पंच कल्याणक से हमने क्या सीखा?
पंच कल्याणक से हमने क्या सीखा?
अपने अंतर्चक्षुओं से देखने वाले सुप्रसिद्ध कवि रवीन्द्र जैन लिखते हैं-
अक्षय पद निर्वाण शुभ, पाय बना भगवान।।
तेरे पाँच हुए कल्याण प्रभु, इक बार मेरा कल्याण कर दो।
अंतर्यामी, अंतर्ज्ञानी, प्रभु दूर मेरा अज्ञान कर दो।।
हमने पाँच दिन तक तीर्थंकर भगवान की गर्भावतरण से मोक्ष-प्राप्ति तक की एक एक क्रिया को देखा, सुना, समझा और जाना। शिल्पियों द्वारा तराशी गई भगवान की प्रतिमा को पाषाण से भगवान बनते हुए देखा। क्या यह सब नाटक था?
असली था या नकली?
भैया! अब तो अच्छे फंसे। नकली कहते हैं तो हमारी श्रद्धा की भावनाओं को ठेस पहुँचती है और असली कहते हैं तो सत्य नहीं है।
बोलो न!
महाराज! आप ही बता दो न! हमारी परीक्षा लेकर क्यों हमें दुविधा में डाल रहे हो?
बेटा! तुम कभी कहीं दाखिला लेने या नौकरी के लिए इंटरव्यू देने गए हो?
हाँ महाराज।
वहाँ तुमसे प्रमाण पत्र दिखाने के लिए कहा जाता है, तब तुम असली दिखाते हो या नकली।
असली दिखाते हैं, महाराज।
और जमा कराने के लिए कहते हैं, तब?
जी, तब हम उसकी सत्यापित प्रति जमा कराते हैं।
क्या सत्यापित प्रति और असली प्रमाण पत्र में कोई अंतर होता है?
नहीं, महाराज।
ठीक यही बात यहाँ प्रभु के पंचकल्याणक का मंचन करने पर व अन्य क्रियाओं पर भी लागू होती है। चतुर्थ काल में जो 24 तीर्थंकरों के पंच कल्याणक हुए थे वे असली थे और पंचम काल में दिखाए जाने वाले पंच कल्याणक उसकी सत्यापित प्रति है।
तीर्थंकर बालक के माता के गर्भ में आने से 6 माह पूर्व ही शुभ संकेत के रूप में माता के आँगन में रत्नों की वर्षा आरम्भ हो जाती है।
यदि आप भी शुभ धार्मिक संस्कारों से युक्त हैं तो यह समृद्धि का संकेत आप भी अपने घरों में देख सकते हैं, महसूस कर सकते हैं कि कोई पुण्यवान पवित्र आत्मा हमारे घर में बेटा या बेटी बन कर आने वाली है।
जैसे ही तीर्थंकर बालक के माता के गर्भ में आने की सूचना मिलती है, स्वर्ग लोक में खुशी की लहर दौड़ जाती है। अष्ट कुमारियां माता की सेवा करने के लिए तुरंत उपस्थित हो जाती हैं। माता से धर्म संबंधी प्रश्न पूछती हैं और उनके गर्भ में पल रहे बालक के सर्वांगीण विकास का पूरा ध्यान रखती हैं।
आज भी यदि एक गर्भवती स्त्री सुसंस्कारित बच्चे को जन्म देना चाहती है तो पूरे 9 माह तक अपने आचार विचार पर नियंत्रण रख कर अपने गर्भस्थ शिशु में धार्मिक विचारों का बीजारोपण कर सकती है।
तीर्थंकर बालक केवल अपने ही कल्याण के लिए पैदा नहीं होते बल्कि सारे संसार के कल्याण के लिए उनका जन्म होता है। यहाँ तक कि घोर दुःखों से संतप्त नरक में भी एक पल के लिए शांति का अनुभव होने लगता है।
जानते हो! जैसे ही उनके जन्म का संकेत स्वर्ग लोक में पहुँचता है, वहाँ करोड़ों प्रकार के बाजे शंख, घंटे आदि बजने लगते हैं। तीर्थंकर बालक का जन्मोत्सव मनाने के लिए सौधर्म इन्द्र परिवार सहित पृथ्वी पर आता है और बालक को सफेद ऐरावत हाथी पर बैठा कर पांडुक शिला पर नह्वन कराने के लिए ले जाता है।
हाँ। तुम्हारे यहाँ बच्चा कितने दिनों में बैठना सीखता है?
क्या कहा? एक महीने में!
नहीं, महाराज।
अरे! 2-3 महीने में तो सीख ही जाता होगा न!
नहीं, महाराज।
अब इतना तो बेवकूफ न बनाओ महाराज को।
नहीं महाराज, हम सच कह रहे हैं। एक-दो महीने में नहीं, उसे तो 5-6 महीने लग जाते हैं बैठना सीखने में।
और चलना कब सीखता है?
लगभग एक साल में, महाराज।
और बोलना कब सीखता है?
दो-ढाई साल तो लग ही जाते हैं, महाराज।
अच्छा! वैसे सच पूछो तो तुम्हें तो अभी तक 30-40 साल तक भी न बैठना आया, न चलना आया, न बोलना आया और जीवन जीना तो कभी आया ही नहीं, मृत्यु भले ही आ गई। कब सीखोगे? कब ज्ञान होगा तुम्हें?
जब कि तीर्थंकर बालक तो जन्म से ही मति, श्रुत और अवधि तीन ज्ञान के धारी होते हैं।
क्योंकि उनके पूर्व जन्मों की तपस्या का फल सम्पूर्ण रूप से इसी जन्म में मिलने वाला है और वे अपने इस अन्तिम भव में केवल ज्ञान प्राप्त करके मोक्ष पद को प्राप्त कर लेंगे।
वे स्वयं मोक्ष प्राप्त करने और हम सब का मोक्ष-मार्ग प्रशस्त करने के लिए ही आए हैं।
बंधुओं, आओ हम भी आज उनके पंचकल्याणक के साक्षी बनकर उनके जीवन से प्रेरणा लें और अपने कल्याण मार्ग पर चलने का प्रयत्न करें। आज के बाद आप स्वयं में आमूल चूल परिवर्तन लाएं जो तुमसे मिलने वालों को भी महसूस होने लगे।
तुम्हें अपने मुख से यह न बताना पड़े कि जब से हमारे नगर में पंचकल्याणक हुआ और हमने महाराज जी के श्रीमुख से उसका महत्त्व जाना, तब से हम समझ पाए कि जीवन को कैसे जीया जाता है, अपितु लोग तुमसे मिलने के बाद यह कहने लगें कि वाह! आप तो पंचकल्याणक के बाद इतना बदल गए। आप को देखकर साफ़ पता चल रहा है कि अवश्य ही आपके नगर में पंचकल्याणक हुआ होगा।
मुनि श्री पुलक सागर जी
।।ओऽम् श्री महावीराय नमः।।
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