भगवान महावीर स्वामी (30)

  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (30)
जन्मकल्याणक 


तीर्थंकर बनने वाले आत्मसाधक आत्मा की पहचान बाह्य नेत्रों द्वारा नहीं, किन्तु अतीन्द्रिय ज्ञान द्वारा ही होती है। इसलिए जन्मकल्याणक में तुम प्रभु को मात्र इन्द्रियज्ञान द्वारा न देखकर उन्हें अतीन्द्रिय ज्ञान द्वारा पहचानना; उससे प्रभु के कल्याणक के साथ तुम्हारा भी कल्याण होगा, तुम्हें सम्यग्दर्शनादि कल्याणकारी भाव प्राप्त होंगे।

अति शोभायमान शाश्वत मेरुपर्वत जिनप्रभु के जन्माभिषेक से अत्यधिक सुसज्जित हो उठा; अथवा ऐसे कहो कि जिनराज ने आकर मेरु की शोभा का हरण कर लिया; क्योंकि लोग तो मेरु की दिव्य शोभा को देखना छोड़कर प्रभु के मुखारविन्द को निहार रहे थे। प्रभु में लगे हुए उनके चित्त को दूसरा कोई आकर्षित नहीं कर सकता था। मेरु पर ‘स्थापनारूप जिन’ तो सदा-शाश्वत विराजते हैं, तदुपरान्त आज तो ‘द्रव्यजिन’ तथा अंशतः ‘भावजिन’ वहाँ पधारे थे; फिर उसके गौरव की क्या बात?

अहा, वह तो जगत का एक पूजनीय तीर्थ बन गया था। वहाँ ध्यान धरकर अनेक मुनिवर निर्वाण प्राप्त करते हैं, इसलिए वह सिद्धिधाम (निर्वाण तीर्थ) भी है। अहा, तीर्थ स्वरूप आत्मा का जहाँ-जहाँ स्पर्श होता है, वह सब तीर्थ बन जाता है। सम्यग्ज्ञान की यह महत्ता है कि वह द्रव्य-क्षेत्र-काल से ‘भाव मंगल’ को जगाकर उसके साथ आत्मा की सन्धि कर लेता है।

उस जन्माभिषेक के समय सर्वत्र आनन्द छा गया।

“धन्य घड़ी धन्यकाल शुभ देखो, हरि अभिषेक करे प्रभुजी को।”

देवगण भक्ति से नाच उठे और मुनिवर चैत्य की अगाध महिमा का चिन्तन करते-करते ध्यानमग्न हुए। निर्विकल्प जिनभक्ति तथा सविकल्प जिनभक्ति - दोनों का वहाँ संगम हुआ। वाह प्रभो! अभी तो आप बालतीर्थंकर हैं, द्रव्यतीर्थंकर हैं, तथापि ऐसी अगाध महिमा! तो जब आप भविष्य में इसी भव में सर्वज्ञ होकर साक्षात तीर्थंकर होंगे और इष्ट-उपदेश द्वारा जगत में रत्नत्रय तीर्थ का प्रवर्तन करते होंगे, उस काल की महिमा का क्या कहना!

घटे ‘द्रव्य-जगदीश’ अवतार ऐसो, 

कहो ‘भाव-जगदीश’ अवतार कैसो?

प्रभो! आपकी महिमा को जो जानेगा वह अवश्य सम्यक्त्व प्राप्त करेगा। हे देव! आपके जन्मोत्सव में कहीं राग का ही उल्लास नहीं था; राग से पार ऐसे वीतराग रस की एकधारा भी वहाँ चल रही थी। जैनदर्शन की इस अद्भुतता को ज्ञानी ही जानते हैं। जब सारी दुनिया जन्मोत्सव के हर्षातिरेक में पागल हो रही थी, तब हमारे प्रिय बालप्रभु तो अपनी ज्ञानचेतना की शान्ति में निमग्न होकर बैठे थे। वाह रे वाह! वीतराग मार्ग में हमारे भगवान तो इसी प्रकार शोभा देते हैं।

पार्श्वनाथ प्रभु के मोक्षगमन पश्चात् 178 वर्ष में महावीर प्रभु का जन्म हुआ। उनके शरीर में 1008 उत्तम लक्षण थे। उनके बाँये पैर में केसरी सिंह (हरि) देखकर हरि ने, हरि का, हरि-लक्षण प्रसिद्ध किया।

(१. हरि = इन्द्र; २. हरि = भगवान; ३. हरि = सिंह)

एकदेव, एक मनुष्य, एक तिर्यंच। उन सिंहलक्षण युक्त प्रभु को ‘वीर’ ऐसे मंगल नाम से सम्बोधित करके इन्द्र ने स्तुति की-

“अरे, अनन्त गुणसम्पन्न भगवान ‘वीर’ ऐसे एक ही शब्द से वाच्य कैसे होंगे?”

हाँ, जैन शासन के अनेकार्थ के बल से वह सम्भव हो सका, क्योंकि एक गुण द्वारा अभेदरूप से अनन्त गुण सम्पन्न ऐसे पूर्ण गुणी को प्रत्यक्ष किया जा सकता है - ऐसा जैन-शासन के अनेकार्थ ज्ञान की विशिष्ट सामर्थ्य है।

मेरु पर जन्माभिषेक के पश्चात् प्रभु की शोभायात्रा लेकर इन्द्र वैशाली-कुण्डपुर लौटे और माता-पिता को उनका पुत्र सौंपते हुए कहा-

हे महाराज! हे माताजी! विलक्षण पुत्र को पाकर आप धन्य हुए हैं, वे मोह को जीतने में ‘वीर’ हैं और धर्मार्थ का उद्योत करने वाले हैं। इस प्रकार स्तुति करके इन्द्र तो माता-पिता का सम्मान कर रहे थे, परन्तु माता त्रिशलादेवी का ध्यान उसमें नहीं था; वे तो बस पुत्र को देखने में तल्लीन थीं। जिस प्रकार स्वानुभूति में प्रथमबार ही चैतन्य का अतिन्द्रिय रूप देखकर मुमुक्षु जीव का चित्त अपूर्व आनन्द के वेदन में लग जाता है, उसी प्रकार पुत्र का अद्भुत रूप देखकर त्रिशला माता का चित्त अपूर्व आनन्द से तृप्त हो गया। इन्द्र-इन्द्राणी ने ताण्डव नृत्य करके अपना हर्षोल्लास व्यक्त किया। इस प्रकार प्रभु के जन्म कल्याणक का भव्य उत्सव करके देवगण अपने स्वर्गलोक में चले गए।

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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