छहढाला(6)

 अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत
छहढाला(6)
(सुबोध टीका)

देवगति में भवनत्रिक का दुःख

कभी अकामनिर्जरा करै, भवनत्रिक में सुरतन धरै।

विषय-चाह-दावानल दह्यो, मरत विलाप करत दुख सह्यो ॥ १६ ॥

भावार्थः- इस जीव ने (कभी) कभी ( अकामनिर्जरा ) अकामनिर्जरा ( करै ) की,  तो मरने के पश्चात् ( भवनत्रिक ) भवनवासी, व्यंतर और ज्योतिषी में ( सुरतन ) देवपर्याय ( धरै ) धारण की, परन्तु वहां भी ( विषयचाह ) पाँच इन्द्रियों के विषयों की इच्छा रूपी ( दावानल ) भयंकर अग्नि में ( दह्यो) जलता रहा और ( मरत ) मरते समय ( बिलाप करत ) रो रो कर ( दुख ) दुःख सहन किया।

भावार्थः जब कभी इस जीव ने अकामनिर्जरा की, तब मरकर उस निर्जरा के प्रभाव से ( भवनत्रिक ) भवनवासी, व्यंतर और ज्योतिषी देवों में से किसी एक का शरीर धारण किया। वहाँ भी अन्य देवों का वैभव देखकर पंचेन्द्रियों के विषयों की इच्छारूपी अग्नि में जलता रहा। फिर मंदारमाला को मुरझाते देखकर तथा शरीर और आभूषणों की कान्ति क्षीण होते देखकर ‘अपना मृत्युकाल निकट है’ ऐसा अवधिज्ञान द्वारा जानकर “हाय! अब यह भोग मुझे भोगने को नहीं मिलेंगे।” ऐसे विचार से रो-रो कर अनेक दुःख सहन किये। 

अकामनिर्जरा यह सिद्ध करती है कि कर्म के उदयानुसार ही जीव विकार नहीं करता, अपितु चाहे जैसा कर्मोदय होने पर भी जीव स्वयं सकामनिर्जरा का पुरुषार्थ कर सकता है।

देवगति में वैमानिक देवों का दुःख

जो विमानवासी हू थाय, सम्यग्दर्शन बिन दुख पाय,

तहँतें चय थावर तन धरै, यों परिवर्तन पूरे करै ॥ १७ ॥ 

अन्वयार्थः ( जो ) यदि ( विमानवासी ) वैमानिक देव ( हू ) भी ( थाय ) हुआ,  तो वहाँ ( सम्यग्दर्शन ) सम्यग्दर्शन ( बिन ) बिना ( दुख ) दुःख ( पाय ) प्राप्त किया और ( तहँतें ) वहाँ से ( चय ) मरकर ( थावर तन ) स्थावर जीव का शरीर ( धरै ) धारण करता है; ( यों ) इस प्रकार यह जीव ( परिवर्तन ) पाँच परावर्तन ( पूरे करै ) पूर्ण करता रहता है।

भावार्थः यह जीव वैमानिक देवों में भी उत्पन्न हुआ किन्तु वहाँ इसने सम्यग्दर्शन के बिना दुःख उठाये और वहाँ से भी मरकर पृथ्वीकायिक आदि स्थावरों के शरीर धारण किये; अर्थात् पुनः तिर्यंचगति में जा गिरा। इस प्रकार यह जीव अनादिकाल से संसार में भटक रहा है और पाँच परावर्तन कर रहा है। 

सार

संसार की कोई भी गति सुखदायक नहीं है । निश्चय-सम्यग्दर्शन से ही पंच परावर्तनरूप संसार परित होता है । अन्य किसी कारण से - दया, दानादि के शुभराग से संसार नहीं टूटता। संयोग सुख-दुःख का कारण नहीं है, किन्तु मिथ्यात्व ( पर के साथ एकत्वबुद्धि - कर्ताबुद्धि, शुभराग से धर्म होता है, शुभराग हितकर है, ऐसी मान्यता) ही दुःख का कारण है। सम्यग्दर्शन सुख का कारण है ।

1 - मनुष्य गति में जीव अकाम निर्जरा करके कौन-सी पर्याय में उत्पन्न होता है। (भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिष आदि देवों की)

2 - देव पर्याय में जीव कैसे दुःख पाता है? (पाँच इन्द्रियों के विषयों की चाह की भयंकर अग्नि में जलता हुआ)

3 - देवगति में आयु पूर्ण होने की सूचना कैसे मिलती है? (मन्दार माला के मुरझाने से)

4 - देवगति में आयु पूर्ण होने की सूचना कब मिलती है? (आयु पूर्ण होने से 6 मास पहिले)

5 - देवगति में आयु पूर्ण होने की सूचना किस ज्ञान से मिलती है? (अवधिज्ञान से)

6 - देवगति में आयु पूर्ण होने पर दुःख क्यों होता है। (भोगों का वियोग होने से)

7 - वैमानिक देवगति में भी दुःख क्यों मिलता है? (सम्यग्दर्शन के अभाव से)

8 - मिथ्यादृष्टि देवगति से पुनः कहाँ जन्म लेता है? (स्थावर योनि में)

9 - जीव अनादिकाल से संसार में क्या करता हुआ भटक रहा है? (पँच परावर्तन करता हुआ)

10- पहली ढाल में किन दुःखों का वर्णन किया गया है? (संसार-परिभ्रमण के दुःखों का) 

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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