भगवान महावीर स्वामी (53)

 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (53)

सारी कौशाम्बी नगरी उमड़ पड़ी है, महावीर मुनि को पारणा करानेवाली उन चन्दना देवी के दर्शन करने तथा उन्हें अभिनन्दन देने। अहा! आज तक जिसे हम दासी समझते थे वह तो भगवती देवी निकली! उन्होंने वीर प्रभु को पारणा कराके अपनी कौशाम्बी नगरी का सम्मान बढ़ाया और उसे विश्व प्रसिद्ध कर दिया! अपनी नगरी में वीर प्रभु का आहार नहीं होने का जो कलंक लग रहा था उसे आज चन्दना ने आहारदान देकर मिटा दिया! बहुतों को तो आश्चर्य हो रहा था कि आहारदान और किसी के हाथ से नहीं, एक दासी के हाथ से हुआ!

(अरे नगरजनों! कलंक तो तुम्हारी नगरी में चन्दना जैसी सतियों के दासीरूप में बिकने उसका था... प्रभु महावीर ने उस दासी के ही हाथ से पारणा करके वह कलंक मिटा दिया... दासी प्रथा दूर कर दी... मनुष्य, मनुष्य को बेचे, वह कलंक धो दिया; तथा यह भी प्रचारित किया कि धर्मसाधना में धनवान होने का कोई महत्व नहीं है... सद्गुणों का महत्व है।)

नागरिकों के मन में प्रश्न उठने लगे कि यह चन्दना देवी है कौन? कहाँ की है? दिखने में तो पुण्यात्मा लगती है... इस प्रकार सब उनका परिचय प्राप्त करने को आतुर थे... इतने में राज्य की महारानी मृगावती अपनी नगर में सेठ वृषभदत्त के घर मुनिराज महावीर के पारणे के समाचार सुनकर हर्ष सहित वहाँ आ पहुँचीं... और पूछने लगीं - ‘किसके हाथ से हुआ प्रभु का पारणा?’ ... और जब वे देखती हैं तो एकदम चौंक पड़ती हैं - अरे! यह कौन है?... यह तो मेरी छोटी बहिन है चन्दनबाला! अरे चन्दना... चन्दना... तू यहाँ कैसे?... ऐसा कहकर वे चन्दना से गले लगीं। अद्भुत था वह दृश्य!

दोनों बहिनों का मिलन देखकर तथा चन्दना महारानी मृगावती की छोटी बहिन है - यह जानकर नगरजन तो अचम्भे में पड़ गये और एक-दूसरे की ओर ताकते हुए कहने लगे - अरे! दासी नहीं, यह तो महावीर प्रभु की मौसी हैं। सेठ-सेठानी भी चकित रह गये। वे डर रहे थे कि अरे रे! इन राजकुमारी से हमने दासीपना कराया... उसके लिये न जाने राजमाता हमें क्या दण्ड देंगी... हमारा सर्वस्व छीनकर हमें नगर से बाहर निकाल देंगी।

चन्दना उनके भाव समझ गई और तुरन्त राजमाता के समक्ष सेठ-सेठानी का अपने माता-पिता के रूप में परिचय देते हुए कहा - दीदी! इन्होंने संकट के समय मेरी रक्षा की है, ये मेरे लिए माता-पिता से कम नहीं हैं, मुझ पर इनका महान उपकार है। इन्हीं के प्रताप से मुझे यह अवसर प्राप्त हुआ है।

सेठ-सेठानी चन्दना का विवेक, क्षमा एवं उदारता देखकर गद्गद हो गये और कहने लगे - हे राजमाता! हमारे घर में ऐसा अमूल्य रत्न होने पर भी हम उसे परख नहीं पाये... यह कई बार उत्तम धर्मचर्चा करती थी, परन्तु हमें खबर नहीं होने दी कि ये स्वयं राजपुत्री हैं। धन्य है इनकी गंभीरता! इनके पुण्य प्रताप से तो हमारे आँगन में वीर प्रभु का पदार्पण तथा पारणा हुआ। धन्य हमारे भाग्य! यह सब चन्दना की उत्तम भावना का प्रताप है... बेटी चन्दना! हमें क्षमा करना!

वीर प्रभु को पारणा कराने के पश्चात चन्दना ने भी अपने चार उपवासों के तप का पारण किया... पश्चात् रानी मृगावती ने कहा - बहिन चन्दना! मेरे साथ चलो और राजमहल में आनन्दपूर्वक रहो।

परम वैरागी चन्दना बोली - अरे बहिन! इस संसार में आनन्द कैसा? संसार की असारता देख ली है, अब इस संसार से बस होओ! अब तो मैं वीर प्रभु के मार्ग पर चलूँगी और आर्यिका बनकर उनके संघ में रहूँगी।

‘तेरी भावना उत्तम है, बहिन! किन्तु महावीर प्रभु तो अभी मुनिदशा में विचर रहे हैं, मौन धारण कर रखा है, किसी को दीक्षा भी नहीं देते। जब वे केवलज्ञान प्राप्त करेंगे, तब हम दोनों उनकी धर्मसभा में जाकर आर्यिकाव्रत धारण करके उनके चरणों में रहेंगी। तब तक धैर्य रखकर घर में ही धर्मध्यान करो और हमें सत्संग का लाभ दो। तुम कौशाम्बी में इतने दिन रहीं, इतने संकट सहे... और हमें खबर तक नहीं पड़ी।’

चन्दना ने कहा - दीदी! सब कर्मों की विचित्रता है... और मेरे अकेले के ऊपर संकट ही थोड़े आये हैं?.. देखा न! आज वीरप्रभु के दर्शन तथा आहारदान का महान लाभ प्राप्त हुआ; वह क्या कम भाग्य की बात है? संसार में सर्व जीवों को शुभ और अशुभ, हर्ष और शोक के प्रसंग तो आते ही रहते हैं; किन्तु-

हर्ष-शोक से पार है अपना ज्ञानस्वभाव।

उस स्वभाव को साधकर होना भव से पार।।

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

विनम्र निवेदन

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