अर्हंत भक्ति विधान

अर्हंत भक्ति विधान

(परम पूज्य उपाध्याय श्री विशोकसागर महाराज की लेखनी से)

परम पूज्य श्रमण मुनि श्री 108 विशोक सागर जी मुनिराज के पावन सान्निध्य में पुण्योदय क्षेत्र, हांसी (जिला हिसार) में आज 7.11.2022 को ‘अर्हंत भक्ति विधान’ का आयोजन किया गया, जिसका भक्तों ने बढ़-चढ़कर पुण्य लाभ लिया। मुनि श्री ने ‘अर्हंत भक्ति विधान’ का महत्व बताते हुए कहा कि इस विधान में अर्हत भक्ति की भावना भाई जाती है। ‘अर्हंत’ शब्द का अर्थ बताते हुए कहा कि यह शब्द दो शब्दों से मिल कर बना है - अरि + हंत। अरि का अर्थ है शत्रु तथा हंत का अर्थ है - मारने वाला। ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अंतराय व मोहकर्म - इन चार शत्रुओं का हनन करने वाले ‘अर्हत’ या अरिहंत कहलाते हैं। अरिहंत के गुणों में अनुराग की भावना रखना ही ‘अर्हंत भक्ति’ है।

जैसे शास्त्र का फल शांति है, संपत्ति का फल दान है, लक्ष्मी का फल कीर्ति है, श्रम का फल धन है, मुनिपद में की जाने वाली तपस्या का फल ज्ञान है, शूरता का फल भयभीत मनुष्यों की पीड़ा नष्ट करना है, उसी प्रकार यौवन का फल दीक्षा धारण करना है और जन्म लेने का फल श्री जिनेंद्र देव के चरण कमल युगल की निरंतर सेवा करना है।

एक भक्त अरिहंत देव से प्रार्थना करता है कि हे जिनेश्वर! मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए जिससे मुझे भी मुक्ति प्राप्त हो जाए। कल्पवृक्ष, कामधेनु या चिंतामणि रत्न चिंतन करने व मांगने पर इच्छित वस्तु प्रदान करते हैं लेकिन जिनेंद्र भगवान की स्तुति करने से बिना माँगे और बिना चिंतन किए ही विघ्नों के समूह डाकिनी-शाकिनी-भूत-पिशाच और सर्प आदि का भय तुरन्त नष्ट हो जाता है तथा विष भी निर्विष को प्राप्त हो जाता है।

अर्हंत भक्ति मुक्ति का शाश्वत सोपान है। अर्हंत देव का सच्चा भक्त यदि अग्नि में भी प्रवेश कर जाए तो वह अग्नि भी निर्मल जल में परिणत हो जाती है। अर्हंत भक्ति जीवन को पावन और पुनीत बनाने का सशक्त माध्यम है। अर्हंत देव के स्वरूप को जान कर, उनके गुणों को पहचान कर, उनके जैसा बनने की अहर्निश भावना भाई जाती है - यही अर्हंत भक्ति भावना है। अर्हंत भक्ति वह औषधि है जिसके सेवन से अज्ञान रूपी रोग दूर हो जाता है।

यह अज्ञान रूपी अंधकार की समाप्ति के लिए दिव्य प्रकाश के समान है। अर्हंत भक्ति से पूर्व संचित पापकर्म क्षय हो जाते हैं। अर्हंत देव का भक्त कभी दुःख, दारिद्र, असंतोष, विपत्ति, ईर्ष्या, राग, द्वेष आदि दोषों से दूषित नहीं होता अपितु गुण-समुद्र बन जाता है। अतः संसार का विच्छेद करने वाली भक्ति ही अर्हंत भक्ति है।

अर्हंत देव का सच्चा भक्त संसार की बातों को सुनकर भी अनसुना कर दे, देखकर भी अनदेखा कर दे, अनुभव कर के भी उसकी अनुभूति न करे; स्वार्थ को छोड़ कर परमार्थ को अनुभूति में लाए, उसी को सुने, उसे ही देखने का प्रयास करे, निरन्तर उसी को अपनी चर्या में लाने की भावना भाए, तभी हमारी अर्हंत भक्ति सार्थक होगी तथा हमारे जीवन में अमृत-बोध प्रदान करेगी।

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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