भगवान महावीर स्वामी (20)

 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (20)

कनकध्वज राजा और आठवें स्वर्ग में देव

(9वाँ तथा 8वाँ पूर्वभव)

स्वर्ग से च्यवकर वह हरिध्वज (सिंहकेतु) देव, विदेहक्षेत्र में कनकप्रभ राजा का पुत्र हुआ; उसका नाम था कनकध्वज। युवा होने पर पिता ने उसे राज्य सौंपकर दीक्षा ले ली। अपने चरित्रनायक राजा कनकध्वज एक बार सुदर्शन वन में यात्रा करने गए। सुन्दर वृक्षों और फल-फूलों से भरे हुए उद्यान की शोभा निहारते हुए वह आगे बढ़े कि उन्होंने शिला पर छोटे-से किन्तु महान तेजस्वी मुनिराज को ध्यान में बैठे देखा। अहा! कितनी अद्भुत थी उनकी मुद्रा! अंतरंग अतीन्द्रिय शान्ति की दिव्य झलक उनकी मुद्रा पर दृष्टिगोचर होती थी। राग-द्वेष को नष्ट करके वीतरागता द्वारा वे सुशोभित हो रहे थे। क्षमा भाव तो एक क्षण को भी विस्मरण नहीं करते थे। उनके रत्नत्रय के प्रभाव से आस-पास के वृक्ष भी फलाच्छादित एवं पुष्पाच्छादित हो उठे थे। ऐसे मुनिराज को देखकर कनकध्वज ऐसे प्रसन्न हुए जैसे उन्हें किसी अपूर्व निधान की प्राप्ति हुई हो।

अत्यन्त हर्ष से जिनका रोम-रोम उल्लसित हो रहा है - ऐसे राजा ने मुनिराज के चरणों में नमस्कार किया और अति अनुराग सहित उनके समीप बैठ गए। मुनिराज ने शान्त दृष्टि से राजा को देखा और ‘राजन्! धर्मवृद्धि हो!’ ऐसे आशीर्वचनों द्वारा उन पर परम अनुग्रह किया। अहा! धर्मात्मा को देखकर मुनिवर भी प्रसन्न होते हैं। मुनिराज बोले - हे महाभाग! तुम सम्यक्त्वरूपी मुकुट से तो अलंकृत हो, अब उस पर चारित्ररूपी कलगी चढ़ाओ।

मुमुक्षु राजा को स्वयं भी चारित्र की भावना तो थी ही; उसमें मुनिराज की प्रेरणा मिलने से उन्हें अत्यन्त उल्लास हुआ। अति वैराग्यपूर्वक वे हाथ जोड़कर बोले - ‘हे प्रभो! यह जीव संसार में अनन्तबार पंचपरावर्तन कर चुका है, अब उस परावर्तन से बस होओ। श्रुतज्ञान के सारभूत ऐसी चारित्रदशा को मैं आज ही अंगीकार करूँगा।’ 

ऐसा कहकर राजा ने उसी समय चारित्रदशा अंगीकार कर ली; मुनि होकर शुद्धोपयोग द्वारा आत्मा के ध्यान में लगे। ठीक ही है कि महापुरुष अपने हितकार्य को सिद्ध करने में विलम्ब नहीं करते। ‘कनक’ को छोड़कर जिन्होंने ‘सुंदर रत्नत्रय’ ग्रहण किए हैं, ऐसे वे मुनिराज कनकध्वज मुनिसंघ में अति सुशोभित होने लगे; वीतरागभाव द्वारा अनेक परिषह सहने लगे। अन्त में चार आराधना के अखण्ड पालन पूर्वक आयु पूर्ण करके वे आठवें स्वर्ग में गए।

वे धर्मात्मा स्वर्गलोक में भी देवों को आनन्द प्राप्त कराते थे, जिससे ‘देवानन्द’ उनका नाम सार्थक था। चौदह सागरप्रमाण के असंख्य वर्षों तक जिनमार्ग के प्रभाव द्वारा असंख्य देवों को आनन्द देकर वे देवानन्द अपनी आत्म-आराधना को आगे बढ़ाने के लिये पुनः मनुष्य लोक में अवतरित हुए। 

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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