भगवान महावीर स्वामी (24)
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (24)
एक बार बसन्त ऋतु का आगमन होते ही वन-उपवन नवीन कोपलों एवं पुष्पों से खिल उठे; उसी के साथ-साथ जैसे रत्नत्रय-पुष्पों का उद्यान भी मानो खिल गया हो - ऐसे ‘प्रोष्ठिल’ नाम के श्रुतकेवली मुनिराज का श्वेतपुरी के उपवन में आगमन हुआ। अहा, कैसी उनकी अनुपम मुखमुद्रा! मानो वे चेतन्य की शान्ति में निमग्न हों। शशक जैसे प्राणी आश्चर्य से उनकी ओर देख रहे हैं और उनके चरणों में बैठ गये हैं। ज्ञान के गम्भीर समुद्र, उन मुनिराज को देखकर नन्द राजा को अति आनन्द हुआ - अहा! मोक्ष की जीवंत मूर्ति! भक्तिपूर्वक वन्दन करके नन्द राजा ने उन श्रुतकेवली से वीतरागता का उपदेश तथा अपने पूर्वभवों की बात सुनी। सर्वावधिज्ञानी एवं चरमशरीरी ऐसे उन श्रुतकेवली भगवान ने उनकी नरकदशा, वासुदेव पदवी, सिंहपर्याय में सम्यक्त्व प्राप्ति, चक्रवर्ती पद आदि पूर्वभवों का वर्णन करके कहा - हे भव्यात्मा! एक भव के पश्चात तुम भरतक्षेत्र के चौबीसवें तीर्थंकर होकर मोक्षपद प्राप्त करोगे।
यह सब सुनकर नन्द राजा को भी अपने पूर्वभवों का जातिस्मरण हुआ; अपने पूर्वभव उन्होंने चित्रपट की भाँति देखे, तथा भविष्य की सुन्दर कहानी सुनकर उनका चित्त प्रसन्न हो गया। अहा! मुमुक्षु को अपने मोक्ष की बात सुनकर चित्त में जो प्रसन्नता होती है, उसका क्या कहना; हजारों प्रजाजन भी आनन्दविभोर होकर भावी तीर्थंकर की ऐसी महिमा का गान करने लगे एवं उत्सव करने लगे। मानो वर्तमान में ही प्रभु के पंचकल्याणक हो रहे हों।
पश्चात् श्री प्रौष्ठिल प्रभु ने नन्द राजा को मुनिदशा की परममहिमा बताते हुए कहा - अहा! आत्मसाधक वीर मुनिवरों के तपश्चरण रूपी रणसंग्राम में पापकर्मरूपी उद्धत शत्रु भी नहीं टिक पाते; शुद्धोपयोग-धनुर्धर उन सन्त को कोई जीत नहीं सकता, जिन्होंने मोह-लुटेरों को भगा दिया है और पंचपरमेष्ठी जिनके मार्गदर्शक हैं, ऐसे मोक्षपथिक मुनिवर आत्मा की आराधना के अतिरिक्त किसी अन्य कार्य में उलझते नहीं हैं, दीन नहीं होते और न राग-द्वेष करते हैं। अहा, इसे मोक्ष साधक मुनिवरों ने क्या मुक्ति का यहीं नहीं बुला लिया है? चारित्राराधना परमपूज्य है। हे वत्स! उसे तुम अंगीकार करो।
अहा, मानो मुनिराज के मुखचन्द्र से वीतरागी अमृत झरता था। उस का रसास्वादन करते हुए नन्द राजा के नयनों से आनन्द उमड़ने लगा। सम्यक्त्व से अलंकृत उनकी आत्मा वैराग्यभावना द्वारा विशेष सुशोभित हो उठी और तुरन्त ही उन्होंने प्रौष्ठिल आचार्य के निकट जिनदीक्षा अंगीकार कर ली। तुच्छ राजलक्ष्मी को छोड़कर महान रत्नत्रयी को ‘ममत्वरूप से’ धारण किया; बाह्य तथा अन्तर में निश्चयरूप से शोभायमान होने लगे। अहा! वीतरागता द्वारा नग्न जीव जैसा सुशोभित होता है, वैसा क्या रागी वस्त्राभूषण द्वारा शोभता है? नहीं, वीतरागता ही जीव की सच्ची शोभा है। इसीलिए तो मोक्षमार्गी जैन मुनियों को मोहरहित जो नग्नता है, उसे तत्वज्ञानियों ने मंगलरूप कहा है। वही मुनियों का सच्चा स्वरूप है। ऐसे यथार्थ स्वरूप में अपने चरित्रनायक श्री नन्द मुनिराज सुशोभित होने लगे।
वन्दन हो उन नन्द मुनिराज को!
श्री नन्द मुनिराज को विशुद्ध चारित्र के बल से कितनी ही लब्धियों सहित ग्यारह अंग रूप श्रुतज्ञान का विकास हो गया। जिनका चित्त केवलज्ञान में संलग्न है, ऐसे वे महात्मा मात्र स्वानुभूति की ऋद्धि से ही ऐसे तृप्त थे कि अन्य किसी ऋद्धि का उपयोग नहीं करते थे। वाह रे वाह चैतन्यऋद्धि! सचमुच, चैतन्यऋद्धि की तुलना जगत में कौन कर सकता है? अहा! प्रशान्त धर्मात्माओं का चारित्र तो आश्चर्य का स्थान है।
भावी तीर्थंकर ऐसे वे नन्दमुनिराज, एकबार प्रौष्ठिल श्रुतकेवली भगवान की धर्मसभा में बैठे थे; रत्नत्रयवन्त ऐसे वे मुनिराज बारम्बार निर्विकल्प चैतन्यरस का पान करते थे। दूसरे भी अनेक मुनिवर और धर्मात्मा उस धर्मसभा में विराज रहे थे। अहा! वहाँ जैनधर्म का अपार वैभव था। अनेक श्रुतकेवली भगवन्त, आचार्य-उपाध्याय-साधु, श्रुतज्ञान का अपार भण्डार, ऐसी स्वानुभव रसयुक्त जिनवाणी, वह सब जिनवैभव एकसाथ देखकर, अपने चरित्रनायक की परम धर्मभावना, भक्ति एवं वात्सल्य के कोई ऐसे अचिन्त्य परम अद्भुत भाव उल्लसित हुए कि वहाँ श्रुतकेवली के चरणों में बैठे-बैठे ही उन्हें त्रिलोक पूज्यता के हेतु रूप ऐसा तीर्थंकर नामकर्म बंधना प्रारम्भ हो गया। जिनका सम्यक्त्व अष्ट अंगसहित विशुद्ध है - ऐसे उन नन्द मुनिराज को आश्चर्यकारी अद्भुत धर्ममहिमा देखकर सोलह प्रकार की ऐसी मंगलभावनाएँ जागृत हुई कि भव के अन्त की सूचक तथा सर्वज्ञपद की पूर्वभूमि का रूप तीर्थंकर प्रकृति के पिण्डरूप जगत के उत्तम पुद्गल स्वयंमेव परिणमित होने लगे। अहा! सर्वज्ञ के साथ रहना किसे अच्छा नहीं लगेगा?
‘आप सर्वज्ञ होंगे, तब तक हम आपके साथ रहेंगे और ठेठ मोक्षगमन तक आपकी सेवा करेंगे।’ मानो ऐसे भाव से वे शुभपुद्गल प्रभु के आत्मा के साथ एकक्षेत्र में आकर निवास करने लगे। ‘श्रुतकेवली के चरणसान्निध्य में’ वे मुनिराज अत्यन्त विशुद्ध परिणामों से क्षायिकसम्यक्त्व को प्राप्त हुए।
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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