छहढाला(9)दूसरी ढाल

 अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत
छहढाला(9)
(सुबोध टीका)
दूसरी ढाल

पद्धरि छन्द १५ मात्रा

संसार (चतुर्गति) में परिभ्रमण का कारण

ऐसे मिथ्या दृग्-ज्ञान चरणवश, भ्रमत भरत दुख जन्म मरण;

तातैं इनको तजिये सुजान, सुन तिन संक्षेप कहूँ बखान ॥१॥

अन्वयार्थ : यह जीव (मिथ्या दृग्-ज्ञान चरणवश) मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र के वश होकर (ऐसे) इस प्रकार (जन्म-मरण) जन्म और मरण के (दुख) दुःखों को (भरत) भोगता हुआ ( चारों गतियों में ) (भ्रमत) भटकता फिरता है। (तातैं) इसलिये (इनको) इन तीनों को (सुजान) भली भाँति जानकर (तजिये) छोड़ देना चाहिये। इसलिये इन तीनों का (संक्षेप) संक्षेप से (कहुँ बखान) वर्णन करता हूँ। उसे (सुन) सुनो। 

भावार्थः--इस चरण से ऐसा समझना चाहिये कि मिथ्या-दर्शन, ज्ञान, चारित्र से ही जीव को दुःख होता है अर्थात् शुभाशुभ रागादि विकार तथा पर के साथ एकत्व की श्रद्धा, ज्ञान और मिथ्या आचरण से ही जीव दुःखी होता है; क्योंकि कोई संयोग सुख-दुःख का कारण नहीं हो सकता--ऐसा जानकर सुखार्थी को इन मिथ्याभावों का त्याग करना चाहिये। इसीलिये मैं यहाँ संक्षेप से उन तीनों का वर्णन करता हूँ।

अगृहीत-मिथ्यादर्शन और जीवतत्त्व का लक्षण

जीवादि प्रयोजनभूत तत्त्व, सरधैँ तिनमांहि विपर्ययत्व;

चेतन को है उपयोग रूप, बिनमूरत चिन्मूरत अनूप ॥ २ ॥

अन्वयार्थः--(जीवादि) जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष (प्रयोजनभूत) प्रयोजनभूत (तत्त्व) तत्त्व हैं, ( तिनमांहि ) उन में ( विपर्ययत्व ) विपरीत ( सरधैँ ) श्रद्धा करना, वह अगृहीत मिथ्यादर्शन है। ( चेतन को ) आत्मा का (रूप) स्वरूप (उपयोग) देखना-जानना अथवा दर्शन-ज्ञान है और वह ( बिनमूरत ) अमूर्तिक ( चिन्मूरत ) चैतन्यमय तथा ( अनूप ) उपमा रहित है ।

भावार्थः यथार्थरूप से शुद्धात्मदृष्टि द्वारा जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष - इन सात तत्त्वों की श्रद्धा करने से सम्यग्दर्शन होता है। इसलिये इन सात तत्त्वों को जानना आवश्यक है। सातों तत्त्वों का विपरीत श्रद्धान करना, उसे अगृहीत मिथ्यादर्शन कहते हैं। जीव ज्ञान-दर्शन उपयोगस्वरूप अर्थात् ज्ञाता-द्रष्टा है। अमूर्तिक, चैतन्यमय तथा उपमा रहित है।

1 - दूसरी ढाल में किस का वर्णन किया गया है? (मिथ्यादर्शनज्ञानचारित्र का)

2- जीव का चारों गतियों में परिभ्रमण करने का मूल कारण क्या है? (मिथ्यादर्शनज्ञानचारित्र)

3- मोक्ष-प्राप्ति के लिए मिथ्यादर्शनज्ञानचारित्र को छोड़ने वाला क्या है? (ज्ञानी)

4-जीवादि तत्त्व कैसे हैं? (प्रयोजनभूत)

5 -जीवादि तत्त्व के विपरीत श्रद्धा करना क्या कहलाता है?(अगृहीत मिथ्यादर्शन)

6- आत्मा के स्वरूप को देखने-जानने वाले को क्या कहते हैं? (ज्ञाता-दृष्टा)

7- आत्मा का स्वरूप कैसा है? (अमूर्तिक, चैतन्यमय, उपमारहित)

8- पाँच अजीव द्रव्यों के नाम बताओ। (पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल)

9 - जीवद्रव्य अजीवद्रव्य से भिन्न कैसे है? (जीवद्रव्य ज्ञान-दर्शन-उपयोगस्वरूप है)

10 - आत्मा के वास्तविक स्वरूप को कौन नहीं जानता? (मिथ्यादृष्टि)

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

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