छहढाला(5)

  अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत
छहढाला(5)
(सुबोध टीका)

नरकों की भूख, आयु और मनुष्य गति प्राप्ति का वर्णन

तीनलोक को नाज जु खाय, मिटै न भूख कणा न लहाय;

ये दुख बहु सागर लौं सहै, करम जोग तैं नरगति लहैं।। १३।।

अन्वयार्थः  उन नरकों में इतनी भूख लगती है कि (तीन लोक को) तीनलोक का (नाज) अनाज (जु खाय) खा जाए, तथापि (भूख) क्षुधा (न मिटै) शांत न हो, परन्तु खाने के लिए (कणा) एक दाना भी (न लहाए) नहीं मिलता। (ये दुख) ऐसे दुःख ( बहु सागर लौं) अनेक सागरोपम काल तक (सहै) सहन करता है। ( करम जोग तैं ) किसी विशेष शुभ कर्म के योग से ( नरगति ) मनुष्य गति (लहै) प्राप्त करता है।

भावार्थः  उन नरकों में इतनी तीव्र भूख लगती है कि यदि मिल जाए तो तीनों लोकों का अनाज एकसाथ खा जाएं, तब भी क्षुधा शांत न हो, परन्तु वहाँ खाने के लिए एक दाना भी नहीं मिलता। उन नरकों में यह जीव ऐसे अपार दुःख दीर्घ काल तक (कम से कम दस हज़ार वर्ष और अधिक से अधिक तैतीस सागरोपम काल तक) सहन करता है। फिर किसी शुभ कर्म के योग से यह जीव मनुष्य गति प्राप्त करता है।

मनुष्य गति में गर्भनिवास तथा प्रसवकाल के दुःख

जननी उदर वस्यो नव मास, अंग सकुच तैं पायो त्रास,

निकसत जे दुख पाये घोर, तिनको कहत न आवे ओर।।14।।

अन्वयार्थः  मनुष्य गति में  भी  यह जीव (नव मास) नौ महीने तक (जननी) माता के (उदर) पेट में (वस्यो) रहा;  तब वहाँ  ( अंग ) शरीर ( सकुचतैं ) सिकोड़कर रहने से ( त्रास ) दुःख ( पायो ) पाया, और ( निकसत ) निकलते समय ( जे ) जो ( घोर ) भयंकर ( दुख पाये ) दुःख पाये ( तिनको ) उन दुःखों को ( कहत ) कहने का ( ओर ) अन्त ( न आवे ) नहीं आ सकता !

भावार्थः मनुष्यगति में भी यह जीव नौ महीने तक माता के पेट में रहा; वहाँ शरीर को सिकोड़कर रहने से तीव्र वेदना सहन की, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता । कभी-कभी तो माता के पेट से निकलते समय माता का अथवा पुत्र का अथवा दोनों का मरण भी हो जाता है।

मनुष्यगति में बाल, युवा और वृद्धावस्था के दुःख

बालपने में ज्ञान न लह्यो, तरुण समय तरुणी-रत रह्यो;

अर्द्धमृतकसम बूढ़ापनो, कैसे रूप लखै आपनो ॥ १५ ॥

अन्वयार्थः  मनुष्यगति में जीव ( बालपने में ) बचपन में ( ज्ञान ) ज्ञान ( न लह्यो ) प्राप्त नहीं कर सका और ( तरुण समय ) युवावस्था में ( तरुणी-रत ) युवती स्त्री में लीन ( रह्यो ) रहा, और ( बूढापनो ) वृद्धावस्था में ( अर्धमृतक सम ) अधमरा जैसा रहा, ऐसी दशा में ( कैसे ) किस प्रकार जीव ( आपनो ) अपना ( रूप ) स्वरूप ( लखै ) देखे-विचारे ।

भावार्थ - मनुष्यगति में भी यह जीव बाल्यावस्था में विशेष ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाया, यौवनावस्था में ज्ञान तो प्राप्त किया, किन्तु स्त्री के मोह ( विषय-भोग ) में भूला रहा और वृद्धास्था में इन्द्रियों की शक्ति कम हो गई अथवा मरणपर्यन्त का ऐसा कोई रोग आ गया कि जिससे अधमरा जैसा पड़ा रहा। इस प्रकार यह जीव तीनों अवस्थाओं में आत्मस्वरूप का दर्शन ( पहिचान ) न कर सका।

1 - नरक में लगने वाली भूख किससे भी नहीं मिटती? (तीन लोक के अनाज से)

2 - नरक में लगने वाली प्यास किससे भी नहीं बुझती? (समुद्र के पानी से भी)

3 - नरक के दुःख कितने काल तक सहन करने पड़ते हैं? (सागरोपम काल तक)

4 - नरक से मनुष्य लोक में जीव का आगमन कैसे होता है? (शुभकर्म के योग से)

5 - नरक से मनुष्य लोक में जन्म लेने के लिए किस भयंकर दुःख से गुज़रना पड़ता है? (माँ के संकुचित उदर में 9 मास तक रहने का दुःख)

6 - जन्म के समय होने वाला दुःख कैसा होता है? (वर्णन से परे)

7 - मनुष्य गति में जीव बचपन में अपने स्वरूप को क्यों नहीं देख पाता? (अज्ञानतावश)

8 - मनुष्य गति में जीव तरुण अवस्था में अपने स्वरूप को क्यों नहीं देख पाता? (पत्नी के प्यार में लीन)

9 - मनुष्य गति में जीव वृद्ध अवस्था में अपने स्वरूप को क्यों नहीं देख पाता? (अर्धमृतक के समान हो जाने के कारण)

10 - मनुष्य गति में जीव का अपने स्वरूप को नहीं देख पाने का क्या परिणाम होता है? (संसार में पुनः-पुनः जन्म-मरण करना)

 ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

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