छहढाला(35)

अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत

छहढाला(35)

 सम्यग्ज्ञानके भेद, परोक्ष और देशप्रत्यक्षके लक्षण

तास भेद दो हैं, परोक्ष परतछि तिन मांहीं;

मति श्रुत दोय परोक्ष, अक्ष मनतैं उपजाहीं ।

अवधिज्ञान मनपर्जय दो हैं देश-प्रतच्छा;

द्रव्य क्षेत्र परिमाण लिये जानें जिय स्वच्छा ॥ ३ ॥

अन्वयार्थः  (तास ) उस सम्यग्ज्ञान के (परोक्ष) परोक्ष और (परतछि) प्रत्यक्ष (दो) दो (भेद हैं) भेद हैं; (तिन मांहीं) उनमें (मति श्रुत) मतिज्ञान और श्रुतज्ञान (दोय) यह दोनों (परोक्ष) परोक्षज्ञान हैं। क्योंकि वे (अक्ष मनतैं) इन्द्रियों तथा मन के निमित्त से (उपजाहीं) उत्पन्न होते हैं। (अवधिज्ञान) अवधिज्ञान और (मनपर्जय) मनःपर्ययज्ञान (दो) यह दोनों ज्ञान (देश-प्रतच्छा) देशप्रत्यक्ष (हैं) हैं; क्योंकि उन ज्ञानों से (जिय) जीव (द्रव्य क्षेत्र परिमाण) द्रव्य और क्षेत्र की मर्यादा (लिये) लेकर (स्वच्छा) स्पष्ट (जानै) जानता है।

भावार्थः  इस सम्यग्ज्ञान के दो भेद हैं - (१) प्रत्यक्ष और (२) परोक्ष; उनमें मतिज्ञान और श्रुतज्ञान ’परोक्षज्ञान’ हैं, क्योंकि ये दोनों ज्ञान इन्द्रियों तथा मन के निमित्त से वस्तु को अस्पष्ट जानते हैं। सम्यग्मति-श्रुतज्ञान स्वानुभवकाल में प्रत्यक्ष होते हैं, उनमें इन्द्रिय और मन निमित्त नहीं हैं। अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञान ’देशप्रत्यक्ष’ हैं, क्योंकि जीव इन दो ज्ञानों से रूपीद्रव्य को द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की मर्यादापूर्वक स्पष्ट जानता है ।

’सम्यग्ज्ञान के भेद उपभेद’

 सकल-प्रत्यक्ष ज्ञान का लक्षण और ज्ञान की महिमा

सकल द्रव्यके गुन अनंत, परजाय अनंता;

जानै एकै काल, प्रगट केवलि भगवन्ता ।

ज्ञान समान न आन जगतमें सुखकौ कारन,

इहि परमामृत जन्मजरामृति - रोग - निवारन ॥ ४ ॥

अन्वयार्थः   जिस ज्ञान से (केवलि भगवन्ता) केवल-ज्ञानी भगवान (सकल द्रव्यके) छहों द्रव्यों के (अनन्त) अपरिमित (गुण) गुणों को और (अनन्ता) अनन्त (परजाय) पर्यायों को (एकै काल) एक साथ (प्रगट) स्पष्ट (जानै) जानते हैं, उस ज्ञान को (सकल) सकलप्रत्यक्ष अथवा केवलज्ञान कहते हैं। (जगत में) इस जगत् में (ज्ञान समान) सम्यग्ज्ञान जैसा (आन) दूसरा कोई पदार्थ (सुखको) सुख का (न कारन) कारण नहीं है । (इहि) यह सम्यग्ज्ञान ही (जनमजरामृति-रोग-निवारन) जन्म, जरा (वृद्धावस्था) और मृत्युरूपी रोगों को दूर करने के लिये (परमामृत ) उत्कृष्ट अमृत समान है।

भावार्थः  (१) जो ज्ञान तीन काल और तीन लोकवर्ती सर्व पदार्थों (अनन्तधर्मात्मक सर्व द्रव्य-गुण-पर्यायों को) प्रत्येक समय में यथास्थित, परिपूर्णरूप से स्पष्ट और एकसाथ जानता है, उस ज्ञान को केवलज्ञान कहते हैं। जो सकलप्रत्यक्ष है।

(२) द्रव्य, गुण और पर्यायों को केवली भगवान जानते हैं, किन्तु उनके अपेक्षित धर्मों को नहीं जान सकते ऐसा मानना असत्य है तथा वे अनन्त को अथवा मात्र अपने आत्मा को ही जानते हैं, किन्तु सर्व को नहीं जानते - ऐसा मानना भी न्यायविरुद्ध है। केवली भगवान सर्वज्ञ होने से अनेकान्तस्वरूप प्रत्येक वस्तु को प्रत्यक्ष जानते हैं।

(३) इस संसार में सम्यग्ज्ञान के समान सुखदायक अन्य कोई वस्तु नहीं है। यह सम्यग्ज्ञान ही जन्म, जरा और मृत्युरूपी तीन रोगों का नाश करने के लिये उत्तम अमृत समान है।

१. जो ज्ञान इन्द्रियों तथा मन के निमित्त से वस्तु को अस्पष्ट जानता है, उसे परोक्षज्ञान कहते हैं।

२. जो ज्ञान रूपी वस्तु को द्रव्य-क्षेत्र-काल और भाव की मर्यादापूर्वक स्पष्ट जानता है, उसे देशप्रत्यक्ष कहते हैं।

1 - सम्यग्ज्ञान कितने प्रकार का होता है? (2)

2- सम्यग्ज्ञान के दो प्रकारों के नाम बताओ। (प्रत्यक्ष ज्ञान, परोक्ष ज्ञान )

3 - मति और श्रुत ज्ञान कैसे ज्ञान कहलाते हैं? ( परोक्ष ज्ञान)

4 - मति और श्रुत ज्ञान किसके निमित्त से उत्पन्न होते हैं? (इन्द्रिय व मन से)

5 - अवधिज्ञान और मनःपर्यय ज्ञान कैसे ज्ञान कहलाते हैं? (देश प्रत्यक्ष ज्ञान) 

6- अवधिज्ञान और मनःपर्यय ज्ञान से जीव द्वारा स्पष्ट रूप से क्या जाना जाता है? (द्रव्य और क्षेत्र की मर्यादा)

7- सकल प्रत्यक्ष ज्ञान किसे कहते हैं? (केवलज्ञान को)

8 - केवलज्ञान में क्या जाना जाता है? ( छह द्रव्यों के अनन्त गुणों को और अनन्त पर्यायों को)

9 -सम्यक् ज्ञान किसका कारण है? (सुख का)

10 - केवलज्ञान में छह द्रव्यों के अनन्त गुणों को और अनन्त पर्यायों को कैसे जाना जाता है? (एकसाथ)

11 - सम्यग्ज्ञान जन्म-जरा-मृत्यु के लिए किस के समान है? (अमृत के समान)

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

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