श्रावण बदी एकम्
श्रावण बदी एकम्
99 प्रतिशत लोगों का उत्तर होगा- हाँ।
क्या आपने अपने पिता के पिता को देखा है?
50 प्रतिशत लोगों का उत्तर होगा- हाँ। लेकिन तब हम बहुत छोटे थे।
क्या आपने अपने पिता के पिता के पिता को देखा है?
1 प्रतिशत लोगों का उत्तर होगा- हाँ। शायद, कुछ याद तो पड़ता है।
और उनके पिता को?
जी नहीं।
तो आपको कैसे मालूम हुआ कि वे थे?
वंशावली में सात पीढ़ीयों के नाम लिखे हैं, वहाँ से।
आपको पूर्ण विश्वास है कि वे थे और उनका नाम भी यही था?
जी महाराज।
इसका अर्थ है कि हमें पूर्वजों की लिखी हुई बात पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास है।
ठीक यही श्रद्धा और विश्वास हमें अपने आचार्यों द्वारा लिखे गए ग्रंथों पर है कि वे अक्षरशः भगवान महावीर की देशना के अनुसार ही लिखे गए हैं।
भगवान महावीर के निर्वाण से लेकर लगभग 683 वर्षों तक श्रुत केवली द्वारा ही यह ज्ञान एक आचार्य से दूसरे आचार्य तक आचार्य-शिष्य परम्परा द्वारा दिया जा रहा था। पर जैसे जैसे पंचम काल बढ़ता जा रहा था, वैसे वैसे इस ज्ञान के क्षीण होने व लोप होने की संभावना भी बढ़ती जा रही थी।
ऐसे समय में आचार्य धरसेन ने विचार किया कि आगे आगे स्मृति का लोप होता जाएगा और भगवान की वाणी को सुरक्षित रखने का केवल एक ही उपाय है कि इसे किसी योग्य शिष्य द्वारा लिपिबद्ध कराया जाए।
वे हर 5 वर्ष में एक बार श्री गिरनार पर्वत पर यति सम्मेलन कराते थे जिसमें पूरे भारत के आचार्य, साधुगण, विद्वान आदि सम्मिलित होकर धर्म चर्चा करते थे। इसी से प्रेरित होकर आचार्य विराग सागर जी ने भी हर 2 वर्ष में एक बार यति सम्मेलन का प्रारम्भ किया है जो अभी हाल ही में झांसी में सम्पन्न हुआ है।
आचार्य धरसेन ने दक्षिण से आए आचार्य पुष्पदंत व आचार्य भूतबलि की योग्यता को परखने के लिए उन्हें दो मंत्र सिद्ध करने के लिए दिए। वे दोनों आचार्य मंत्र सिद्धि में लग गए और उसी के प्रभाव से दो देव प्रगट हो गए।
पर यह क्या? एक देव कुरूप था और एक था एक चक्षु से रहित! वे जान गए कि मंत्र में कोई अशुद्धि ही इसका कारण है।
और हुआ भी वही। एक मंत्र में एक मात्रा अधिक थी और एक मंत्र में एक मात्रा कम। उन्होंने मंत्र को शुद्ध करके सिद्ध किया। मंत्र सिद्ध करने के बाद वे आचार्य धरसेन के पास गए। वे अपनी परीक्षा में उत्तीर्ण हो गए थे। आचार्य धरसेन ने आचार्य पुष्पदंत व आचार्य भूतबलि से सबसे पहले ताड़ पत्र पर णमोकार मंत्र को लिपिबद्ध कराया और सबसे पहले ग्रंथ षट्खण्डागम की रचना प्रारंभ हुई। श्रुतपंचमी के दिन अंकलेश्वर (गुजरात) में इस ग्रंथ की रचना पूर्ण हुई थी और वहाँ के राजा ने नगर में इस ग्रंथ की भव्य पालकी शोभा यात्रा निकाली थी। यह परम्परा आज भी कायम है।
श्रावण बदी एकम् वीर शासन जयन्ती के रूप में मनाया जाता है क्योंकि केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद 66 वें दिन भगवान महावीर स्वामी की वाणी आज के दिन ही खिरनी प्रारम्भ हुई थी। यही भगवान महावीर स्वामी की जिनवाणी आज भी हमारा मोक्ष मार्ग प्रशस्त करती है।
।।ओऽम् श्री महावीराय नमः।।
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