काल-चक्र और दसलक्षण-पर्व का महात्म्य

काल-चक्र और दसलक्षण-पर्व का महात्म्य



जैन दर्शन के अनुसार सृष्टि के उत्था व पतन को दो भागों में विभाजित किया गया है। इनमें 6 काल-खण्ड उत्सर्पिणी अर्थात् उन्नति के काल होते हैं और 6 काल-खण्ड अवसर्पिणी अर्थात् अवनति के काल होते हैं।

वर्तमान में अवसर्पिणी अर्थात् अवनति का पंचम काल चल रहा है, जिसका नाम है - दुःषमा काल। इसे दुखमा काल भी कहा जाता है। यह काल 21000 वर्ष का है जिसमें से सन् 2020 तक 2546 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं और अब श्री वीर निर्वाण संवत् 2547 चल रहा है।

चतुर्थ काल की अपेक्षा पंचम काल में दुखों की अधिकता है और अवसर्पिणी काल होने के कारण छठे काल में इससे भी अधिक दुःख होने वाले हैं, इसलिए उसका नाम है - दुःषमा दुःषमा काल।

पंचम काल के आरम्भ में मनुष्यों की ऊँचाई 7 हाथ व आयु 120 वर्ष की होती है एवं अंत में छठे काल में घटते-घटते ऊँचाई 3-3.5 हाथ व आयु 20 वर्ष की रह जाती है। 

जैसा कि पहले बताया गया है, छठे काल के आरम्भ में मनुष्यों की ऊँचाई 3-3.5 हाथ व आयु 20 वर्ष की होती है एवं अंत में घटते-घटते ऊँचाई 1 हाथ व आयु 15-16 वर्ष की रह जाती है। यह काल भी 21000 वर्ष का है। 

इस काल में मनुष्य प्रायः पशुओं जैसा आचरण करने वाले क्रूर, बहरे, अंधे, बंदर जैसे रूप वाले और कुबड़े, बौने शरीर वाले अनेक रोगों से ग्रसित होते हैं।

इस काल में जन्म लेने वाले जीव नरक व तिर्यंचगति से आते हैं और मरकर वहीं जाते हैं।

छठे काल के अंतिम 49 दिन का प्रलयकाल होता है। उस प्रलयकाल में 7-7 दिन तक गम्भीर गर्जना से मेघ तुहिन (ओला), क्षार जल, धूम, तेज़ हवा, धिल, वज्र, कंकड़, पत्थर, विष, जलती हुई दुष्प्रेक्ष्य अग्नि की ज्वाला आदि की कुवृष्टियाँ होती हैं। यह संवर्तक (लवा) नाम की वायु पर्वत, वृक्ष और भूमि आदि को चूर्ण करती हुई दिशाओं के अंत तक भ्रमण करती है। इससे एक योजन नीचे तक की पृथ्वी राख हो जाती है, जिससे वहाँ स्थित जीव मूर्छित हो जाते हैं और कुछ मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।

इससे व्याकुल होकर मनुष्य व तिर्यंच शरण के लिए विजयार्द्ध पर्वत और गंगा-सिंधु की वेदी में प्रवेश कर जाते हैं तथा दयावान विद्याधर व देव 72 युगलों और कुछ अन्य प्राणियों को विजयार्द्ध पर्वत की गुफ़ाओं में सुरक्षित रख देते हैं।

क्या आप जानते हैं कि वे 6 काल कौन-कौन से हैं?

उन 6 कालों के नाम इस प्रकार हैं-

1. सुखमा-सुखमा काल (4 कोड़ाकोड़ी अर्द्धसागर) 
2. सुखमा काल (3 कोड़ाकोड़ी अर्द्धसागर)
3. सुखमा-दुखमा काल (2 कोड़ाकोड़ी अर्द्धसागर)  
4. दुखमा-सुखमा काल (1 कोड़ाकोड़ी अर्द्धसागर से 42000 हज़ार वर्ष कम)
5. दुखमा काल (21000 वर्ष) (वर्तमान में चलने वाला पंचम काल)
6. दुखमा-दुखमा काल (21000 वर्ष)

इस प्रकार 10 कोड़ाकोड़ी सागर का यह अवसर्पिणी काल समाप्त हो जाता है।

ध्यान रहे कि यह काल-परिवर्तन केवल भरत और ऐरावत क्षेत्र में ही होता है।

उसके बाद उत्सर्पिणी के प्रथम काल में मेघों द्वारा क्रमशः शीतल जल, दूध, घी, अमृत, रस आदि की सुवृष्टि 7-7 दिन तक होती है। यह भी 49 दिन तक होती है। इस वर्षा से पृथ्वी स्निग्धता, धान्य तथा औषधियों को धारण कर लेती है। बेल, लता, गुल्म और वृक्ष वृद्धि को प्राप्त होते हैं। शीतल गंध को ग्रहण करके विजयार्द्ध पर्वत की श्रेणियों में देवों द्वारा सुरक्षित किए गए 72 युगलों और अन्य तिर्यंच प्राणियों को  बाहर लाया जाता है। 

वह सुवृष्टि का 49 वाँ दिन भाद्रपद शुक्ल पंचमी का दिन है, जब नवीन सृष्टि का निर्माण प्रारम्भ होता है। धर्म आराधना से नवीन सृष्टि का स्वागत किया जाता है जिसे आज भी हम दसलक्षण-पर्व के रूप में मनाते हैं। अपनी सभी बुराइयों के त्याग व निरन्तर उत्थान की भावना लेकर सृष्टि उत्सर्पिणी काल की ओर अपने कदम बढ़ाने लगती है अगले 10 कोड़ाकोड़ी सागर के लिए।

आरम्भ में मनुष्य वृक्षों के फल, फूल व पत्ते आदि खाते हैं और शनैः शनैः आयु, ऊँचाई, बुद्धि आदि की वृद्धि होने लगती है और उत्सर्पिणी काल का प्रारम्भ हो जाता है।

सृष्टि का क्रम इसी प्रकार चलता रहता है और चलता रहेगा।

।।ओऽम् श्री महावीराय नमः।।

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