लोक में मंगलकारी क्या है?
लोक में मंगलकारी क्या है?
मंगल का अर्थ है- कल्याणकारी।
मम् पापं गालयति इति मंगलः।
जो मेरे मोह, राग, द्वेष रूपी सभी पापों को गला दे और आत्मा में सच्चा सुख उत्पन्न करे, वह मंगल है। अरिहंतादिक स्वयं मंगलमय हैं और उनमें जो भक्तिभाव रखता है, उसका भी परम मंगल होता है।
इस लोक में चार मंगल हैं-
चत्तारि मंगलं, अरिहंता मंगलं, सिद्धा मंगलं, साहू मंगलं, केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं।
अरिहंत भगवान् मंगल हैं, सिद्ध भगवान मंगल हैं, साधु (आचार्य, उपाध्याय, साधु) मंगल हैं तथा केवली भगवान द्वारा बताया गया वीतराग धर्म मंगल है।
चत्तारि लोगुत्तमा, अरिहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा।
इस लोक में चार उत्तम हैं। अरिहंत भगवान् उत्तम हैं, सिद्ध भगवान उत्तम हैं, साधु (आचार्य, उपाध्याय, साधु) उत्तम हैं तथा केवली भगवान द्वारा बताया गया वीतराग धर्म उत्तम है।
लोक में जो सबसे महान् हो, उसे उत्तम कहते हैं।
चत्तारि सरणं पव्वजामि, अरिहंते सरणं पव्वजामि, सिद्धे सरणं पव्वजामि, साहू सरणं पव्वजामि, केवलिपण्णत्तं धम्मं सरणं पव्वजामि।
जो लोक में सबका मंगल करने वाले हैं और सबसे महान् हैं; मैं उन चारों की शरण को प्राप्त करता हूँ। मैं अरिहंत भगवान् की शरण को प्राप्त करता हूँं, सिद्ध भगवान की शरण को प्राप्त करता हूँ, साधु (आचार्य, उपाध्याय, साधु) की शरण को प्राप्त करता हूँ तथा केवली भगवान द्वारा बताया गए वीतराग धर्म की शरण को प्राप्त करता हूँ।
शरण कहते हैं आश्रय लेने को। पंचपरमेष्ठी द्वारा बताए गए मार्ग पर चलकर अपनी आत्मा को जानना, अपनी आत्मा की शरण लेना ही केवली भगवान द्वारा बताया गए वीतराग धर्म की शरण है।
जो व्यक्ति पंचपरमेष्ठी की शरण लेता है, उसका कल्याण होता है अर्थात् सब दुःख, सब पाप विनष्ट हो जाते हैं और वह भव-भ्रमण से मुक्त हो जाता है।
।।ओऽम् श्री महावीराय नमः।।
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