भगवान महावीर स्वामी (22)

  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (22)

विदेहक्षेत्र में प्रियमित्र चक्रवर्ती पंचम एवं बारहवें स्वर्ग में देव

(पाँचवाँ और चौथा पूर्वभव)

अपने चरित्रनायक भगवान महावीर अन्तिम भव में धर्मचक्री होंगे; उससे पूर्व वे विदेहक्षेत्र में राजचक्रवर्ती हुए। स्वर्ग से वे महात्मा विदेह की क्षेमद्युति नगरी में धनंजय राजा के घर पुत्ररूप में उत्पन्न हुए, उनका नाम था ‘प्रियमित्र’

एक दिन राजा धनंजय ने संसार से विरक्त होकर पुत्र प्रियमित्र को राज्य सौंप दिया और स्वयं स्वभावमय सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र को ग्रहण करके तप द्वारा सुशोभित हुए। राज्यलक्ष्मी छोड़कर तपलक्ष्मी द्वारा वे अधिक शोभायमान हो रहे थे।

इधर राजा प्रियमित्र विशाल राज्य के साथ-साथ शुद्ध सम्यक्त्व सहित अणुव्रतों का भी पालन करते थे और जगत को यह प्रत्यक्ष कर रहे थे कि इतने बड़े राज्यभार के बीच भी आत्मा की आराधना हो सकती है। धर्मी के अंतर में आत्मा की जितनी महिमा है, उतनी किसी और को नहीं है। एक बार उनके शस्त्र भंडार में चक्रवर्ती पद के वैभव का सूचक सुदर्शन चक्र प्रकट हुआ, परन्तु उससे वे किंचित आश्चर्यचकित नहीं हुए। अहा! तीन लोक में सर्वश्रेष्ठ एवं सुन्दर ऐसा चैतन्यरत्न जिन्होंने स्वानुभूति में प्राप्त कर लिया है, उन महात्मा को जगत के जड़रत्नों से क्या आश्चर्य होगा? मोक्षसाम्राज्य प्रदान करने वाला सम्यग्दर्शनरूप सुदर्शनचक्र जिनके अन्तर में निरन्तर चल रहा है, उन्हें बाह्य पौद्गलिक सुदर्शनचक्र की क्या महत्ता लगेगी? वे धर्मात्मा प्रियमित्र जानते थे कि यह बाह्य वैभव की प्राप्ति कोई मेरी चैतन्य-आत्मा का फल नहीं है; परन्तु यदि साथ रहने वाले राग का भी ऐसा आश्चर्यकारी बाह्य फल है, तो उस रागरहित आराधना के अंतरंग फल का तो क्या कहना! उस फल का स्वाद तो धर्मात्मा ही ले सकते हैं और उसके समक्ष जगत के समस्त वैभव बिलकुल नीरस लगते हैं।

चक्ररत्न प्राप्त होने पर उन महाराज प्रियमित्र ने विदेहक्षेत्र के छह खण्डों की दिग्विजय की; छह खण्ड में रहने वाले समस्त मनुष्य, विद्याधर एवं देवों को भी उन्होंने वश में कर लिया। चौदह रत्न एवं नवनिधान के उपरान्त सोलह हजार देव और बत्तीस हजार मुकुटधारी राजा उनकी सेवा करते थे; उनकी छियानवे हजार रानियाँ तथा छियानवे करोड़ पैदल, लाखों उत्तम गज आदि की विशाल सेना थी; तथापि इस विषय सामग्री में जीव को तृप्ति देने का गुण कदापि नहीं है; यह सब तो आकुलता देनेवाले हैं।

एक चैतन्यतत्त्व ही जीव को सच्ची तृप्ति एवं शान्ति प्रदान करता है - ऐसा वे धर्मात्मा जानते थे; इसलिए भोगों में कहीं मूर्छित नहीं होते थे; जल में कमलपत्र की भाँति अलिप्त रहते थे। चक्रवर्ती के चौदह रत्न एवं नवनिधान आदि वैभव का वर्णन करके शास्त्रकार ऐसा बतलाना चाहते हैं कि हे जीवों! देखो, यह तो सब उस जीव के रागादि औदयिक भावों का बाह्य फल है, उसी समय उसके अंतर में स्वाभाविक चेतना के जो भाव (सम्यक्त्वादि) वर्त रहे हैं, वे कैसे हैं और उनका फल कैसा सुन्दर है। उनका स्वरूप जानोगे, तभी तुम धर्मात्मा के जीवन को भलीभाँति जान सकोगे और उसे जानने का सम्यक् फल आयेगा। मात्र औदयिक भाव को ही देखने से ज्ञानी का सच्चा स्वरूप जानने में नहीं आता। इसीलिए बारम्बार कहते हैं कि चेतनभाव से भगवान को पहचानो, उदयभाव से नहीं।

उन प्रियमित्र महाराज ने तिरासी लाख पूर्व के दीर्घकाल तक चक्रवर्ती पद पर रहकर प्रजा का पालन किया। पश्चात् एक बार दर्पण में मुख देखते समय कान के पास श्वेत केश देखकर उनका चित्त संसार से विरक्त हुआ।

संसार से विरक्त वे प्रियमित्र चक्रवर्ती बारह वैराग्य-भावनाएँ भाते हुए क्षेमंकर जिनेन्द्र भगवान के समवसरण में पहुँचे। सर्वज्ञता से सुशोभित वीतराग जिनेन्द्र देव के दर्शन से उनका प्रशमभाव दुगुना हो गया। उन्होंने अत्यन्त भक्ति पूर्वक जिनेन्द्र भगवान के श्रीमुख से मोक्षमार्ग का श्रवण किया। सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यग्चारित्र जो कि महा आनन्दमय मोक्ष का कारण है, तद्रूप अपना ही शुद्धस्वभाव परिणमित होता है, वह कहीं बाहर सें नहीं आते और न कहीं उनमें राग है। ऐसे वीतराग रत्नत्रय के आधारभूत शुद्ध आत्मा की अचिन्त्य अपार महिमा भगवान ने बतलायी। उसे सुनकर ज्ञान की अतिशय निर्मलता पूर्वक जिनेन्द्र भगवान के पादमूल में ही जिनदीक्षा लेकर उन्होंने चारित्रदशा के महान रत्नत्रय अंगीकार किये, और चक्रवर्ती की तृणतुल्य अपार विभूति को छोड़ दिया, उन्होंने अधिक लेकर अल्प छोड़ दिया। उसमें क्या आश्चर्य है! मोक्ष के सारभूत निधान लेकर संसार के तुच्छ निधान छोड़ दिये, उन्होंने तो अल्प छोड़कर अधिक ले लिया, तथापि (आश्चर्य है कि) लोग उन्हें महान त्यागी कहते हैं।

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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