भगवान महावीर स्वामी (51)
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (51)
प्रभु महावीर पधारे कौशाम्बी नगरी में सती चन्दना को बंधनमुक्त करने।पाँच मास और पच्चीस दिन के उपवासी प्रभु महावीर आहार हेतु नगर में पधारे हैं। उनका शरीर दुर्बल नहीं हुआ, उनकी मुद्रा निस्तेज नहीं हुई; अपितु तप के दिव्य तेज से चमक रही हैं; उनके चैतन्य का प्रतपन अनोखा है। ऐसे प्रभु वीर मुनिराज वृषभदत्त सेठ के घर की ओर आ रहे हैं... चन्दना ने दूर से प्रभु को अपने घर की ओर आते देखा तो उसका रोम-रोम प्रदेश-प्रदेश हर्षातिरेक से... भक्ति से तथा आश्चर्य से पुलकित हो उठा... ‘पधारो प्रभु पधारो!’ प्रभु निकट आये और हर्षविभोर चन्दना प्रभु को आहार दान देने के लिये आगे बढ़ी... आश्चर्य! उसकी बेड़ियाँ खुल गईं, सिर भी पूर्ववत सुन्दर केशों से सुसज्जित हो गया-
भा रही थी भावना आहार देने के लिये।
बेड़ियाँ खुल गई उसकी वीर के शुभ दर्श से।
सारा वातावरण एकदम बदल गया। बन्धन मुक्त चन्दना का लक्ष्य तो प्रभु की ओर था। बन्धन था और टूट गया, उसका भी लक्ष्य उसे नहीं है... जिस प्रकार स्वानुभूति के काल में मुमुक्षु साधक को बन्ध-मोक्ष का लक्ष नहीं रहता, तथापि बन्धन टूट जाते हैं; आत्मदर्शन में लीन साधक के मोहबन्धन अचानक ही खुल जाते हैं। उसीप्रकार प्रभुदर्शन में लीन चन्दना की बेड़ी का बन्धन टूट गया... आनन्दपूर्वक वह द्वार पर आयी; प्रभु की परम भक्ति सहित वन्दना करके पड़गाहन किया - अहो प्रभो! पधारो... पधारो... पधारो...!
वीर प्रभु की मधुर दृष्टि चन्दना पर पड़ी... तो वह कृतार्थ हो गई, ‘लोग मुझे नहीं पहचानते, किन्तु मेरे प्रभु महावीर को तो जानते हैं?’ प्रभु के दर्शनों से वह जीवन के सर्व दुःख भूल गई... भक्ति पूर्वक वीर मुनिराज को आहार हेतु आमंत्रित किया... क्षणभर के लिये प्रभु वहाँ ठहरे... और देखा... तो दासी के रूप में तीन दिन की उपवासी राजकुमारी चन्दना आहारदान देने हेतु खड़ी है... दूसरे भी अनेक अभिग्रह पूरे हो गये... और १75 दिन के उपवासी तीर्थंकर मुनिराज ने चन्दना के हाथ से पारणा किया।
ज्यों ही चन्दना ने प्रभु के हाथ में उड़द का प्रथम ग्रास रखा, त्यों ही दाता और पात्र दोनों के दैवी पुण्यप्रभाव से उसका उत्तम क्षीर रूप में परिणमन हो गया।
उत्तम क्षीर से विधि पूर्वक प्रभु का पारणा होने से चारों ओर आनंद मंगल छा गया। देवगण आकाश में जय जयकार करने लगे और रत्नवृष्टि होने लगी। देवदुन्दुभियाँ बज उठीं। समस्त कौशाम्बी नगरी में हर्ष एवं आश्चर्य फैल गया कि अरे! यह किसका उत्सव है?... और जब उन्होंने जाना कि आज वीर मुनिराज का पारणा हो गया है और उसी के हर्षाेपलक्ष्य में देवगण यह महोत्सव कर रहे हैं... तब नगरवासियों के आनंद का पार नहीं रहा।
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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