भगवान महावीर स्वामी - (19)
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (19)
सौधर्म स्वर्ग में सिंहकेतु देव (दसवाँ पूर्वभव)
सिंहपर्याय में सम्यक्त्व प्राप्त करके, संल्लेखना सहित समाधि मरण करके सौधर्मस्वर्ग में हरिध्वज देवरूप में अवतरित हुए अपने चरित्रनायक को देखते ही स्वर्ग के देव जयजयकार करने लगे। मंगलवाद्य बजने लगे; देव-देवांगनाओं ने जिनेन्द्र पूजन सहित मंगल उत्सव किया।
अहो! सम्यक्त्व सहित विरक्ति का फल अद्भुत है। उस हरिध्वज अथवा सिंहकेतु देव ने अवधिज्ञान द्वारा जान लिया कि मैं पहले सिंह पर्याय में था और दो मुनिराजों ने प्रतिबोध देकर मुझे धर्म प्राप्त कराया; उन्हीं के प्रताप से मैं यहाँ उत्पन्न हुआ हूँ। मुझ पर उनका महान उपकार है। इस प्रकार मुनिराजों के उपकार का चिन्तन करता हुआ वह देव अत्यन्त भक्ति-पूर्वक मुनिवरों के पास आया और कल्पवृक्ष के अचेतन दिव्यपुष्पों द्वारा उनके चरणों की पूजा करके बोला -
“हे प्रभो! एक मास पूर्व आपने जिस सिंह को प्रतिबोध दिया था, वही मैं हूँ। सम्यग्दर्शन पूर्वक समाधि मरण करके मैं सिंह से सौधर्म स्वर्ग का देव हुआ हूँ और आपके उपकार का स्मरण होने से आपके दर्शन करने आया हूँ। हे प्रभो! आपके प्रसाद से तीनलोक में श्रेष्ठ चूड़ामणि समान सम्यक्त्व प्राप्त करके मैं कृतकृत्य हुआ हूँ। साधुजनों का सत्संग किसे हितकर नहीं होता?”
ऐसा कहकर उसने अत्यन्त भक्ति-पूर्वक मुनिराज के चरणों की रज अपने मुकुट पर चढ़ायी- मानो कोई अमूल्य निधान चढ़ा रहा हो।
एक ओर वह देव पूजा-भक्ति की विधि सहित मुनिवरों की प्रशंसा कर रहा है, उधर मुनियों का लक्ष्य तो अपने चैतन्य की ओर ही स्थिर है। देव क्या कर रहा है, उसका उन्हें लक्ष नहीं है; वे तो निन्दा-प्रशंसा में समताभाव रखकर शुद्धोपयोग द्वारा चैतन्य के ध्यान में लीन होकर क्षपक श्रेणी पर चढ़ रहे हैं। शीघ्रता-पूर्वक एक के बाद एक आठवें, नौवें, दसवें गुणस्थान पर चढ़ते हुए मोहकर्म का नाश कर रहे हैं। अभी वह हरिध्वज देव मुनियों के समक्ष खड़ा-खड़ा उनकी भक्ति कर रहा है कि इतने में मोह का सर्वथा क्षय करके, क्षायिकभाव-पूर्वक उन मुनिवरों ने केवलज्ञान प्रकट किया। अहो, आनन्दमय महान उत्सव हुआ, चारों ओर दिव्यता फैल गई। अपनी उपस्थिति में ही अपने परमगुरुओं को केवलज्ञान होता देखकर ‘हरि’ तो परम आनन्द सहित नाच उठा।
अहो! सर्वज्ञ परमात्मा का साक्षात्कार होने से ‘हरि’ को जो आनन्द हुआ, उसका क्या कहना! अत्यन्त हर्षोल्लास-पूर्वक केवलज्ञान का मंगल-उत्सव तथा उन दोनों केवली भगवन्तों की पूजा एवं दिव्यध्वनि का श्रवण करके वह हरिध्वज देव सौधर्म स्वर्ग चला गया।
जिसके अंतर में सम्यक्त्वरूपी महान सम्पदा विद्यमान है, ऐसे उसी देव का चित्त स्वर्ग की दैवी सम्पदा में भी आकर्षित नहीं होता। बार-बार स्वर्ग से धरती पर आकर सर्वज्ञ परमात्मा की भक्ति एवं बहुमान पूर्वक शुद्धात्मा का श्रवण करके अपनी स्वानुभूति को पुष्ट करता है। इस प्रकार भगवान महावीर के जीव ने अखण्ड आराधना पूर्वक सौधर्म स्वर्ग में असंख्य वर्ष व्यतीत किए।
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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