भगवान महावीर स्वामी (27)

  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (27)
भगवान महावीर : पंचकल्याणक

आज त्रिशलादेवी के हर्षोल्लास का पार नहीं था; और जब राजसभा में सिद्धार्थ महाराजा के श्रीमुख से उन स्वप्नों का महान फल सुना कि चौबीसवें तीर्थंकर का उनके गर्भ में अवतरण हुआ है, तब तो उन्हें किसी अचिन्त्य निधान की प्राप्ति जैसा अपार हर्ष हुआ। सारी नगरी में भी चारों ओर आनन्द छा गया। लोगों के मुख से ‘धन्य है, धन्य है!’ के उद्घोष निकल रहे थे और कह रहे थे कि “अपनी नगरी में हम बाल तीर्थंकर को खेलते-बोलते हुए देखेंगे, हम सब का जीवन धन्य हो!”

इन्द्र-इन्द्राणी ने भी वैशाली आकर माता-पिता का सम्मान किया; दिग्कुमारी देवियाँ त्रिशला माता की सेवा करने लगीं। देव तो ठीक, नरक के जीवों ने भी दो घड़ी साता का वेदन किया; और उससे तीर्थंकर महिमा जानकर गहरे विचार में मग्न होने से अनेक जीव चैतन्यविभूति को लक्षगत करके सम्यग्दर्शन को प्राप्त हुए। धन्य है तीर्थंकर के कल्याणक का प्रभाव और धन्य है उनको देखने वाले!

अहा! माता के उदर में विद्यमान वह जीव, अपर्याप्त दशा में भी मति-श्रुत-अवधि तीन ज्ञान का धारी था, सम्यग्दृष्टि था, आत्मानुभूति के वैभव सहित था, अतीन्द्रिय आनन्द का परिणमन हो रहा था; इसलिए वह आत्मा कल्याणरूप थी। उनकी वह गर्भावस्था भी कल्याणकारी थी। जो उस समय की भी उनकी देहातीत आत्मदशा को जो जान ले, उसका कल्याण होगा; उसे शरीर एवं आत्मा का भेदज्ञान होकर अतिन्द्रिय ज्ञान, सुख होंगे। इसका नाम है ‘गर्भकल्याणक’!

इस प्रकार आत्मा के ज्ञान, सुख, सम्यक्त्वादि भाव देहातीत हैं, इसलिए आत्मा स्वयं ही ज्ञान एवं सुखरूप परिणमन के स्वभाव वाला है - ऐसा विश्वास होता है।

हे भाई! तू इस प्रकार भगवान को पहचान। ऐसा भगवान का जीवन है, इसलिए प्रत्येक प्रसंग में (गर्भ से लेकर मोक्ष तक) भगवान का आत्मा कैसे चैतन्य भावों रूप वर्त रहा है, उसे तू जान! मात्र संयोग या पुण्य का वैभव देखकर नहीं अटक जाना। आत्मिक गुणों द्वारा प्रभु की सच्ची पहिचान करेगा, तो तुझे भी अवश्य सम्यग्दर्शन-ज्ञानादि होंगे और तू भी मोक्ष के मार्ग में आ जाएगा। इसलिए बार-बार कहते हैं कि  

जो जानता जिनराज को चैतन्यमय शुद्धभाव से।

वह जानता निज आत्म को सम्यक्त्व लेता चाव से॥

जिस प्रकार सम्यग्दर्शन होने से पूर्व उसकी तैयारी में भी जीव को कोई नवीन आत्मिक आह्लाद जागृत होता है और नई भनक आती है, उसी प्रकार वैशाली में प्रभुजन्म से पूर्व चारों ओर नूतन आनन्द का वातावरण छा गया था। देवकुमारियाँ त्रिशला माता की सेवा करती हैं, नित्य नवीन आनन्दकारी चर्चा करती हैं। 

एक बार माता को विचार आया कि आज मैं देवियों से प्रश्न पूछ कर उनके तत्त्वज्ञान की परीक्षा करूँ। देवियाँ भी कोई साधारण नहीं थीं, वे जिनभक्त थीं। वे माता की बात सुनकर प्रसन्न हुईं और मानो माता के मुख से फूल झर रहे हों, तदनुसार माता एक के पश्चात् एक प्रश्न पूछने लगीं और देवियाँ भी झट-झट उत्तर देने लगीं। तत्त्वरस से भरपूर उस चर्चा कि आनन्द का रसास्वादन आप भी कीजिए-

सर्व प्रथम माता ने पूछा - जगत में सबसे सुन्दर वस्तु कौन?

देवी ने तुरन्त उत्तर दिया - शुद्धात्मतत्त्व।

माता ने पूछा - आत्मा का लक्षण क्या? 

देवी ने कहा - चैतन्यभाव।

धर्म का चिन्ह क्या? 

शान्तभावरूप ज्ञानचेतना!

उत्तम सदाचार क्या? 

वीतरागभाव।

पापी कौन? 

जो देव-गुरु-धर्म की निन्दा करे वह।

पुण्य-पाप रहित जीव कहाँ जाता है? 

मोक्ष में।

वीर कौन? 

जो वीतरागता रखे, वह वीर है।

जिन कौन? 

जो मोह को जीते वह जिन।

सन्तोषी कौन? 

जो स्व में तृप्त रहे, वह।

विवेकी कौन?

जो जिन आज्ञा का पालन करे, वह।

शूरवीर कौन?

जो शत्रु को भी क्षमा करे, वह। 

मूर्ख कौन?

जो मनुष्य भव पाकर भी आत्महित न करे, वह।

सर्वश्रेष्ठ कौन?

जो सबको जाने, वह सर्वोत्तम।

मुमुक्षु कौन?

जो मोक्ष का ही उद्यम करता हो, वह।

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

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