चौथी ढाल का लक्षण संग्रह

 

चौथी ढाल का लक्षण संग्रह


अणुव्रत:– (१) निश्चयसम्यग्दर्शनसहित चारित्रगुणकी आंशिक शुद्धि होनेसे (अनन्तानुबन्धी तथा अप्रत्याख्यानीय कषायों के अभावपूर्वक) उत्पन्न आत्मा की शुद्धिविशेष को देशचारित्र कहते हैं। श्रावकदशा में पांच पापों का स्थूलरूप–एकदेश त्याग होता है, उसे अणुव्रत कहा जाता है।

अतिचार:– व्रत की अपेक्षा रखने पर भी उसका एकदेश भग्न होना, सो अतिचार है।

अनध्यवसाय:– (मोह)–“कुछ है,” किन्तु क्या है उसके निश्चयसहित ज्ञान को अनध्यवसाय कहते हैं।

अनर्थदंड:– प्रयोजनरहित मन, वचन, काय की ओर की अशुभ प्रवृत्ति।

अनर्थदंडव्रत:– प्रयोजनरहित मन, वचन, काय की ओर की अशुभवृत्ति का त्याग।

अवधिज्ञान:– द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की मर्यादापूर्वक रूपी पदार्थों को स्पष्ट जानने वाला ज्ञान।

उपभोग:– जिसे बारम्बार भोगा जा सके ऐसी वस्तु।

गुण:– द्रव्य के आश्रय से, उसके सम्पूर्ण भाग में तथा उसकी समस्त पर्यायों में सदैव रहे, उसे गुण अथवा शक्ति कहते हैं।

गुणव्रत:– अणुव्रतों को तथा मूलगुणों को पुष्ट करने वाला व्रत।

पर:–आत्मा से (जीव से) भिन्न वस्तुओं को 'पर' कहा जाता है।

परोक्ष:– जिसमें इन्द्रियादि पर वस्तुएँ निमित्तमात्र हैं, ऐसे ज्ञान को परोक्ष ज्ञान कहते हैं।

प्रत्यक्षः-  (१) आत्मा के आश्रय से होने वाला अतीन्द्रिय ज्ञान। 

(२) अक्षप्रतिः- अक्ष = आत्मा अथवा ज्ञान; प्रति = ( अक्ष के ) सन्मुख — निकट। प्रति + अक्ष = आत्मा के सम्बन्ध में हो ऐसा प्रत्यक्ष ज्ञान।

पर्याय:- गुणों के विशेष कार्य को (परिणमन को) पर्याय कहते हैं।

भोगः- वह वस्तु, जिसे एक ही बार भोगा जा सके।

मतिज्ञान:- (१) पराश्रय की बुद्धि छोड़कर दर्शन-उपयोगपूर्वक स्वसन्मुखता से प्रगट होने वाले निज-आत्मा के ज्ञान को मति- ज्ञान कहते हैं। (२) इन्द्रियाँ और मन जिसमें निमित्त मात्र हैं, ऐसे ज्ञान को मतिज्ञान कहते हैं।

महाव्रतः- हिंसादि पाँच पापों का सर्वथा त्याग। निश्चय सम्यग्दर्शन - ज्ञान और वीतरागचारित्र रहित मात्र व्यवहार व्रत के शुभभाव को महाव्रत नहीं कहा है, किन्तु बालव्रत-अज्ञानव्रत कहा है।

मनःपर्ययज्ञान:- द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव की मर्यादा से दूसरे के मन में रहे हुए सरल अथवा गूढ़ रूपी पदार्थों को जानने वाला ज्ञान।

केवलज्ञान:- जो तीनकाल और तीनलोकवर्ती सर्व पदार्थों को (अनन्तधर्मात्मक सर्व द्रव्य-गुण-पर्यायों को) प्रत्येक समय में यथास्थित, परिपूर्णरूप से स्पष्ट और एक साथ जानता है, उसे केवलज्ञान कहते हैं।

विपर्ययः - विपरीत ज्ञान। जैसे कि सीप को चाँदी जानना और चाँदी को सीप जानना। अथवा शुभास्त्रव से वास्तव में आत्महित मानना; देहादि परद्रव्य को स्व-रूप मानना, अपने से भिन्न न मानना ।

व्रत: शुभकार्य करना और अशुभकार्य को छोड़ना, सो व्रत है अथवा हिंसा, असत्य, चोरी, मैथुन और परिग्रह- इन पाँच पापों से भावपूर्वक विरक्त होने को व्रत कहते हैं। (व्रत सम्यग्दर्शन होने के पश्चात् होते हैं और आंशिक वीतरागतारूप निश्चयव्रत सहित व्यवहारव्रत होते हैं।)

शिक्षाव्रत: - मुनिव्रत पालन करने की शिक्षा देने वाला व्रत।

श्रुतज्ञान: — (१) मतिज्ञान से जाने हुए पदार्थों के सम्बन्ध में अन्य पदार्थों को जानने वाले ज्ञान को श्रुतज्ञान कहते हैं। (२) आत्मा की शुद्ध अनुभूतिरूप श्रुतज्ञान को भावश्रुतज्ञान कहते हैं।

संन्यास: — (संलेखना) आत्मा का धर्म समझकर अपनी आत्मा के लिये कषायों को और शरीर को कृश करना (शरीर की ओर से लक्ष छोड़ देना) सो समाधि अथवा संलेखना कहलाती है।

संशय: — विरोध सहित अनेक प्रकारों का अवलम्बन करने वाला ज्ञान; जैसे कि— यह सींप होगी या चांदी? आत्मा अपना ही कार्य कर सकता होगा या पर का भी? देव—गुरु—शास्त्र, जीवादि सात तत्त्व आदि का स्वरूप ऐसा ही होगा?— अथवा जैसा अन्य मत में कहा है वैसा? निमित्त अथवा शुभराग द्वारा आत्मा का हित हो सकता है या नहीं?

  • द्रव्य, गुण, पर्यायों को केवलज्ञानी भगवान जानते हैं, किन्तु उनके अपेक्षित धर्मों को नहीं जान सकते — ऐसा मानना सो असत्य है और वह अनन्त को अथवा मात्र आत्मा को ही जानते हैं किन्तु सर्व को नहीं जानते हैं, ऐसा मानना भी न्याय से विरुद्ध है। (लघु जैन सि. प्रवेशिका प्रश्न ८७, पृष्ठ २६) 

    केवलज्ञानी भगवान क्षायोपशमिक ज्ञान वाले जीवों की भाँति अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणरूप क्रम से नहीं जानते] किन्तु सर्व द्रव्य क्षेत्र काल-भाव को युगपत् (एकसाथ) जानते हैं। इस प्रकार उन्हें सब कुछ प्रत्यक्ष वर्तता है । (प्रवचनसार गाथा २१ की टीका-भावार्थ)। 

  • अति विस्तार से बस होओ, अनिवारित (रोका न जा सके ऐसा- अमर्यादित ) जिसका विस्तार है, ऐसे प्रकाश वाला होने से क्षायिकज्ञान (केवलज्ञान ) अवश्यमेव सर्वदा, सर्वत्र, सर्वथा, सर्व को जानता है।                (प्रवचनसार गाथा ४७ की टीका )

  • टिप्पणी: श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान से सिद्ध होता है कि प्रत्येक द्रव्य में निश्चित और क्रमबद्ध पर्यायें होती हैं, उल्टी-सीधी नहीं होती।

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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