स्वाध्याय किसे कहते हैं?
स्वाध्याय किसे कहते हैं?
स्व का अर्थ है- अपनी आत्मा और अध्याय का अर्थ है- अध्ययन करना।
स्वयं के निकट बैठ कर अपनी आत्मा के बारे में शास्त्रों के माध्यम से जानना ही स्वाध्याय है। स्वाध्याय करने से अपनी सभी शंकाओं का समाधान हो जाता है और मन में उठने वाले सभी प्रश्नों का हल मिल जाता है। स्वाध्याय को अंतरंग तप कहा गया है जो आत्मा को कर्मों से मुक्त करने में सहायक बनता है।
कुछ लोग कह देते हैं कि हम इतने पढ़े लिखे या विद्वान नहीं हैं जो शास्त्रों की भाषा समझ सकें। इसलिए हमारे आचार्यों ने इसे 4 अनुयोगों में विभाजित किया है।
प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग।
हमें अपना स्वाध्याय प्रथमानुयोग से आरम्भ करना चाहिए। इसमें पुराण पुरुषों के चरित्र का वर्णन है जो हमारी खोई हुई शक्ति व साहस को जागृत करता है।
तत्त्वार्थ सूत्र में स्वाध्याय के 5 भेद बताए गए हैं।
1. वाचना - धर्मग्रंथों को पढ़ना वाचना कहलाता है।
यदि कोई सुनने वाला है तो बोल कर पढ़ना भी वाचना कहलाता है।
2. पृच्छना - वाचना करते हुए यह आवश्यक नहीं है कि हमें सब कुछ समझ में आ जाए। नगर में कोई मुनिराज आए हुए हों तो उनसे या किसी पंडितजी या विद्वान से धर्म से संबंधित प्रश्न पूछना पृच्छना कहलाता है।
वाचना करते समय अपने साथ एक डायरी इत्यादि अवश्य रखनी चाहिए और उसमें वे प्रश्न लिख लेने चाहिए ताकि समय आने पर हम किसी से उनका समाधान पा सकें।
3. अनुप्रेक्षा - केवल पढ़ कर या सुन कर ही स्वाध्याय पूरा नहीं हो जाता।
बहुत से लोगों की यह शिकायत होती है कि जब तक प्रवचन हॉल में बैठे हैं, तब तक तो बहुत आनन्द आता है और मन में वैराग्य की भावना उत्पन्न होती है।
पर बाहर आते ही यदि उनसे पूछा जाए कि क्या सुना, तो वे कुछ नहीं बता पाते। इसलिए सुने हुए या पढ़े हुए का बार-बार चिन्तन करना अनुप्रेक्षा स्वाध्याय है।
4. आम्नाय - आम्नाय का अर्थ 13 पंथी या 20 पंथी आम्नाय नहीं है। दिगम्बर या श्वेताम्बर आम्नाय का इस स्वाध्याय से कोई सम्बन्ध नहीं है।
आम्नाय स्वाध्याय का अर्थ है - शुद्धता।
ग्रंथ में लिखे हुए शब्दों को शब्द व व्याकरण की दृष्टि से शुद्धता पूर्वक पढ़ना ही आम्नाय स्वाध्याय है। छन्द, समास, सन्धि आदि का ध्यान रखते हुए ग्रंथ का विश्लेषण करना या पढ़ना आम्नाय नाम का स्वाध्याय है।
प्राचीन काल में प्रिंटिंग प्रैस आदि तो थे नहीं, एक व्यक्ति पढ़ता था और सौ व्यक्ति लिखते थे, प्रतिलिपियां बनाते थे। तो जिनको आम्नाय नाम के स्वाध्याय का अभ्यास होता था, वे बोल-बोल कर पढ़ते थे और बाकी लोग लिखते थे।
ऐसे लोगों को आचार्यों ने उच्चारणाचार्य की उपाधि से सम्बोधित किया है।
5. धर्मोपदेश - आचार्यों ने बताया है कि स्वाध्याय ने हमें जो सिखाया है, उसके बारे में सब को बताना ही धर्मोपदेश है।
आपने गणेशप्रसाद वर्णी जी का नाम सुना होगा। एक दिन उनकी धर्ममाता चिरौंजीबाई गेहूँ बीन रही थी। वर्णी जी कहीं बाहर से आए और अपनी माता को देख कर बोले कि माँजी, आप क्या कर रही हो?
माँ ने कहा कि बेटा, मैं स्वाध्याय कर रही हूँ।
माँजी, आप झूठ बोल रही हैं। आप तो गेहूँ बीन रही हैं।
माता एक विदुषी महिला थी। उन्होंने कहा कि पहले मुझे यह बताओ कि स्वाध्याय में किस बात का ज्ञान मिलता है? यही न! कि जो ग्रहण करने योग्य है, उसका ज्ञान प्राप्त हो जाए और व्यर्थ की बातों को छोड़ दिया जाए।
स्वाध्याय हमें हेय (अनुपयोगी) को छोड़ना और उपादेय (उपयोगी) को ग्रहण करना सिखाता है। मैं भी तो यही कर रही हूँ। गेहूँ को अपनी तरफ ला रही हूँ और कचरे को बाहर फेंक रही हूँ।
हमारे जीवन की हर चर्या स्वाध्याय हो सकती है।
स्वाध्याय का अर्थ घण्टों तक ग्रन्थ पढ़ने और पन्ने पलटने का नाम नहीं है।
यदि विवेक जागृत हो जाए तो व्यापार करते समय या भोजन बनाते समय भी स्वाध्याय का लाभ लिया जा सकता है।
आत्महित की भावना से सत्शास्त्र का वाचन, मनन या उपदेश आदि देना ही स्वाध्याय है और आलस्य छोड़ कर ज्ञान की आराधना में तत्पर रहने का नाम स्वाध्याय नाम का तप है।
।।ओऽम् श्री महावीराय नमः।।
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