चौथी ढाल - 37

 

अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत

चौथी ढाल (37 )

सम्यग्ज्ञान की महिमा और कारण

धन समाज गज बाज, राज तो काज न आवै;
ज्ञान आपको रूप भये, फिर अचल रहावै।
तास ज्ञानको कारन, स्व-पर विवेक बखानौ;
कोटि उपाय बनाय भव्य, ताको उर आनौ ॥ ७ ॥
अन्वयार्थः-
(धन) पैसा, (समाज) परिवार, (गज) हाथी, (बाज) घोड़ा, (राज) राज्य (तो) तो (काज) अपने काम में (न आवै) नहीं आते; किन्तु (ज्ञान) सम्यग्ज्ञान (आपको रूप) आत्मा का स्वरूप - जो (भये) प्राप्त होने के (फिर) पश्चात् (अचल) अचल (रहावै) रहता है। (तास) उस (ज्ञानको) सम्यग्ज्ञान का (कारन) कारण (स्व-पर विवेक) आत्मा और पर वस्तुओं का भेदविज्ञान (बखानौँ) कहा है, (इसलिये) (भव्य) हे भव्य जीवों! (कोटि) करोड़ों (उपाय) उपाय (बनाय) करके (ताको) उस भेदविज्ञान को (उर आनौ) हृदय में धारण करो । भावार्थः--धन-सम्पत्ति, परिवार, नौकर-चाकर, हाथी, घोड़ा तथा राज्यादि कोई भी पदार्थ आत्मा को सहायक नहीं होते; किन्तु सम्यग्ज्ञान आत्मा का स्वरूप है; वह एक बार प्राप्त होने के पश्चात् अक्षयहो जाता है - कभी नष्ट नहीं होता, अचल एकरूप रहता है। आत्मा और परवस्तुओं का भेदविज्ञान ही उस सम्यग्ज्ञान का कारण है; इसलिये प्रत्येक आत्मार्थी भव्य जीव को करोड़ों उपाय करके उस भेदविज्ञान के द्वारा सम्यग्दर्शन प्राप्त करना चाहिये।
सम्यग्ज्ञान की महिमा और विषयेच्छा रोकने का उपाय
जे पूरब शिव गये, जाहिं, अरु आगे जैहैं;
सो सब महिमा ज्ञान-तनी, मुनिनाथ कहैं हैं।
विषय-चाह दव-दाह, जगत-जन अरनि दझावैं;
तास उपाय न आन, ज्ञान-घनघान बुझावै ॥८ ॥

अन्वयार्थः (पूरव ) पूर्वकाल में (जे) जो जीव (शिव) मोक्ष में (गये) गये हैं, वर्तमान में (जाहि) जा रहे हैं (अरु) और (आगे) भविष्य में (जैहैं) जायेंगे (सो) वह (सब) सबb(ज्ञान-तनी) सम्यग्ज्ञान की (महिमा) महिमा है - ऐसा (मुनिनाथ) जिनेन्द्रदेव ने कहा है । (विषय-चाह) पाँच इन्द्रियों के विषयों की इच्छा रूपी (दव-दाह) भयंकर दावानल (जगत-जन ) संसारी जीवों रूपी (अरनि) अरण्य- पुराने वन को (दझावै) जला रहा है, (तास) उस की शान्ति का (उपाय) उपाय (आन) दूसरा (न) नहीं है; (मात्र) (ज्ञान-घनघान) ज्ञान रूपी वर्षां का समूह (बुझावै) शान्त करता है। भावार्थः भूत, वर्तमान और भविष्य - तीनों कालों में जो जीव मोक्ष को प्राप्त हुए हैं, होंगे और वर्तमान में विदेह क्षेत्र में हो रहे हैं; वह इस सम्यग्ज्ञान का ही प्रभाव है। ऐसा पूर्वाचार्यों ने कहा है। जिस प्रकार दावानल (वन में लगी हुई अग्नि) वहाँ की समस्त वस्तुओं को भस्म कर देता है, उसी प्रकार पाँच इन्द्रियों सम्बन्धी विषयों की इच्छा संसारी जीवों को जलाती है, दुःख देती है; और जिस प्रकार वर्षां की झड़ी उस दावानल को बुझा देती है उसी प्रकार यह. सम्यग्ज्ञान उन विषयों का शान्त कर देता है, नष्ट कर देता है।

पुण्य-पाप में हर्ष-विषाद का निषेध और तात्पर्य की बात
पुण्य-पाप-फल माहि, हरख बिलखो मत भाईः
यह पुद्गल परजाय. उपज विनिसै फिर थाई ।
लाख बात की बात यही, निश्चय उर लाओ;
तोरी सकल जग दंद-फंद, नित आतम ध्याओ ॥ ९ ॥

अन्वयार्थ :(भाई) हे आत्मार्थी प्राणी! ( पुण्य-फलमांहि) पुण्य के फल में (हरख मत) हर्ष न कर, और (पाप-फलमांहि) पाप के फल में (विलखौ मत) द्वेष न कर, क्योंकि यह पुण्य और पाप (पुद्गल परजाय) पुद्गल की पर्यायें हैं। वे (उपजि) उत्पन्न होकर (विनसै) नष्ट हो जाती हैं और (फिर) पुनः (थाई) उत्पन्न होती हैं। (उर) अपने अन्तर में (निश्चय) निश्चय से, वास्तव में (लाख बातकी बात) लाखों बातों का सार (यही) इसी प्रकार (लाओ) ग्रहण करो कि (सकल) पुण्य--पाप रूप समस्त(जग-दंदफंद) जन्म-मरण के द्वन्द्व (राग-द्वेष) रूप विकारी- मलिन भाव (तोरि) तोड़कर (नित) सदैव (आतम ध्याओ) अपने आत्मा का ध्यान करो। भावार्थः आत्मार्थी जीव का कर्तव्य है कि धन, मकान, दुकान, कीर्ति, निरोगी शरीरादि पुण्य के फल हैं, उनसे अपने को लाभ है तथा उनके वियोग से अपने को हानि है-ऐसा न माने; क्योंकि पर-पदार्थ सदा भिन्न हैं, ज्ञेयमात्र हैं, उनमें किसी को अनुकूल-प्रतिकूल अथवा इष्ट-अनिष्ट मानना, वह मात्र जीवकी भूल है; इसलिये पुण्य- पाप के फल में हर्ष शोक नहीं करना चाहिये। यदि किसी भी परपदार्थ को जीव भला या बुरा माने तो उसके प्रति राग या द्वेष हुए बिना नहीं रहता। जिसने परपदार्थ, परद्रव्य -क्षेत्र-काल-भाव को वास्तव में हितकर तथा अहितकर माना है, उसने अनन्त परपदार्थों को राग-द्वेष करने योग्य माना है और अनन्त पर पदार्थ मुझे सुख-दुःख के कारण हैं, ऐसा भी माना है; इसलिये वह भूल छोड़कर निज ज्ञानानंद स्वरूप का निर्णय करके स्वोन्मुख ज्ञाता रहना ही सुखी होने का उपाय है। पुण्य-पाप का बन्ध - वह पुद्गल की पर्यायें (अवस्थाएँ) हैं, उनके उदय में जो संयोग प्राप्त हों, वे भी क्षणिक संयोगरूप से आते-जाते हैं, जितने काल तक वे निकट रहें, उतने काल भी वे सुख-दुःख देने में समर्थ नहीं हैं। जैन धर्म के समस्त उपदेश का सार यही है कि- शुभाशुभभाव, वह संसार है; इसलिये उसकी रुचि छोड़कर, स्वोन्मुख होकर निश्चयसम्यग्दर्शन-ज्ञानपूर्वक निजआत्मस्वरूप में एकाग्र (लीन) होना ही जीव का कर्त्तव्य है।

1 - मनुष्य के जीवन में क्या धन-सम्पत्ति, हाथी-घोड़े, घर-परिवार के लोग काम में आते हैं? (नहीं) 2 - आत्मा का वास्तविक स्वरूप क्या है? (सम्यक् ज्ञान) 3 -स्व-पर में विवेक के ज्ञान से कौन-सा ज्ञान प्रकट होता है? (सम्यक् ज्ञान) 4 -जो जीव भूत, भविष्य और वर्तमान काल में मोक्ष गए हैं, जाएंगे या जा रहे हैं, वे किस ज्ञान की महिमा से गए हैं, जाएंगे या जा रहे हैं? (सम्यक् ज्ञान की महिमा से) 5 - पाँच इन्द्रियों के विषयों की इच्छा की तुलना किस से की गई है? (दावानल से) 6 - पाँच इन्द्रियों के विषयों की इच्छा की अग्नि किस से शान्त हो सकती है? (सम्यक् ज्ञान के जल से) 7 - पुण्य और पाप किसकी पर्यायें हैं? (पुद्ग्ल की) 8-पुण्य के फल में क्या नहीं करना चाहिए? (हर्ष) 9- पाप के फल में क्या नहीं करना चाहिए? (शोक) 10- पुद्ग्ल की पर्यायें कैसी हैं? (अस्थाई)
11 - संसार से क्या तोड़ने योग्य है? (द्वन्द्व-फंद, राग-द्वेष, मोह-माया)

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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