भगवान महावीर स्वामी (54)

 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (54)

मृगावती - तुम्हारी बात सत्य है बहिन! एक ओर तुम्हारा दासी जीवन देखकर शोक और दूसरी ओर तुम्हारे ही हाथ से वीर प्रभु का पारणा देखकर हर्ष,- इस प्रकार शोक और हर्ष दोनों एक साथ; इनमें से मैं शोक का वेदन करूँ या हर्ष का? नहीं; हर्ष और शोक दोनों से परे चैतन्यभाव ही आत्मा का सच्चा स्वरूप है और उसी में सच्चा सुख है, - यह बात स्पष्ट समझ में आती है।

पाठक! इस घटना में चन्दना की बेड़ी टूट गई, वह दासत्व से छूट गई; परन्तु वास्तव में अकेली चन्दना ही नहीं, सारे भारतवर्ष से दासत्व के/गुलामी के बन्धन टूट गये... दासत्व प्रथा की जड़ उखड़ गई; नारियों के शील की महान प्रतिष्ठा हुई और भारत की नारियों में अपनी आत्मशक्ति का विश्वास पैदा हुआ। भारत की नारियों ने विश्व में उत्तम स्थान प्राप्त किया। अहा! अपने देश के पास जो श्रेष्ठ, सदाचार एवं अध्यात्म का अमूल्य वैभव है वह क्या दुनिया के किसी और देश के पास है? 

24 तीर्थंकरों तथा समस्त चक्रवर्तियों को जन्म देने वाली इस भारत भूमि का गौरव विश्व में महान है... भारत में जन्म लेनेवाले हम सब गर्वपूर्वक कह सकते हैं कि ‘हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में होते तीर्थंकर हैं। हमारा जन्म तीर्थंकरों के देश में हुआ है... और तीर्थंकर हमारे देश में जन्मे हैं। तीर्थंकरों का और हमारा देश एक ही है।’ धन्य है मेरी प्यारी भारतमाता! मुनिरूप में विचरते तीर्थंकरों के चरणों का साक्षात् स्पर्श करने का महाभाग्य तुझे प्राप्त हुआ है.... वन्दे मातरम्!

राजगृही में चिन्तातुर बहिन चेलना, वैशाली में बहिन प्रियकारिणी त्रिशला तथा चन्दना के पिता जी राजा चेटक और प्रजाजन सब को चन्दना के मिल जाने की खबर सुनकर तथा उनके हाथ से वीर मुनिराज का पारण होने के समाचार जानकर हार्दिक प्रसन्नता हुई।

अब, इधर चन्दना अपनी बहिन के साथ कौशाम्बी के राजमहल में रहती है और वैराग्यपूर्ण जीवन बिताती है। स्वानुभूति में अधिकाधिक परिणाम लगाती है; दिन-रात महावीर के विचारों में तल्लीन रहकर समवसरण के सपने देखती है कि कब वर्द्धमान प्रभु को केवलज्ञान हो और और कब मैं प्रभु के समवसरण में जाकर आर्यिका बनूँ। प्रतिदिन प्रभु को केवलज्ञान होने के समाचार की प्रतीक्षा करती है। वीर प्रभु राजगृही की ओर सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्र के आसपास विचर रहे हैं... वहाँ से जो कोई यात्री आते हैं, तो उन्हें बुलाकर आतुरता से समाचार पूछती है कि तुमने प्रभु को देखा? प्रभु को केवलज्ञान हुआ?... वे इस समय कहाँ विराजते हैं? क्या करते हैं?

एक यात्री ने कहा - बहिन! मैं वीरप्रभु के दर्शन करके आ रहा हूँ। जाम्भिक ग्राम में ऋजुवालिका नदी के तट पर प्रभु ध्यान में लीन खड़े थे... और अब तो केवलज्ञान की तैयारी लगती है; क्योंकि ऐसा लगता था, जैसे प्रभु अति उग्ररूप से ध्यान में एकाग्र हों। किन्तु बहिन! प्रभु को केवलज्ञान होने की बात क्या कहीं छिपी रहेगी?... अरे! केवलज्ञान होते ही तीनों लोक में उसके समाचार फैल जायेंगे और आनन्द का कोलाहल मच जायेगा...आकाश से देवों के समूह धरती पर उतरेंगे... अब तो हम शीघ्र ही वह धन्य अवसर देखेंगे... और तीर्थंकर रूप में प्रभु की दिव्यध्वनि सुनकर धन्य बनेंगे!

प्रिय साधर्मी पाठकों! चलो, चन्दना जिनकी राह देख रही हैं... हम भी उन प्रभु महावीर के दर्शन करने तथा उनके केवलज्ञान का दिव्य-महोत्सव प्रत्यक्ष देखने चलें।

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

विनम्र निवेदन

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