सोलहवें तीर्थंकर भगवान शान्तिनाथ जी (भाग - 4)

सोलहवें तीर्थंकर भगवान शान्तिनाथ जी (भाग - 4)

भगवान शान्तिनाथ जी के पूर्वभव

भगवान शान्तिनाथ जी का 9वाँ पूर्वभव - भरतक्षेत्र में अमिततेज विद्याधर

‘अशनिघोष’ विद्याधर से अमिततेज और श्रीविजय का युद्ध

एक बार राजा श्रीविजय अपनी रानी सुतारा के साथ विमान में बैठ कर वन-विहार करने गए। वहाँ उनका पूर्वभव का शत्रु कपिल का जीव ‘अशनिघोष’ विद्याधर राजा था। वह सुतारा पर मोहित होकर उसका अपहरण करके ले गया। इससे क्रोधित होकर अमिततेज और श्रीविजय विशाल सेना लेकर अशनिघोष से युद्ध करने लगे।

अशनिघोष भयभीत होकर भाग गया। उसके सद्भाग्य से उसी समय ‘विजय बलभद्र मुनि’, जो केवली रूप में विचरण कर रहे थे, गंधकुटी सहित वहाँ पधारे। अशनिघोष ने उन भगवान की धर्मसभा में प्रवेश किया और प्रभु के दर्शन से उसका चित्त शांत हुआ। अमिततेज और श्रीविजय भी क्रोधाविष्ट होकर उसे मारने के लिए उसके पीछे धर्मसभा में आए, पर वहाँ आते ही उनका क्रोध दूर हो गया। प्रभु के समीप आकर सबके परिणाम शांत हो गए। उसी समय अशनिघोष की माता सुतारा को साथ लेकर वहाँ आ पहुँची और उसे उसके पति को सौंप कर अपने पुत्र के अपराध की क्षमा-याचना करने लगी। वास्तव में जिनेन्द्रदेव के सान्निध्य में क्रूर प्राणी भी वैरभाव छोड़ कर शांत हो जाते हैं, तो फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या!!

प्रभु ने दिव्यध्वनि में कहा - हे जीवों! आत्मा ज्ञानस्वरूप है। क्रोध उसका स्वभाव नहीं है। जीव का स्वभाव शांति और आनन्दस्वरूप है। क्रोध आदि कषायों से जीव की शांति का घात होता है। आत्म-स्वरूप की महिमा का चिन्तन करने से कषाय भाव शांत हो जाते हैं और सम्यक्त्व आदि भाव प्रगट हो जाते हैं। भव्य जीव ऐसे सम्यक्त्व को प्रगट करके भवदुःखों से छूट कर सिद्धिसुख को प्राप्त करते हैं।

प्रभु का उपदेश सुन कर अमिततेज की अन्तर्मुखी दृष्टि जागृत हुई और अंतर में परमात्व तत्त्व का अनुभव करके उसने अपूर्व सम्यग्दर्शन प्रगट किया। इस प्रकार आठ भव पूर्व से एक तीर्थंकर की आत्मसाधना प्रारम्भ हुई।

श्रीविजय ने भी उसी समय सम्यग्दर्शन धारण किया। देशव्रत धारण किए हुए अमिततेज को अपने पूर्वभव जानने की जिज्ञासा हुई तो उन्होंने केवली भगवान से विनयपूर्वक पूछा - हे सर्वज्ञदेव! मुझे और श्रीविजय को एक-दूसरे के प्रति परम स्नेह क्यों है और इस अशनिघोष ने मेरी बहिन सुतारा का अपहरण क्यों किया?

भगवान ने राजा श्रीषेण, अनिन्दिता रानी व सत्यभामा के विषय में सारे पूर्वभवों के बारे में उसे बताया और यह भी बताया कि पूर्वभव के मोह के कारण अशनिघोष ने सुतारा का अपहरण किया। यह भी तुम्हारी मोक्ष साधना प्रारम्भ करने का निमित्त ही बना। अब आत्माधना में उन्नति करते-करते 9वें भव में तुम्हारी आत्मा भरतक्षेत्र में 5वें चक्रवर्ती और 16वें तीर्थंकर होकर मोक्ष प्राप्त करेगी। तब यह श्रीविजय तुम्हारा भाई होकर ‘चक्रायुध गणधर’ होगा। अब शेष अगले भवों में भी यह तुम्हारे साथ ही रहेगा।

केवली प्रभु के श्रीमुख से अपने तीर्थंकर पद की और ‘मोक्ष’ की आज्ञा सुन कर अमिततेज अतिशय आनन्द में निमग्न हो गए। श्रीविजय को भी अपने गणधर पद की बात सुनकर महान आनन्द हुआ।

अशनिघोष को अपने पूर्वभव की कथा सुनकर जातिस्मरण हुआ और वैराग्य प्राप्त करके उसने दीक्षा ले ली। सुतारा देवी और ज्योतिप्रभा ने भी आर्यिका दीक्षा ग्रहण की। इस प्रकार सब जीवों ने केवली प्रभु के उपदेश से आत्महित किया।

क्रमशः

।।ओऽम् श्री शान्तिनाथ जिनेन्द्राय नमः।।

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