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Showing posts from January, 2026

भगवान महावीर स्वामी (30)

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   तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (30) जन्मकल्याणक   तीर्थंकर बनने वाले आत्मसाधक आत्मा की पहचान बाह्य नेत्रों द्वारा नहीं, किन्तु अतीन्द्रिय ज्ञान द्वारा ही होती है। इसलिए जन्मकल्याणक में तुम प्रभु को मात्र इन्द्रियज्ञान द्वारा न देखकर उन्हें अतीन्द्रिय ज्ञान द्वारा पहचानना; उससे प्रभु के कल्याणक के साथ तुम्हारा भी कल्याण होगा, तुम्हें सम्यग्दर्शनादि कल्याणकारी भाव प्राप्त होंगे। अति शोभायमान शाश्वत मेरुपर्वत जिनप्रभु के जन्माभिषेक से अत्यधिक सुसज्जित हो उठा; अथवा ऐसे कहो कि जिनराज ने आकर मेरु की शोभा का हरण कर लिया; क्योंकि लोग तो मेरु की दिव्य शोभा को देखना छोड़कर प्रभु के मुखारविन्द को निहार रहे थे। प्रभु में लगे हुए उनके चित्त को दूसरा कोई आकर्षित नहीं कर सकता था। मेरु पर ‘स्थापनारूप जिन’ तो सदा-शाश्वत विराजते हैं, तदुपरान्त आज तो ‘द्रव्यजिन’ तथा अंशतः ‘भावजिन’ वहाँ पधारे थे; फिर उसके गौरव की क्या बात? अहा, वह तो जगत का एक पूजनीय तीर्थ बन गया था। वहाँ ध्यान धरकर अनेक मुनिवर निर्वाण प्राप्त करते हैं, इसलिए वह सिद्धिधाम (निर्वाण तीर्थ) भी है। अहा, तीर्थ स्वरूप आत्मा का जहा...

भगवान महावीर स्वामी (29)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (29) जन्म कल्याणक वैशाली में महावीर-जन्म की मंगल बधाई आज तो बधाई राजा सिद्धार्थ दरबार जी... त्रिशलादेवी कुंवर जायो जग का तारनहार जी... वैशाली में नौबत बाजे देव करें जयकार जी... भव्यों के इस भाग्योदय से हर्षित सब नरनार जी... आत्मा को धन्य करने, समकित को उज्ज्वल करने; बाल-तीर्थंकर दर्शन करने, चलो जाएं वैशाली धाम। (इस पुस्तक के लेखक ने वीर सं. २५०२ की चैत्र शुक्ला १३ का मंगलवार-दिवस वीर जन्मधाम वैशाली में आनन्द पूर्वक मनाया था; इस पुराण का कुछ भाग वहीं रहकर लिखा है और वीरप्रभु की रथयात्रा के समय इसकी पाण्डुलिपि को रथ में विराजमान करके उसकी पूजा की है।) चैत्रशुक्ला त्रयोदशी के मंगल-दिन वैशाली-कुण्डग्राम में भगवान महावीर का अवतार हुआ। उस काल (ईसवी सन पूर्व 598 वर्ष, तारीख 28 मार्च सोमवार को) समस्त ग्रह सर्वोच्च स्थान में थे। ज्योतिषविज्ञान के अनुसार ऐसा उत्तमयोग 10 कोड़ाकोड़ी सागरोपम में 24 बार ही आता है और वीरप्रभु की यह जन्म-कुण्डली उनका बालब्रह्मचारिपने को सूचित करती है। तीर्थंकर का अवतार होते ही तीनों लोक आश्चर्यकारी आनन्द से खलबला उठे। इन्द्र ऐरावत हाथी...

भगवान महावीर स्वामी (28)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (28) भगवान महावीर : पंचकल्याणक माता त्रिषला और देवियों के मध्य ऐसे भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रश्नोत्तर हुए और धर्मचर्चा चली। कई बार तो ऐसा होता था कि माता प्रश्न पूछें, तब चाहे देवी को उत्तर न आता हो, किन्तु ज्यों ही माता के उदर में विराजमान तीर्थंकर का स्मरण करते ही उन्हें तुरन्त उत्तर आ जाता था। मानो प्रभु स्वयं ही उदर-भवन में बैठे-बैठे सब प्रश्नों के उत्तर दे रहे हों। उदार आत्मा अवधिज्ञानी है, तो उनकी सेवा करने वाली देवियाँ भी अवधिज्ञानी हैं, उनमें से कुछ तो सम्यक्दर्शन को प्राप्त हैं और कुछ प्राप्त करने में तत्पर हैं- ऐसी वे देवियाँ माता से पूछती हैं - हे माता! अनुभूति स्वरूप परिणमित आत्मा आपके अंतर में विराजमान है, तो ऐसी अनुभूति कैसे होती है? माता ने कहा - हे देवी! अनुभूति की महिमा अति गंभीर है। आत्मा स्वयं ज्ञान की अनुभूति स्वरूप है। उस ज्ञान की अनुभूति में राग की अनुभूति नहीं;- ऐसा भेदज्ञान हो, तब अपूर्व अनुभूति प्रकट होती है। दूसरी देवी ने पूछा - हे माता! आत्मा की अनुभूति होने से क्या होता है? ‘देवी, सुनो! अनुभूति होने पर सम्पूर्ण आत्मा स्वयं अ...

भगवान महावीर स्वामी (27)

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   तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (27) भगवान महावीर : पंचकल्याणक आज त्रिशलादेवी के हर्षोल्लास का पार नहीं था; और जब राजसभा में सिद्धार्थ महाराजा के श्रीमुख से उन स्वप्नों का महान फल सुना कि चौबीसवें तीर्थंकर का उनके गर्भ में अवतरण हुआ है, तब तो उन्हें किसी अचिन्त्य निधान की प्राप्ति जैसा अपार हर्ष हुआ। सारी नगरी में भी चारों ओर आनन्द छा गया। लोगों के मुख से ‘धन्य है, धन्य है!’ के उद्घोष निकल रहे थे और कह रहे थे कि “अपनी नगरी में हम बाल तीर्थंकर को खेलते-बोलते हुए देखेंगे, हम सब का जीवन धन्य हो!” इन्द्र-इन्द्राणी ने भी वैशाली आकर माता-पिता का सम्मान किया; दिग्कुमारी देवियाँ त्रिशला माता की सेवा करने लगीं। देव तो ठीक, नरक के जीवों ने भी दो घड़ी साता का वेदन किया; और उससे तीर्थंकर महिमा जानकर गहरे विचार में मग्न होने से अनेक जीव चैतन्यविभूति को लक्षगत करके सम्यग्दर्शन को प्राप्त हुए। धन्य है तीर्थंकर के कल्याणक का प्रभाव और धन्य है उनको देखने वाले! अहा! माता के उदर में विद्यमान वह जीव, अपर्याप्त दशा में भी मति-श्रुत-अवधि तीन ज्ञान का धारी था, सम्यग्दृष्टि था, आत्मानुभूति के वैभव सहि...

भगवान महावीर स्वामी (26)

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 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (26) भगवान महावीर : पंचकल्याणक यत् स्वर्गावतरोत्सवे यद्भवत् जन्माभिषेकोत्सवे, यत् दीक्षाग्रहणोत्सवे यदखिल ज्ञानप्रकाशोत्सवे। यत् निर्वाणगमोत्सवे जिनपतेः पूजाद्भुतं तद्रवे; संगीतः स्तुति मंगलैः प्रसरतां मे सुप्रभातोत्सवः॥ सर्वज्ञ भगवान महावीर स्वामी के पंचकल्याणक जगत का कल्याण करें। हे जिनेन्द्र! आप श्री के मंगल पंचकल्याणक प्रसंग पर आपकी शुद्धात्मा की दिव्य महिमा को हृदयंगम करके इन्द्रादि आराधक भक्तजनों ने अद्भुत पूजन-स्तुतिपूर्वक जो मंगल उत्सव किया, उसके मधुर संस्मरण आज भी आनंद उत्पन्न कर रहे हैं; मानो आप ही मेरे हृदय में विराज कर बोल रहे हैं। ऐसे आपके मंगल चिन्तन पूर्वक आपके पंचकल्याणक का भक्ति सहित आलेखन करता हूँ। जिन भावों से स्वर्ग के हरि ने आपकी भक्ति की थी, उन्हीं भावों से मैं इस मनुष्य लोक का हरि आपकी भक्ति करता हूँ। अहो! त्रिकाल मंगल रूप उन तीर्थंकरों को नमस्कार हो कि जिनके पंचकल्याणक अनेक जीवों के कल्याण के कारण हुए हैं। भगवान महावीर की आत्मा का भव-भ्रमण पूरा हुआ; अब अंतिम तीर्थंकर अवतार में उनके पंचकल्याणक होते हैं। उस महान आत्मा का अनादिकाल ...

भगवान महावीर स्वामी (25)

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 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (25) प्रश्न - क्षायिक सम्यक्दर्शन तो आत्मा की विशुद्धि है, उसके लिये बाह्य आलम्बनरूप केवली-श्रुतकेवली के पाद-मूल की समीपता किसलिये आवश्यक है? उत्तर - तीर्थंकरों आदि का महात्म्य जिसने नहीं देखा, ऐसा जीव को दर्शनमोह के क्षय के कारण रूप परिणाम उत्पन्न नहीं होते। ‘अदिट्ठ तिथ्थयरादिमाहप्पस्स दंसणमोहखवण णिबन्धणकरण परिणामाणमणुप्पत्तीदो’ (यह बात तीर्थंकर प्रकृति के बंधन में भी समझ लेना अर्थात् क्षायिक सम्यकत्व की भाँति तीर्थंकर प्रकृति का प्रारम्भ भी केवली या श्रुतकेवली के सान्निध्य में ही होता है। कषाय प्राभृत, गाथा-110) (यहाँ, तीर्थंकर के कारणरूप दर्शनविशुद्धि आदि सोलह भावनाओं का अति सुन्दर भावपूर्ण वर्णन षट्खण्डागम, धवला आदि के आधार से किया गया है) इस प्रकार उन नन्द मुनि ने दर्शनविशुद्धि से लेकर प्रवचन वत्सलत्व तक की सोलह मंगल-भावनाओं द्वारा तीर्थंकर प्रकृति बांधना प्रारम्भ किया। यद्यपि एक ओर अघाति ऐसी तीर्थंकर प्रकृति बंध रही थी, तो दूसरी ओर उसी समय वे मोहादि घाति-कर्मों को नष्ट-भ्रष्ट कर रहे थे और जिसके बिना तीर्थंकरत्व की सम्भावना नहीं होती- ऐसी सर्वज्ञत...

भगवान महावीर स्वामी (24)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (24) एक बार बसन्त ऋतु का आगमन होते ही वन-उपवन नवीन कोपलों एवं पुष्पों से खिल उठे; उसी के साथ-साथ जैसे रत्नत्रय-पुष्पों का उद्यान भी मानो खिल गया हो - ऐसे ‘प्रोष्ठिल’ नाम के श्रुतकेवली मुनिराज का श्वेतपुरी के उपवन में आगमन हुआ। अहा, कैसी उनकी अनुपम मुखमुद्रा! मानो वे चेतन्य की शान्ति में निमग्न हों। शशक जैसे प्राणी आश्चर्य से उनकी ओर देख रहे हैं और उनके चरणों में बैठ गये हैं। ज्ञान के गम्भीर समुद्र, उन मुनिराज को देखकर नन्द राजा को अति आनन्द हुआ - अहा! मोक्ष की जीवंत मूर्ति! भक्तिपूर्वक वन्दन करके नन्द राजा ने उन श्रुतकेवली से वीतरागता का उपदेश तथा अपने पूर्वभवों की बात सुनी। स र्वावधिज्ञानी एवं चरमशरीरी ऐसे उन श्रुतकेवली भगवान ने उनकी नरकदशा, वासुदेव पदवी, सिंहपर्याय में सम्यक्त्व प्राप्ति, चक्रवर्ती पद आदि पूर्वभवों का वर्णन करके कहा - हे भव्यात्मा! एक भव के पश्चात तुम भरतक्षेत्र के चौबीसवें तीर्थंकर होकर मोक्षपद प्राप्त करोगे। यह सब सुनकर नन्द राजा को भी अपने पूर्वभवों का जातिस्मरण हुआ; अपने पूर्वभव उन्होंने चित्रपट की भाँति देखे, तथा भविष्य की सुन...

भगवान महावीर स्वामी (23)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (23) (पाँचवाँ और चौथा पूर्वभव) अहा! सुख का सरोवर अपने में पाकर ‘असत’ ऐसे मृगजल की ओर कौन दौड़ेगा? चारित्रदशा का चैतन्य सरोवर प्राप्त करके चक्रवर्ती के विषय-भोगों को छोड़ना, वह कोई बड़ी बात नहीं है। विदेहक्षेत्र में राजचक्रीपन छोड़कर जो मुनि हुए हैं और अब चौथे भव में भरतक्षेत्र में धर्मचक्री-तीर्थंकर होनेवाले हैं - ऐसे वे प्रियमित्र मुनिराज जगत में सर्वप्रिय थे, और सर्वजीवों के हितकारी मित्र थे।  उत्तम प्रकार से चारित्रपालन करके उन्होंने संल्लेखना पूर्वक शरीर का त्याग किया और उत्तम रत्नत्रय की आराधना करते-करते शेष रह गये किंचित् कषायकरण के महान पुण्यफल का उपभोग करने हेतु सहस्रार नाम के बारहवें सूर्यप्रभ स्वर्ग में देवरूप से उत्पन्न हुए। वहाँ यद्यपि उनको पुण्यजन्य वैभव अपार था, परन्तु अरे! जो कषाय का फल है, उसका कितना वर्णन करें। कषायकलंक के उस फल का विस्तार करने से अथवा उसकी प्रशंसा सुनकर मुमुक्षु जीव लज्जित होते हैं कि अरे! हम अपने चैतन्य की शान्ति को साधने वाले हैं। उसके बीच कषाय तो कलंकरूप है।  हम तो अपनी शान्ति का विस्तार करके चैतन्यवैभव की ...

भगवान महावीर स्वामी (22)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (22) विदेहक्षेत्र में प्रियमित्र चक्रवर्ती पंचम एवं बारहवें स्वर्ग में देव (पाँचवाँ और चौथा पूर्वभव) अपने चरित्रनायक भगवान महावीर अन्तिम भव में धर्मचक्री होंगे; उससे पूर्व वे विदेहक्षेत्र में राजचक्रवर्ती हुए। स्वर्ग से वे महात्मा विदेह की क्षेमद्युति नगरी में धनंजय राजा के घर पुत्ररूप में उत्पन्न हुए, उनका नाम था ‘प्रियमित्र’ । एक दिन राजा धनंजय ने संसार से विरक्त होकर पुत्र प्रियमित्र को राज्य सौंप दिया और स्वयं स्वभावमय सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र को ग्रहण करके तप द्वारा सुशोभित हुए। राज्यलक्ष्मी छोड़कर तपलक्ष्मी द्वारा वे अधिक शोभायमान हो रहे थे। इधर राजा प्रियमित्र विशाल राज्य के साथ-साथ शुद्ध सम्यक्त्व सहित अणुव्रतों का भी पालन करते थे और जगत को यह प्रत्यक्ष कर रहे थे कि इतने बड़े राज्यभार के बीच भी आत्मा की आराधना हो सकती है। धर्मी के अंतर में आत्मा की जितनी महिमा है, उतनी किसी और को नहीं है। एक बार उनके शस्त्र भंडार में चक्रवर्ती पद के वैभव का सूचक सुदर्शन चक्र प्रकट हुआ, परन्तु उससे वे किंचित आश्चर्यचकित नहीं हुए। अहा! तीन लोक में सर्वश्रेष्ठ ए...

भगवान महावीर स्वामी (21)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (21) हरिषेण राजा और पश्चात् स्वर्ग में देव (7वाँ और छठा पूर्वभव) बंधुओ! आप भगवान महावीर के पूर्वभवों का वर्णन पढ़ रहे हैं। अब उनके मात्र सात ही भव शेष हैं। उनमें से तीन भव तो देव पर्याय के हैं और अन्य चार भव उत्तम रत्नत्रय धर्म की आराधना सहित हैं; जिनमें एक चक्रवर्ती का भव है और एक तीर्थंकर का अवतार है। वीर प्रभु की आत्मा द्वारा की गई उस आराधना को देखकर तुम्हें भी आराधना का उत्साह जागृत होगा और उस आराधना में आत्मा को लगाने से तुम्हें सर्वज्ञ महावीर का साक्षात्कार होगा। सर्वज्ञ महावीर के साक्षात्कार के साथ ही उनकी जैसी अपनी परम-आत्मा की स्वानुभूति रूप साक्षात्कार होने पर, जो अतीन्द्रिय परम आनन्द होता है, उसका क्या कहना! अहो, वह तो मोक्षसुख की झाँकी है और वही मंगल निर्वाण-महोत्सव है। जो जानता महावीर को, चेतनमयी शुद्धभाव से। वह जानता निजात्मा को, सम्यक्त्व के आनन्द से॥ अपने चरित्रनायक का परिणमन अब मोक्ष की ओर तीव्रगति से हो रहा है। वे आठवें स्वर्ग से एक समय में असंख्य योजन की गति से मनुष्य लोक में आये और उज्जयिनी नगरी में वज्रधर राजा के पुत्र के रूप में अ...

भगवान महावीर स्वामी (20)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (20) कनकध्वज राजा और आठवें स्वर्ग में देव (9वाँ तथा 8वाँ पूर्वभव) स्वर्ग से च्यवकर वह हरिध्वज (सिंहकेतु) देव, विदेहक्षेत्र में कनकप्रभ राजा का पुत्र हुआ; उसका नाम था कनकध्वज । युवा होने पर पिता ने उसे राज्य सौंपकर दीक्षा ले ली। अपने चरित्रनायक राजा कनकध्वज एक बार सुदर्शन वन में यात्रा करने गए। सुन्दर वृक्षों और फल-फूलों से भरे हुए उद्यान की शोभा निहारते हुए वह आगे बढ़े कि उन्होंने शिला पर छोटे-से किन्तु महान तेजस्वी मुनिराज को ध्यान में बैठे देखा। अहा! कितनी अद्भुत थी उनकी मुद्रा! अंतरंग अतीन्द्रिय शान्ति की दिव्य झलक उनकी मुद्रा पर दृष्टिगोचर होती थी। राग-द्वेष को नष्ट करके वीतरागता द्वारा वे सुशोभित हो रहे थे। क्षमा भाव तो एक क्षण को भी विस्मरण नहीं करते थे। उनके रत्नत्रय के प्रभाव से आस-पास के वृक्ष भी फलाच्छादित एवं पुष्पाच्छादित हो उठे थे। ऐसे मुनिराज को देखकर कनकध्वज ऐसे प्रसन्न हुए जैसे उन्हें किसी अपूर्व निधान की प्राप्ति हुई हो। अत्यन्त हर्ष से जिनका रोम-रोम उल्लसित हो रहा है - ऐसे राजा ने मुनिराज के चरणों में नमस्कार किया और अति अनुराग सहित उ...

भगवान महावीर स्वामी - (19)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (19) सौधर्म स्वर्ग में सिंहकेतु देव (दसवाँ पूर्वभव) सिंहपर्याय में सम्यक्त्व प्राप्त करके, संल्लेखना सहित समाधि मरण करके सौधर्मस्वर्ग में हरिध्वज देवरूप में अवतरित हुए अपने चरित्रनायक को देखते ही स्वर्ग के देव जयजयकार करने लगे। मंगलवाद्य बजने लगे; देव-देवांगनाओं ने जिनेन्द्र पूजन सहित मंगल उत्सव किया।  अहो! सम्यक्त्व सहित विरक्ति का फल अद्भुत है। उस हरिध्वज अथवा सिंहकेतु देव ने अवधिज्ञान द्वारा जान लिया कि मैं पहले सिंह पर्याय में था और दो मुनिराजों ने प्रतिबोध देकर मुझे धर्म प्राप्त कराया; उन्हीं के प्रताप से मैं यहाँ उत्पन्न हुआ हूँ। मुझ पर उनका महान उपकार है। इस प्रकार मुनिराजों के उपकार का चिन्तन करता हुआ वह देव अत्यन्त भक्ति-पूर्वक मुनिवरों के पास आया और कल्पवृक्ष के अचेतन दिव्यपुष्पों द्वारा उनके चरणों की पूजा करके बोला - “हे प्रभो! एक मास पूर्व आपने जिस सिंह को प्रतिबोध दिया था, वही मैं हूँ। सम्यग्दर्शन पूर्वक समाधि मरण करके मैं सिंह से सौधर्म स्वर्ग का देव हुआ हूँ और आपके उपकार का स्मरण होने से आपके दर्शन करने आया हूँ। हे प्रभो! आपके प्रस...