बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी (भाग - 12)
बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी (भाग - 12)
राजा जरासंध का क्रोध
इक्कीसवें तीर्थंकर भगवान नमिनाथ जी का शासनकाल 5 लाख वर्ष तक चला। तत्पश्चात् बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी का अवतार हुआ। उनकी आयु 1000 वर्ष तथा शरीर की ऊँचाई 10 धनुष थी।
बचपन से ही उनका अलौकिक जीवन देख कर लोग कह उठते थे कि इस बालक का जीवन जगत से भिन्न प्रकार का है। उनका अन्तर्मुखी जीवन ज्ञानचेतना से सुशोभित था और धर्मसाधना की अचिन्त्य महिमा को प्रगट करता था। प्रभु का जीवन शांत और गम्भीर था, जो अन्य जीवों के चैतन्य भावों की उर्मियों को भी जागृत करता था।
देवों द्वारा निर्मित द्वारिका नगरी की शोभा भी अद्भुत थी। अनेक मोक्षगामी चरमशरीरी धर्मात्मा जीव वहाँ निवास करते थे। सौराष्ट्र देश का विशाल समुद्र देख कर प्रभु नेमिकुमार अपने अंतर में महान् चैतन्य-रत्नाकर का ध्यान धरते थे। उस समय उनकी मुखमुद्रा पर समुद्र से भी अधिक गम्भीर शांत रस का समुद्र दिखाई देता था।
राजा जरासंध से युद्ध और श्री कृष्ण की विजय -
एक बार मगध देश के कुछ व्यापारी समुद्र-मार्ग से व्यापार करने निकले। वे पुण्योदय से मार्ग भूलकर नवनिर्मित द्वारिका नगरी आ पहुँचे। मार्ग भूलने से ही उन्हें द्वारिका नगरी की दिव्य शोभा और नेमिप्रभु के दर्शन हुए। उन्होंने समुद्र के बीच में ऐसी नगरी कभी नहीं देखी थी। वे नेमिप्रभु के दर्शन करके और द्वारिका नगरी का वैभव देख कर आश्चर्यचकित हो गए। उन्हें व्यापार में भी खूब लाभ हुआ। इस प्रकार धन और धर्म के दोनों उत्तम रत्न लेकर वे राजगृही पहुँचे।
यहाँ आकर उन्होंने अर्धचक्रवर्ती महाराजा जरासंध को वे उत्तम रत्न भेंट किए। ऐसे अनुपम रत्न देख कर राजा आनन्दित हुए और पूछने लगे - हे महाजनों! तुम इतने सुन्दर रत्न कहाँ से लाए हो? ये रत्न तो ऐसे जगमगा रहे हैं, मानो हमसे कुछ कह रहे हों।
महाजनों ने कहा - हे महाराज! हमने सौराष्ट्र देश के समीप समुद्र के बीच में ऐसी अद्भुत सुन्दर द्वारिका नगरी देखी, मानो पाताल लोक से निकली हो। भरतक्षेत्र के बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी वहाँ विराजते हैं। हमने उनके भी दर्शन किए। उनकी कितनी प्रसन्न शांत मुद्रा है और कैसा गम्भीर, शांत वैराग्य झलकता है उनके चेहरे पर! उस नगरी में प्रभु के जन्म से पहले ही देवों ने करोड़ों रत्नों की वर्षा की थी। उन्हीं में से कुछ रत्न लाकर हमने आपको भेंट किए हैं। वहाँ श्रीकृष्ण-बलभद्र आदि राज्य करते हैं।
यादवों का नाम और उनके वैभव का वर्णन सुन कर राजा जरासंध क्रोध से आगबबूला हो गया। उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई। ‘अरे! मैं तो ऐसा मानता था कि वे यादव मेरे भय से अग्नि में जल मरे हैं। पर वे तो जीवित हैं और महान विभूति सहित द्वारिका नगरी में राज्य कर रहे हैं। अब मैं उनका विनाश करके द्वारिका नगरी को जीत लूँगा।’
क्रमशः
।।ओऽम् श्री नेमिनाथ जिनेन्द्राय नमः।।
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