छहढाला(11)
अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृतछहढाला(11)(सुबोध टीका)
अजीव और आस्रव तत्त्व की विपरीत श्रद्धा
तन उपजत अपनी उपज जान, तन नशत आपको नाश मान;
रागादि प्रगट ये दुःख देन, तिनही को सेवत गिनत चैन ।।५।।
अन्वयार्थः- मिथ्यादृष्टि जीव (तन) शरीर के (उपजत ) उत्पन्न होने से (अपनो ) अपनी आत्मा (उत्पन्न) उत्पन्न हुआ (जान) ऐसा मानता है और (तन) शरीर के (नशत) नाश होने से ( आपको ) आत्मा का (नाश) मरण हुआ, ऐसा (मान) मानता है। (रागादि) राग, द्वेष, मोहादि (ये) जो (प्रगट) स्पष्ट रूप से (दुःख देन ) दुःख देने वाले हैं (तिनही को ) उनकी ( सेवत ) सेवा करता हुआ (चैन) सुख ( गिनत) मानता है।
भावार्थः - (१) अजीवत्तत्त्व की भूलः - मिथ्यादृष्टि जीव ऐसा मानता है कि शरीर की उत्पत्ति (संयोग) होने से मैं उत्पन्न हुआ और शरीर का नाश (वियोग) होने से मैं मर जाऊँगा, (आत्मा का मरण मानता है;) धन, शरीरादि जड़ पदार्थों में परिवर्तन होने से अपने में इष्ट-अनिष्ट परिवर्तन मानना, शरीर में क्षुधा-तृषारूप अवस्था होने से मुझे क्षुधा-तृषादि होते हैं; शरीर कटने से मैं कट गया - इत्यादि जो अजीव की अवस्थाएँ हैं, उन्हें अपनी मानता है - यह अजीव त्तत्त्व की भूल है ।
आत्मा अमर है; वह विष, अग्नि, शस्त्र, अस्त्र अथवा अन्य किसी से नहीं मरता और न नवीन उत्पन्न होता है। मरण (वियोग) तो मात्र शरीर का ही होता है।
(२) आस्रवतत्त्व की भूलः - जीव अथवा अजीव कोई भी ‘पर पदार्थ’ आत्मा को किंचित् भी सुख-दुःख, सुधार-बिगाड़, इष्ट-अनिष्ट नहीं कर सकते, तथापि अज्ञानी ऐसा नहीं मानता। पर में कर्तृत्व, ममत्वरूप मिथ्यात्व तथा राग-द्वेषादि शुभाशुभ आस्रवभाव प्रत्यक्ष दुःख देनेवाले हैं, बंध के ही कारण हैं, तथापि अज्ञानी जीव उन्हें सुखकर जानकर सेवन करता है और शुभभाव भी बन्ध का ही ’कारण है- आस्रव है, उसे हितकर मानता है। परद्रव्य जीव को लाभ-हानि नहीं पहुँचा सकते, तथापि उन्हें इष्ट-अनिष्ट मानकर उनमें प्रीति-अप्रीति करता है; मिथ्यात्व, राग-द्वेष का स्वरूप नहीं जानता; पर पदार्थ मुझे सुख-दुःख देते हैं अथवा राग-द्वेष-मोह कराते हैं - ऐसा मानता है, वह आस्रव तत्त्व की भूल है।
बन्ध और संवरतत्त्व की विपरीत श्रद्धा
शुभ-अशुभ बंध के फल मंझार, रति-अरति करै निजपद विसार; आत्महित हेतु विराग ज्ञान, ते लखै आपको कष्टदान ।। ६ ।।
अन्वयार्थ :- मिथ्यादृष्टि जीव (निजपद) आत्मा के स्वरूप को (विसार) भूलकर (बंध के) कर्मबन्ध के (शुभ) अच्छे (फल मंझार) फलों में (रति) प्रेम (करै) करता है, और कर्म-बन्ध के (अशुभ) बुरे फलों से (अरति) द्वेष करता है; तथा जो (विराग) राग-द्वेष का अभाव अर्थात् अपने यथार्थ स्वभाव में स्थिरता रूप सम्यक्चारित्र और (ज्ञान) सम्यग्ज्ञान और सम्यग्दर्शन (आत्महित) आत्मा के हित के (हेतु) कारण हैं, (ते) उन्हें (आपको) आत्मा को (कष्टदान) दुःख देने वाले (लखै) मानता है।
भावार्थ :- (१) बन्धतत्व की भूल:- अघातिकर्म के फलानुसार पदार्थों की संयोग-वियोगरूप अवस्थाएँ होती हैं। मिथ्यादृष्टि जीवउन्हें अनुकूल-प्रतिकूल मानकर उनसे मैं सुखी-दुःखी हूँ, ऐसी कल्पना द्वारा राग-द्वेष, आकुलता करता है । धन, योग्य स्त्री, पुत्रादिक संयोग होने से रति करता है; रोग, निंदा, निर्धनता, पुत्र-वियोगादि होने से अरति करता है; पुण्य-पाप दोनों बन्धनकर्त्ता हैं, किन्तु ऐसा न मानकर पुण्य को हितकारी मानता है; तत्त्वदृष्टि से तो पुण्य-पाप दोनों अहितकर ही हैं; परन्तु अज्ञानी ऐसा निर्धाररूप नहीं मानता - यह बन्धतत्त्व की विपरीत श्रद्धा है ।
(२) संवरतत्त्व की भूलः निश्चयसम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र ही जीव को हितकारी हैं; स्वरूप में स्थिरता द्वारा राग का जितना अभाव है, वह वैराग्य है, और वह सुख के कारणरूप है; तथापि अज्ञानी जीव उसे कष्टदाता मानता है - यह संवरतत्त्व की विपरीत श्रद्धा है।
अनंतदर्शन, अनंतज्ञान, अनंतसुख और अनंतवीर्य ही आत्माका सच्चा स्वरूप है।
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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