सृष्टि का इतिहास

सृष्टि का इतिहास

सृष्टि के कालचक्र में 6 भाग उत्सर्पिणी काल के होते हैं जिसमें उत्तरोत्तर वृद्धि होती है और 6 भाग अवसर्पिणी काल के होते हैं जिसमें निरंतर ह्रास होता चला जाता है। अब हम जिस युग में जी रहे हैं, यह अवसर्पिणी का पंचम काल कहलाता है।

यह एक सामान्य सा प्रकृति का नियम है कि जब हम सुख सुविधाओं की ओर आकर्षित होते हैं तो धर्म से विमुख होने लगते हैं, हमारे पुण्य क्षीण हो जाते हैं और वे सुख सुविधाएं उसी प्रकार विलुप्त हो जाती हैं जैसे तीसरे काल के अंतिम दौर में दुनिया से कल्प वृक्ष समाप्त होने लग गए थे।

कल्प वृक्ष की विशेषता थी कि उनके पास जाकर जिस भोग-उपभोग सामग्री की कामना की जाती थी, वह तुरंत पूरी हो जाती थी। 

(1) सुखमा-दुखमा का तृतीय काल चल रहा था। एक दिन आषाढ़ सुदी पूनम के दिन लोगों ने सूर्य को अस्त होते हुए और प्रकाशमान चन्द्र को उदय होते हुए देखा।

बहुत विचित्र घटना थी उनके लिए। यद्यपि चन्द्र, सूर्य तो पहले भी अनादि काल से उदय और अस्त होते रहे थे पर ज्योतिरंग जाति के कल्प वृक्षों का प्रकाश इतना अधिक होता था कि वे उस प्रकाश में दिखाई नहीं देते थे।

अब उनका प्रकाश क्षीण हो जाने से चन्द्र, सूर्य दिखई देने लगे तो मनुष्य भयभीत होकर प्रतिश्रुति नामक पुरुष के पास पहुँचे जो सृष्टि परिवर्तन के नियमों को जानते थे।

उन्होंने बताया कि इनसे डरने की आवश्यकता नहीं है और भविष्य में मनुष्यों के जीवन का निर्वाह कैसे होगा और कैसा व्यवहार होगा, यह भी बताया। उनके इस प्रकार बोध देने से मनुष्यों को शांति मिली।  

ये प्रतिश्रुति पहले कुलकर मनु थे। 

(2) इसके करोड़ों वर्ष बाद सन्मति नाम के दूसरे कुलकर हुए। इस समय तक ज्योतिरंग जाति के कल्प वृक्षों का प्रकाश इतना क्षीण हो गया था कि आकाश में नक्षत्र और तारागण भी चमकते हुए दिखाई देने लगे थे।

मनुष्यों को फिर भय लगने लगा और वे कुलकर के पास अपने भय का निवारण करने के लिए आए। उन्होंने लोगों को सूर्य, चन्द्र, ग्रह, नक्षत्र, रात, दिन, सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण, सूर्य के उत्तरायण और दक्षिणायन होने आदि के भेद बता कर ज्योतिष-विद्या का ज्ञान दिया।

(3) इसके करोड़ों वर्ष बाद क्षेमंकर नाम के तीसरे कुलकर उत्पन्न हुए। अब तक सिंह आदि क्रूर प्राणी शांत स्वभाव के थे पर अब उनमें आक्रामक स्वभाव दृष्टिगोचर होने लगा।

अब तक तो ऐसे जीवों को मनुष्य अपने साथ ही रखते थे पर अब क्षेमंकर कुलकर के आदेश से मनुष्य उनसे अलग रहने लगे और अब उन पर विश्वास करना भी छोड़ दिया था।

(4) तीसरे कुलकर के असंख्यात करोड़ों वर्ष बाद क्षेमंधर नाम के चौथे कुलकर हुए। इनके समय में सिंह आदि जंतुओं की क्रूरता और भी अधिक बढ़ गई थी और अपने बचाव के लिए कुलकर ने मनुष्यों को लाठी आदि रखने का उपदेश दिया।

(5) ) इसके करोड़ों वर्ष बाद सीमंकर नाम के पाँचवे कुलकर उत्पन्न हुए। इनके समय में कल्प वृक्ष बहुत कम हो गए थे और फल भी अल्प मात्रा में देने लगे थे जिसके फलस्वरूप लोगों में विवाद होने लगे थे। 

कुलकर ने अपनी बुद्धि से कल्प वृक्षों की सीमा बाँध दी और सब अपनी सीमा के अनुसार उनका लाभ लेने लगे।

(6) फिर असंख्यात करोड़ों वर्ष बीतने के बाद सीमंधर नाम के छठे कुलकर उत्पन्न हुए। अब तो कल्प वृक्षों की कमी के कारण विवाद बढ़ने लगा क्योंकि वे फल भी बहुत कम मात्रा में देने लगे थे जो मनुष्यों के लिए पर्याप्त नहीं होते थे। तब कुलकर ने अपनी बुद्धि से कल्प-वृक्षों की नए प्रकार से सीमा बाँध दी।

प्रश्न उठता है कि लोग विवाद में क्यों पड़ते थे? कारण यही था कि उनके पास अपना जीवन चलाने के लिए अन्य कोई साधन नहीं था।

(7) फिर असंख्यात करोड़ों वर्ष बीतने के बाद विमलवाहन नाम के सातवें कुलकर उत्पन्न हुए। उन्होंने मनुष्यों को हाथी, घोड़ा, ऊँट, बैल आदि की सवारी करने का ढंग बताया ताकि उनसे अपने जीवन को सुगम बनाने में मदद ली जा सके। 

(8) इसके असंख्यात करोड़ों वर्ष बीतने के बाद चक्षुष्मान नाम के आठवें कुलकर उत्पन्न हुए। इस समय सृष्टि में एक परिवर्तन और हुआ। इनके समय से पूर्व माता-पिता की, युगल संतान के उत्पन्न होते ही, मृत्यु हो जाती थी। वे अपनी संतान का मुख भी नहीं देख पाते थे। पर इनके समय में माता-पिता की, युगल संतान के उत्पन्न होने के क्षण भर बाद मृत्यु होने लगी। कुलकर ने लोगों को समझाया कि संतान क्यों होती है।

(9) इसके असंख्यात करोड़ों वर्ष बीतने के बाद यशस्वान् नाम के नौवें कुलकर उत्पन्न हुए। इनके समय में माता-पिता अपनी संतान के साथ कुछ समय रहने लगे, फिर उनकी मृत्यु होने लगी। उनके सामने संतान का नाम रखा जाने लगा। कुलकर ने लोगों को संतान को आशीर्वाद आदि देने की विधि बताई।

(10) इसके असंख्यात करोड़ों वर्ष बाद अभिचन्द्र नाम के दसवें कुलकर हुए।  उन्होंने प्रजा को संतान के साथ क्रीड़ा करने और उनके पालन की विधि बताई।

(11) इनके सैंकड़ों वर्ष बाद चंद्राभ नाम के ग्यारहवें कुलकर हुए। इनके समय में माता पिता अपनी संतान के साथ पहले से अधिक समय तक जीवन व्यतीत करने लगी। 

(12) फिर कुछ समय बाद बारहवें कुलकर मरुदेव हुए। उस समय की सारी व्यवस्था इनके अधीन थी। इन्होंने जल मार्ग में गमन करने के लिए छोटी-बड़ी नाव चलाने के उपाय बताए। इन्हीं के समय में कई छोटी-बड़ी नदियाँ व उपसमुद्र उत्पन्न हुए और मेघ भी न्यूनाधिक रीति से बरसने लगे। स्त्री और पुरुष दोनों युगल ही पैदा होते थे।

(13) फिर कुछ समय बाद तेरहवें कुलकर प्रसेनजित हुए। इनके समय में संतान जरायु से ढकी हुई उत्पन्न होने लगी थी। उसे जरायु से बाहर निकालने का उपाय भी कुलकर ने बताया। प्रसेनजित अपने माता पिता की इकलौती संतान के रूप में उत्पन्न हुए थे अतः इनके पिता ने विवाह की पद्धति आरम्भ की।

(14) इनके बाद चौदहवें कुलकर नाभिराय हुए। अब तक कल्पवृक्ष नष्टप्रायः हो चुके थे।  तेरह कुलकरों का समय भोगभूमि का था, जहाँ बिना किसी व्यापार के भोग-उपभोग की सामग्री प्राप्त हो जाती थी।

पर नाभिराय के समय भोगभूमि का समय समाप्त हो गया और कर्मभूमि का प्रारम्भ हुआ। अब जीविका के लिए खेती, व्यापार आदि कर्म करना आवश्यक हो गया पर कोई भी ये काम करना नहीं जानता था।

कल्पवृक्ष भोजन सामग्री दे नहीं रहे थे जिससे लोग भूखे मरने लगे। वे व्याकुल होकर महाराजा नाभिराय  के पास आए। यह समय युग के परिवर्तन का था।

कल्पवृक्षों के नष्ट होने से जल, पृथ्वी, वायु, अग्नि, आकाश आदि के संयोग से धान्यों ( अनाज) आदि के अंकुर स्वयं उत्पन्न होने लगे और बढ़ कर फलयुक्त होने लगे। इन पाँचो तत्वों के परमाणु जिस परिमाण (मात्रा) में आपस में मिले, उसी के अनुसार तरह-तरह के वृक्षों की उत्पत्ति हो गई। 

महाराजा नाभिराय ने क्षुधा आदि दुःखों को दूर करने के लिए उपयोग में आने वाले धान्य-वृक्षों व फल-वृक्षों के बारे में मनुष्यों को बताया और जिन वृक्षों से रोग या बाधा हो सकती थी, उनसे दूर रहने का उपदेश दिया।

महाराजा नाभिराय ने मिट्टी से बर्तन बनाने भी सिखाए।

इसी समय में बालक की नाभि में नाल दिखाई दी तो महाराजा नाभिराय ने उस नाल को काटने की विधि भी बताई।

वह आज की सृष्टि का बाल्यकाल था। मनुष्य युग-परिवर्तन के दौर से गुजर रहे थे।

इन कुलकरों में से किसी को अवधि ज्ञान होता था, किसी को जातिस्मरण होता था जिससे वे मनुष्यों के जीवन का उपाय बताते थे, इसलिए वे मनु भी कहलाए।

महाराजा नाभिराय कर्मभूमि की प्रवृत्ति करने वाले और धर्ममार्ग को सबसे पहले प्रकाशित करने वाले भगवान ऋषभदेव ( भगवान आदिनाथ) के पिता थे। 

भगवान ऋषभदेव स्वयंज्ञानी थे। वे गणितशास्त्र, छन्दशास्त्र, अलंकारशास्त्र, व्याकरणशास्त्र, चित्रकला व लेखनप्रणाली का अभ्यास स्वयं करते थे और अन्यों को कराते थे।

इनके भरत, बाहुबली आदि 101 पुत्र और 2 पुत्रियाँ ब्राह्मी व सुंदरी थी। दोनों पुत्रियों को अ,आ,इ,ई आदि अक्षरों का व इकाई, दहाई आदि का ज्ञान दिया।

दोनों कन्याओं को व्याकरण, छंद, न्याय, काव्य, गणित, अलंकार आदि अनेक विषयों की शिक्षा दी।

भगवान ऋषभदेव ने स्वायंभुव नामक व्याकरण बनाया जिसमें 100 अध्याय थे।

सभी पुत्रों को भी अनेक विद्याओं की शिक्षा दी। 

प्रमुख रूप से भरत को नीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र व नृत्यशास्त्र, वृषभसेन को संगीत और वादनशास्त्र, अन्तविजय को चित्रकारी, नाट्यशास्त्र और वास्तुशास्त्र ( मकान आदि बनाने की कला) सिखाई।

बाहुबली को कामशास्त्र, वैद्यक शास्त्र, धनुर्वेद विद्या, पशुओं के लक्षण जानने का ज्ञान और दन्त परीक्षा का ज्ञान कराया।

महाराजा नाभिराय के समय में जो धान्य व फल प्राकृतिक रूप से उत्पन्न हुए थे, उनमें रस आदि कम होने लगे और वे क्षुधापूर्ति में अक्षम होने लगे तो प्रजा महाराजा नाभिराय के पास आकर अपने दुःखों का बयान करने लगी।

महाराजा नाभिराय ने उन्हें भगवान ऋषभदेव के पास भेजा। भगवान ऋषभदेव ने उन्हें असि (तलवार ) के द्वारा अपनी रक्षा करना; मसि (स्याही) के द्वारा लेखन कार्य करना; कृषि, व्यापार, शिल्प कर्म, हस्तकौशल (हाथ की कारीगरी) आदि का ज्ञान दिया।

शासन व्यवस्था का समुचित प्रबन्ध करना सिखाया। भगवान ऋषभदेव ने अपना सारा समय दान और परोपकार में लगाया।

अंत में वैराग्य व तप की सीढ़ीयाँ चढ़ते हुए परमपद (मोक्ष पद) को प्राप्त किया और हमारे लिए मोक्ष मार्ग का प्रवर्तन किया।

हम अंतर्मन से भगवान आदिनाथ को नमन करते हैं और पूरी श्रद्धा से उनके गुणों का स्तवन करते हैं।

भगवान आदिनाथ की जय हो !!!

।।ओऽम् श्री महावीराय नमः।।

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