छहढाला(10)
अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत
छहढाला(10)
(सुबोध टीका)
जीवतत्त्व के विषय में मिथ्यात्व ( विपरीत श्रद्धा )
पुद्गल नभ धर्म अधर्म काल, इनतैं न्यारी है जीव चाल,
ताकों न जान विपरीत मान, करि करै देह में निज पिछान ॥ ३ ॥
अन्वयार्थ : (पुद्गल) पुद्गल (नभ) आकाश (धर्म) धर्म (अधर्म) अधर्म (काल) काल (इनतैं) इन से (जीव चाल) जीव का स्वभाव अथवा परिणाम (न्यारी) भिन्न (है) है; तथापि मिथ्यादृष्टि जीव (ताकों) उस स्वभाव को (न जान) नहीं जानता और (बिपरीत) विपरीत (मान करि) मानकर (देह में) शरीर में ( निज ) आत्मा की (पिछान) पहिचान ( करे ) करता है।
भावार्थः पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल - ये पाँच अजीव द्रव्य हैं। जीव त्रिकाल ज्ञान-स्वरूप तथा पुद्गलादि द्रव्यों से पृथक् है, किन्तु मिथ्यादृष्टि जीव आत्मा के स्वभाव की यथार्थ श्रद्धा न करके अज्ञानवश विपरीत मानकर, शरीर ही मैं हूँ, शरीर के कार्य मैं ही कर सकता हूँ, मैं अपनी इच्छानुसार शरीर की व्यवस्था रख सकता हूँ - ऐसा मानकर शरीर को ही आत्मा मानता है। यह जीवतत्त्व की विपरीत श्रद्धा है।
मिथ्यादृष्टि का शरीर तथा पर वस्तुओं सम्बन्धी विचार
मैं सुखी दुखी मैं रंक राव, मेरे धन गृह गोधन प्रभाव;
मेरे सुत तिय मैं सबल दीन, बेरूप सुभग मूरख प्रवीण ॥ ४ ।।
अन्वयार्थः मिथ्यादृष्टि जीव मिथ्यादर्शन के कारण से मानता है कि (मैं) मैं (सुखी) सुखी (दुखी) दुःखी, (रंक) निर्धन, (राव ) राजा हूँ, (मेरे) मेरे यहाँ ( धन ) रुपया-पैसा आदि (गृह) घर (गोधन) गाय, भैंस आदि का (प्रभाव) बड़प्पन है और (मेरे सुत ) मेरी संतान तथा (तिय) मेरी स्त्री हैं;
( मैं ) मैं ( सबल ) बलवान, ( दीन ) निर्बल, ( बेरूप ) कुरूप, ( सुभग ) सुन्दर, ( मूरख ) मूर्ख और ( प्रवीण ) चतुर हूँ।
भावार्थः जीवतत्त्व की भूल- जीव तो त्रिकाल ज्ञान-स्वरूप है, उसे अज्ञानी जीव नहीं जानता और जो शरीर है, सो मैं ही हूँ, शरीर के कार्य मैं कर सकता हूँ, शरीर स्वस्थ हो तो मुझे लाभ हो, बाह्य अनुकूल संयोगों से मैं सुखी और प्रतिकूल संयोगों से मैं दुःखी, मैं निर्धन, मैं धनवान, मैं बलवान, मैं निर्बल, मैं मनुष्य, मैं कुरूप, मैं सुन्दर - ऐसा मानता है; शरीराश्रित उपदेश तथा उपवासादि क्रियाओं में अपनत्व मानता है - इत्यादि मिथ्या अभिप्राय द्वारा जो अपने परिणाम नहीं हैं, उन्हें आत्मा का परिणाम मानता है, यह जीवतत्त्व की भूल है।
जो शरीरादि पदार्थ दिखाई देते हैं, वे आत्मा से भिन्न हैं; उनके ठीक रहने या बिगड़ने से आत्मा का कुछ भी अच्छा-बुरा नहीं होता; किन्तु मिथ्यादृष्टि जीव इससे विपरीत मानता है।
1 - मिथ्यादृष्टि जीव स्वयं को कैसा मानता है? (सुखी, दुःखी, रंक, राव )
2- मिथ्यादृष्टि जीव धन, गृह, गोधन आदि को क्या मानता है? (अपना प्रभाव)
3- मिथ्यादृष्टि जीव संतान व स्त्री को क्या मानता है? (अपना )
4 - मिथ्यादृष्टि जीव स्वयं को बलवान मानता है या निर्बल? (दोनों)
5- मिथ्यादृष्टि जीव स्वयं को सुन्दर मानता है या कुरूप? (दोनों)
6- मिथ्यादृष्टि जीव स्वयं को मूर्ख मानता है या प्रवीण? (दोनों)
7- मिथ्यादृष्टि जीव अपने शरीर की उत्पत्ति को किसकी उत्पत्ति मानता है? (अपनी आत्मा की उत्पत्ति)
8- मिथ्यादृष्टि जीव अपने शरीर के मरण को किसका मरण मानता है? (अपनी आत्मा का मरण)
9- राग-द्वेष-मोह आदि जीव को क्या देने वाले हैं? (दुःख)
10 - मिथ्यादृष्टि जीव किस के सेवन को सुख मानता है? (राग-द्वेष-मोह आदि के)
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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