भगवान महावीर स्वामी (52)

 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (52)

मुनिराज महावीर प्रतिदिन नगरी में पधारते और बिना आहार किये लौट जाते... उन प्रभु ने आज आहार ग्रहण किया....... यह समाचार नगरी में फैलते ही लोग घर से दौड़ते हुए बाहर आने लगे कि चलो! उस भाग्यशाली आत्मा के दर्शन करें और अभिनन्दन दें, जिसके हाथ से यह महान कार्य हुआ है। 

लोगों ने जब देखा कि वृषभदत्त सेठ की एक दासी के हाथ से प्रभु ने आहार लिया है, तब वे आश्चर्यचकित हो गये... अरे! लोगों को क्या खबर थी कि वह दासी नहीं, अपितु प्रभु महावीर की मौसी है... उनकी श्रेष्ठ उपासिका है। प्रभु को पारणा कराके चन्दना धन्य हो गई... आहार ग्रहण करके वे वीर योगीराज तो ऐसे सहजभाव से वन की ओर गमन कर गये, मानो कुछ भी नहीं हुआ हो और वहाँ जाकर आत्मध्यान में लीन हो गये।

जब तक प्रभु जाते हुए दिखाई देते, तब तक चन्दना उन्हें टकटकी बाँधे देखती रही... आकाश में देव और पृथ्वी पर जन-समूह उन्हें धन्यवाद देकर उनकी प्रशंसा कर रहे थे... किंतु चन्दना तो सारे जगत को भूलकर, समस्त परभावों से परे, चैतन्यतत्त्व के निर्विकल्प ध्यान में शांति-पूर्वक बैठी थी... उसकी गंभीरता अद्भुत थी।

इधर वृषभदत्त सेठ के घर में मुनिराज के आहार दान का प्रसंग बनने से आनंद-मंगल छाया हुआ है... उधर सेठ स्वयं तो बेड़ी कटवाने हेतु लोहार को बुलाने गये थे, सो वापस लौट रहे हैं... मार्ग में आनंदमय कोलाहल देखकर लोगों से पूछा - यह क्या हो रहा है? किस बात का है इतना हर्षमय कोलाहल?

तब प्रजाजन कहने लगे -अरे सेठ! आपके तो भाग्य खुल गये! आपके आँगन में तो महावीर मुनिराज का पारणा हुआ है! पाँच मास और पच्चीस दिन के उपवास पश्चात् पारणा कराने का धन्य अवसर आपको प्राप्त हुआ र्है। आपके गृह-आँगन में चन्दना ने भगवान को आहारदान किया है। उसी का यह उत्सव हो रहा है... देव भी आपके आँगन में रत्नवृष्टि एवं जय-जयकार कर रहे हैं।

सेठ तो आश्चर्यचकित होकर घर की ओर दौड़े... हर्षानन्द का स्वयंभूरमण समुद्र उनके हृदय में उछलने लगा... क्या हुआ? कैसे हुआ? चन्दना की बेड़ी किसने काटी? उसने प्रभु को कहाँ से, किस प्रकार पारणा कराया? सेठ के मन में उठने वाले ऐसे अनेक प्रश्न हर्ष के समुद्र में डूब गये.. वे घर पहुँचे तो वहाँ सारा वातावरण ही बदल गया था। कहाँ तो कुछ क्षण पूर्व का अशान्त क्लेशमय वातावरण और कहाँ यह उल्लास-पूर्ण आनन्द! 

चन्दना का अद्भुत रूप पहले से भी अधिक सुन्दर देखकर वे आश्चर्यचकित हो गये और हर्ष में बोल उठे - “वाह बेटी चन्दना! धन्य है तुझे! तूने मेरा घर पावन किया... कौशाम्बी नगरी की शोभा बढ़ा दी... तुझे पाकर मैं धन्य हो गया... तू तो देवी है... अरे रे! हम तुझे नहीं पहचान सके और तुझे अभी तक दासी बनाकर रखा। बेटी! हमारा अपराध क्षमा कर दे। तू दासी नहीं है, तू तो जगत्पूज्या माता है।”

चन्दना बोली - “पिताजी! वह बात भूल जाइये... मुझ पर आपका महान उपकार है... आपने ही मुझे संकट में शरण देकर मेरी रक्षा की है।”

यह आश्चर्यकारी घटना देखकर सुभद्रा सेठानी तो दिग्मूढ़ बन गई... उसके पश्चाताप की सीमा नहीं थी; वह चन्दना के चरणों में गिरकर क्षमायाचना करने लगी - “बेटी! मैं तुझे नहीं पहचान सकी, मुझ पापिनी ने तुम्हें बहुत कष्ट दिये... मुझे क्षमा कर दे बेटी!”

चन्दना ने उसका हाथ पकड़कर कहा - “माता! वह सब भूल जाओ! मेरे ही कर्माेदय से वह सब हुआ; परन्तु प्रभु महावीर के मंगल-पदार्पण से आपका घर पावन हो गया और हम सब धन्य हुए! मानो महावीर का अभिग्रह पूर्ण होने के लिये ही यह सब हुआ है।”

आत्म-मंथन करती चन्दना विचार रही है कि अहा! एक आहारदान की भावना से मेरी बेड़ी के बंधन टूट गये... तो परम चैतन्य की निर्विकल्प भावना से भव के बंधन छूट जाएं, उसमें क्या आश्चर्य! आत्मभावना द्वारा मैं अपने भव-बंधन को भी अल्पकाल में ही अवश्य तोड़ डालूँगी। प्रभु के दर्शन मात्र से मेरे बाह्य बंधन टूट गये तो अंतर में चैतन्य प्रभु के दर्शन से भवबंधन भी टूटने में अब क्या विलम्ब?

(शास्त्रकार प्रमोद से कहते हैं - वाह रे वाह! चन्दना सती! धन्य है तुम्हारा शील! धन्य है तुम्हारा धैर्य और धन्य है तुम्हारी भावना! तुम महान हो। प्रभु महावीर जब सर्वज्ञ होंगे तब उनकी धर्मसभा में जो स्थान 14000 मुनियों के नायक रूप में गणधर ‘गौतमस्वामी’ का होगा, वैसा ही स्थान 36000 आर्यिकाओं के बीच तुम्हारा होगा। तुम्हारे ऐसे उत्तम-उज्ज्वल जीवन को जानकर हृदय में परम हर्ष एवं वात्सल्य उमड़ आता है।)

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

विनम्र निवेदन

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