छहढाला(34) चौथी ढाल

अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत

छहढाला(34)

चौथी ढाल

सम्यग्ज्ञान का लक्षण और उसका समय

सम्यक् श्रद्धा धारि पुनि, सवहु सम्यग्ज्ञान,

स्व-पर अर्थ बहु धर्मजुत, जो प्रगटावन भान ॥ १ ॥

अन्वयार्थः--(सम्यक् श्रद्धा) सम्यग्दर्शन (धारि) धारण करके (पुनि) फिर (सम्यग्ज्ञान) सम्यग्ज्ञान का (सेवहु) सेवन करो; जो सम्यग्ज्ञान ( बहु धर्मजुत ) अनेक धर्मात्मक (स्व-पर अर्थ) अपना और दूसरे पदार्थों का (प्रगटावन) ज्ञान कराने में (भान) सूर्य समान है।

भावार्थः-सम्यग्दर्शन सहित सम्यग्ज्ञान को दृढ़ करना चाहिये। जिस प्रकार सूर्य समस्त पदार्थों को तथा स्वयं अपने को यथावत् दर्शाता है, उसी प्रकार जो अनेक धर्मयुक्त स्वयं अपने को (आत्माको) तथा पर-पदार्थों को ज्यों का त्यों बतलाता है, उसे सम्यग्ज्ञान कहते हैं।

सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानमें अन्तर

(रोला छन्द)

सम्यक् साथै ज्ञान होय, पै भिन्न अराधी, लक्षण श्रद्धा जान, दुहूँमें भेद अबाधौ । सम्यक् कारण जान, ज्ञान कारज है सोई; युगपतू होते हू, प्रकाश दीपकर्तै होई ।। २ ।।

अन्वयार्थ : --- (सम्यक् साथै) सम्यग्दर्शनके साथ (ज्ञान) सम्यग्ज्ञान (होय) होता है ( पै ) तथापि [ उन दोनोंको ] ( भिन्न ) भिन्न (अराधौ) समझना चाहिये; क्योंकि ( लक्षण ) उन दोनोंके लक्षण [ क्रमशः ] (श्रद्धा) श्रद्धा करना और ( जान ) जानना है तथा (सम्यक्) सम्यग्दर्शन ( कारण ) कारण है और (ज्ञान) सम्यग्ज्ञान ( कारज ) कार्य है । (सोई) यह भी (दुहूँ में) दोनोंमें (भेद) अन्तर (अबाधौ) निर्बाध है। [ जिस प्रकार ] (युगपतू) एकसाथ (होते हू) होने पर भी (प्रकाश) उजाला (दीपकर्नै) दीपककी ज्योतिसे (होई) होता है उसीप्रकार।

भावार्थः — सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान यद्यपि एकसाथ प्रकट होते हैं तथापि वे दोनों भिन्न-भिन्न गुणोंकी पर्यायें हैं । सम्यग्दर्शनश्रद्धागुणकी शुद्ध पर्याय है और सम्यग्ज्ञान ज्ञानगुणकी शुद्ध पर्याय है। पुनश्च, सम्यग्दर्शनका लक्षण विपरीत अभिप्रायरहित तत्त्वार्थश्रद्धा है और सम्यग्ज्ञानका लक्षण संशय * आदि दोष रहित स्व-परका यथार्थ- तया निर्णय है—इस प्रकार दोनोंके लक्षण भिन्न-भिन्न हैं।

तथा सम्यग्दर्शन निमित्तकारण है और सम्यग्ज्ञान नैमित्तिक कार्य है—इस प्रकार उन दोनोंमें कारण-कार्यभावसे भी अन्तर है।

प्रश्न:—ज्ञान-श्रद्धान तो युगपत् (एकसाथ ) होते हैं, तो उनमें कारण-कार्यपना क्यों कहते हो ?

उत्तरः— “वह हो तो वह होता है ”—इस अपेक्षासे कारण- कार्यपना कहा है। जिसप्रकार दीपक और प्रकाश दोनों युगपत् होते हैं तथापि दीपक हो तो प्रकाश होता है इसलिये दीपक कारण है और प्रकाश कार्य है। उसीप्रकार ज्ञान-श्रद्धान भी हैं।

(मोक्षमार्गप्रकाशक (देहली) पृष्ठ १२६)

जब तक सम्यग्दर्शन नहीं होता तब तकका ज्ञान सम्यग्ज्ञान नहीं कहलाता ।– ऐसा होनेसे सम्यग्दर्शन वह सम्यग्ज्ञान का कारण है।

1- सम्यग्ज्ञान का क्या अर्थ है? (सम्यक् रूप से जानना)

2 - सम्यग्दर्शन किस के समान बताया गया है? (सूर्य के समान) 

3 - सम्यग्दर्शन किस को प्रकाशित करता है? (स्व-पर को)

4 - सम्यग्दर्शन का क्या अर्थ है? ( सम्यक् श्रद्धा करना)

5 - सम्यग्ज्ञान का क्या अर्थ है? ( सम्यक् जानना)

6 - सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान कैसे प्रकट होते हैं? (युगपत्)

7 - सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान युगपत कैसे प्रकट होते हैं?  (जैसे दीपक और दीपक का प्रकाश)

 8- दीपक किसका प्रतीक है? (श्रद्धान का)

9 - दीपक का प्रकाश किसका प्रतीक है? (ज्ञान का)

10- सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान में कैसा सम्बन्ध है? (निमित्त और नैमित्तिक)

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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