भगवान महावीर स्वामी (21)

  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (21)

हरिषेण राजा और पश्चात् स्वर्ग में देव

(7वाँ और छठा पूर्वभव)

बंधुओ! आप भगवान महावीर के पूर्वभवों का वर्णन पढ़ रहे हैं। अब उनके मात्र सात ही भव शेष हैं। उनमें से तीन भव तो देव पर्याय के हैं और अन्य चार भव उत्तम रत्नत्रय धर्म की आराधना सहित हैं; जिनमें एक चक्रवर्ती का भव है और एक तीर्थंकर का अवतार है। वीर प्रभु की आत्मा द्वारा की गई उस आराधना को देखकर तुम्हें भी आराधना का उत्साह जागृत होगा और उस आराधना में आत्मा को लगाने से तुम्हें सर्वज्ञ महावीर का साक्षात्कार होगा। सर्वज्ञ महावीर के साक्षात्कार के साथ ही उनकी जैसी अपनी परम-आत्मा की स्वानुभूति रूप साक्षात्कार होने पर, जो अतीन्द्रिय परम आनन्द होता है, उसका क्या कहना! अहो, वह तो मोक्षसुख की झाँकी है और वही मंगल निर्वाण-महोत्सव है।

जो जानता महावीर को, चेतनमयी शुद्धभाव से।

वह जानता निजात्मा को, सम्यक्त्व के आनन्द से॥

अपने चरित्रनायक का परिणमन अब मोक्ष की ओर तीव्रगति से हो रहा है। वे आठवें स्वर्ग से एक समय में असंख्य योजन की गति से मनुष्य लोक में आये और उज्जयिनी नगरी में वज्रधर राजा के पुत्र के रूप में अवतरित हुए; उनका नाम ‘हरिषेण’ था। एक बार जैनाचार्य श्रुतसागरजी महाराज उज्जयिनी नगरी में पधारे; उनका वैराग्यपूर्ण धर्मोपदेश सुनकर महाराजा वज्रधर संसार से विरक्त हुए और हरिषेण कुमार को राज्य सौंपकर उन्होंने जिनदीक्षा ग्रहण की।

हरिषेण कुमार, जो पूर्वजन्म से ही सम्यक् दर्शन लेकर आए थे, उन्होंने श्रावक के बारह व्रत धारण किये। पाप के कारणभूत ऐसे विशाल राज्य में रहने पर भी, वे महात्मा कमलवत् ऐसे अलिप्त थे कि पाप उन्हें स्पर्श तक नहीं करते थे; उनका चित्त सदैव निःस्पृह रहता था। अरे, साधक की ज्ञानचेतना अद्भुत आश्चर्यकारी है! जिस प्रकार विषधर सर्पों के बीच रहकर भी चन्दन अपनी शीतलता को नहीं छोड़ता, अर्थात् विषरूप नहीं होता, उसी प्रकार विष समान विभिन्न रागसंयोगों के बीच रहने पर भी धर्मात्मा की ज्ञानचेतना अपने शान्तस्वभाव को छोड़कर राग-रूप नहीं होती।

राजा हरिषेण एक दिन संसार से विरक्त हुए और जिनदीक्षा लेकर तपोवन में जाकर प्रशान्तरस में निमग्न हो गये। अन्त में समाधिपूर्वक शरीर का त्याग करके महाशुक्र स्वर्ग को अलंकृत किया। वे ‘प्रीतिवर्धन विमान’ में सोलह सागर आयु के धारी देव हुए।

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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