1. प्रथमानुयोग
  2. चरणानुयोग
  3. करणानुयोग
  4. द्रव्यानुयोग

यदि हम उनके बारे में अच्छी तरह जानना चाहते हैं कि उनकी विषय वस्तु क्या है तो आइए इन की विशेषताओं के बारे में एक आख्यान के माध्यम से समझते हैं।

एक व्यक्ति प्रवचन हॉल में बैठा था और मनोयोग से प्रवचन सुन रहा था। अचानक उसके पेट में दर्द होने लगा।वह तुरंत उठ कर वहाँ से चला गया।

अन्यत्र एक हॉल में भी प्रवचन हो रहा था।

उसे देख कर वहाँ चरणानुयोग पर प्रवचन कर रहे पंडित जी ने पूछा कि क्या बात है? उसने कहा कि मेरे पेट में दर्द हो रहा है। 

पंडित जी ने पूछा कि कल तुमने क्या खाया था? उसने कहा कि कल मैं कुछ लोगों के साथ दावत में गया था और मैंने वहाँ ककड़ी अधिक मात्रा में खा ली।

बस! यही कारण है कि तुम उसे पचाने में असमर्थ रहे और तुम्हारे पेट में दर्द हो गया। तुम्हें इतनी मात्रा में ही सेवन करना चाहिए था जितना तुम पचा सको। 

अब आगे से सावधान रहना।

चरणानुयोग हमें बाह्य कारण से होने वाले कष्टों के बारे में बताता है और अपना आचरण सुधारने की शिक्षा देता है। 

वह व्यक्ति आगे चला तो वहाँ करणानुयोग पर प्रवचन चल रहा था। जब पंडित जी ने उसे बाहर जाते हुए देखा तो उससे पूछा कि क्या बात है? तुम प्रवचन छोड़ कर क्यों जा रहे हो? उसने कहा कि मेरे पेट में दर्द हो रहा है। 

पंडित जी ने पूछा कि कल तुमने क्या खाया था? उसने कहा कि कल मैं कुछ लोगों के साथ दावत में गया था और मैंने वहाँ ककड़ी अधिक मात्रा में खा ली।

अच्छा! यह बताओ कि कितने लोगों ने ककड़ी खाई थी? केवल तुमने ही ककड़ी अधिक खाई थी या सभी आदमियों ने इसी प्रकार उसका स्वाद लिया था। 

नहीं पंडित जी! सभी ने खाई थी।

तो उनके पेट में तो दर्द नहीं हुआ। तुम्हारे ही पेट में दर्द क्यों हुआ?

जी!

वास्तव में पेट में दर्द ककड़ी खाने से नहीं हुआ। यदि ककड़ी खाने से होता तो सब के पेट में दर्द होना चाहिए था।  तुम्हारे पेट में दर्द हुआ है तुम्हारे असाता कर्म के उदय से।

बुरे काम का बुरा फल और अच्छे काम का अच्छा फल मिलता है।

यदि हम कोई बुरा काम करते हैं, किसी से करवाते हैं या किसी के बुरे काम की अनुमोदना करते हैं तो उसका फल हमें अवश्य कभी न कभी भोगना ही पड़ता है।

इस प्रकार करणानुयोग केवल बाह्य कारण ही नहीं अपितु अंतरंग कर्म फल की भी व्याख्या करता है।

उस व्यक्ति को समझ में आने लगा कि किसी को दोष देने से कोई लाभ नहीं है। मेरे दुःख का कारण मैं स्वयं ही हूँ।

जब पहले किए हुए कर्म का उदय होता है तो उसे पुरुषार्थ का निमित्त मिल जाता है और हमें दुःख भोगना पड़ता है। असाता कर्म का उदय हुआ, उसे ककड़ी खाने का निमित्त मिल गया।

 

फिर आगे जाने पर उससे यही प्रश्न एक मुनि महाराज ने पूछा जो द्रव्यानुयोग का स्वाध्याय करवा रहे थे।

उससे पूछा कि क्या बात है? तुम प्रवचन छोड़ कर क्यों जा रहे हो?

उसने कहा कि मेरे पेट में दर्द हो रहा है। महाराज जी को उसने बताया कि एक पंडित जी ने कहा कि कल तुम कुछ लोगों के साथ दावत में गए थे और वहाँ ककड़ी अधिक मात्रा में खा ली। इस कारण पेट में दर्द हो गया। दूसरे पंडित जी ने कहा कि मेरे असाता कर्म का उदय था। इस कारण पेट में दर्द हो गया। अब आप ही बताएं कि इसका क्या कारण था?

महाराज जी ने कहा कि तुम वस्तु के स्वरूप को पहचानो। आत्मा तो ककड़ी खाती नहीं। इसलिए उसे दर्द हो नहीं सकता। शरीर जीव है नहीं, वह तो पुद्गल है। मान लो हम इस माइक को मुक्का मारें तो इसे दर्द होगा क्या?

नहीं महाराज!

तो दर्द तो न आत्मा को है और न शरीर को। जीव अलग है ओर अजीव अलग है।

जड़ और चेतन दोनों अलग-अलग हैं। जैसे माइक के परमाणु जड़ हैं, वैसे ही शरीर भी जड़ परमाणुओं से बना है।  

तो महाराज! फिर दर्द की अनुभूति कैसे हुई?

दर्द की अनुभूति हुई तुम्हारे राग-द्वेष के कारण। 

मान लो तुम अपने कमरे में रखी हर वस्तु से बहुत प्रेम करते हो।उसे कोई अपने स्थान से इधर-उधर हिला दे तो तुम्हें क्रोध आ जाता है। यहाँ तक कि दीवारों से भी बहुत लगाव है। कोई आकर दीवार पर कील ठोकने लगता है तो तुम्हें सहन नहीं होता।

क्या दीवार को पीड़ा हो रही है? नहीं न! फिर तुम्हें पीड़ा क्यों हो रही है? क्योंकि तुम्हें दीवार से राग है और कील ठोकने वाले के प्रति द्वेष है।

द्वेष क्यों है?

क्योंकि तुम्हारे राग में विघ्न पड़ रहा है। अपने शरीर के प्रति तुम्हारे मन में राग है। यद्यपि वह जड़ है फिर भी तुम्हें दर्द की अनुभूति हो रही है। जब पूर्व कर्म को पुरुषार्थ का निमित्त मिल जाता है तो शरीर में परिवर्तन होता है और सुख-दुःख की अनुभूति होने लगती है।

तुम हंसने-रोने लगते हो।, पीड़ा का अनुभव करते हो। यदि यही दर्द मुनिराज को हो तो वे दर्द की अनुभूति नहीं करते। क्योंकि वे भेद-विज्ञान को जानते हैं।

वे जानते हैं कि आत्मा को दर्द होता नहीं और शरीर के प्रति उनका राग-भाव है नहीं। अच्छे या बुरे के प्रति राग और द्वेष के परिणाम से जीव को सुख औेर दुःख होता है।

हम जो भोजन करते हैं तो उससे शरीर पर उपकार हो रहा है। भोजन भी जड़ है और शरीर भी जड़ है। जड़ का जड़ पर उपकार हो रहा है। इससे आत्मा का तो कोई सम्बन्ध ही नहीं है।

हम इसमें राग-द्वेष का भाव रख कर आत्मा का उपकार नहीं बल्कि अपकार ही कर रहे हैं जो कर्म बंध का कारण बनता है। यदि कर्म बंध से छूटना चाहते हो तो राग-द्वेष करना छोड़ दो।

हाँ, अब यह बताओ कि कौन से अनुयोग के बारे में जानना बाकी है?

अच्छा! प्रथमानुयोग!

प्रथमानुयोग का उपदेश देने वाले कहते हैं कि हमें तीनों की बातें स्वीकार हैं।

दर्द की अनुभूति होती है राग-द्वेष के कारण, वर्तमान के विपरीत पुरुषार्थ के कारण और पिछले किए हुए कर्मों के उदय में आने के कारण।

यदि आदिनाथ भगवान फसल को नष्ट होने से बचाने के लिए बैलों के मुख पर छींका बंधवाने का आदेश न देते तो उन्हें 6 मास तक आहार मिलने में विघ्न नहीं पड़ता। जब उन्हें मुनि बनने के बाद केवलज्ञान हो गया तो वे भी कर्मबंध से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त हो गए।

 

यही है मुक्ति का सच्चा मार्ग!!!

 

 (आचार्य श्री प्रज्ञ सागर जी महाराज)

।।ओऽम् श्री महावीराय नमः।।

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