छठवीं ढाल (48)

 

अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत

छहढाला(48)

छठवीं ढाल
(हरिगीत छन्द )

षट्काय जीव न हननतैं, सब विध दरबहिंसा टरी; रागादि भाव निवारतैं, हिंसा न भावित अवतरी। जिनके न लेश मृषा न जल, मृण हू बिना दीयों गहैं; अठदशसहस विध शील घर, चिद्ब्रह्ममें नित रमि रहैं ॥ १ ॥

अन्वयार्थः- (षट्काय जीव) छह काय के जीवों को (न हननतैं) घात न करने के भाव से (सब विध) सर्व प्रकार की (दरवहिंसा) द्रव्यहिंसा (टरी) दूर हो जाती है और (रागादि भाव) राग-द्वेष, काम, क्रोध, मान, माया, लोभ आदि भावों को (निवारतैं) दूर करने से (भावित हिंसा) भावहिंसा भी (न अवतरी) नहीं होती, (जिनके) उन मुनियों को (लेश) किंचित् (मृषा) झूठ (न) नहीं होती, (जल) पानी और (मृण) मिट्टी (हू) भी (बिना दीयों) दिये विना (न गहैं) ग्रहण नहीं करते; तथा (अठदशसहस) अठारह हजार (विध) प्रकार के (शील) शील को-ब्रह्मचर्य को (धर) धारण करके (नित) सदा (चिद्ब्रह्ममें) चैतन्यस्वरूप आत्मा में (रमि रहैं) लीन रहते हैं।

भावार्थः- निश्चय सम्यग्दर्शन ज्ञानपूर्वक स्वरूप में निरन्तर एकाग्रतापूर्वक रमण करना ही मुनिपना है। ऐसी भूमिका में निर्विकल्प ध्यानदशारूप सातवाँ गुणस्थान बारम्बार आता ही है। छठवें गुणस्थान के समय उन्हें पंच महाव्रत, नग्नता, समिति आदि अट्ठाईस मूलगुण के शुद्धभाव होते हैं, किन्तु उसे वे धर्म नहीं मानते; तथा उस काल भी उन्हें तीन कषाय चोकड़ी के अभावरूप शुद्ध परिणति निरन्तर वर्तती ही है।
छह काय (पृथ्वीकाय आदि पाँच स्थावर काय तथा एक त्रस काय) के जीवों का घात करना सो द्रव्यहिंसा है और राग, द्वेष, काम, क्रोध, मान इत्यादि भावों की उत्पत्ति होना सो भावहिंसा है। वीतरागी मुनि (साधु) यह दो प्रकार की हिंसा नहीं करते, इसलिये उनको (१) अहिंसा महाव्रत होता है। स्थूल या सूक्ष्म - ऐसे दोनों प्रकार की झूठ वे नहीं बोलते, इसलिये उनको (२) सत्य महाव्रत होता है। अन्य किसी वस्तु की तो बात ही क्या, किन्तु मिट्टी और पानी भी दिये बिना ग्रहण नहीं करते, इसलिये उनको (३) अचौर्यमहाव्रत होता है। शील के अठारह हजार भेदों का सदा पालन करते हैं और चैतन्यरूप आत्मस्वरूप में लीन रहते हैं, इसलिये उनको (४) ब्रह्मचर्य (आत्म-स्थिरतारूप) महाव्रत होता है।१। यहाँ वाक्य बदलने से महाव्रतोंके लक्षण बनते हैं जैसे कि दोनों प्रकार की हिंसा न करना सो अहिंसा महाव्रत है -इत्यादि। अदत्त वस्तुओं का प्रमाद से ग्रहण करना ही चोरी कहलाती है; इसलिये प्रमाद न होने पर भी मुनिराज नदी तथा झरने आदि का प्रासुक हुआ जल, भस्म (राख) तथा अपने आप गिरे हुए सेमल के फल और तुम्बीफल आदि का ग्रहण कर सकते हैं - ऐसा ‘श्लोकवार्तिकालंकार’ का अभिमत है। (पृ. ४६३)

1 - हिंसा कितने प्रकार की होती है? (2) 2 - दो प्रकार की हिंसा के नाम बताओ। (द्रव्य हिंसा और भाव हिंसा) 3 - षट् काय की हिंसा को क्या कहते हैं? (द्रव्य हिंसा) 4 - राग, द्वेष, काम, क्रोध, मान इत्यादि भावों से होने वाली हिंसा को क्या कहते हैं? (भाव हिंसा)

5 - दोनों प्रकार की हिंसा का त्याग करने से कौन-से महाव्रत का पालन किया जाता है? (अहिंसा महाव्रत का) 6 - असत्य कितने प्रकार का होता है? (2) 7 - दो प्रकार के असत्य के नाम बताओ। (स्थूल और सूक्ष्म) 8 - दोनों प्रकार के असत्य का त्याग करने से कौन-से महाव्रत का पालन किया जाता है? (सत्य महाव्रत का) 9 - जो मिट्टी और पानी भी दिये बिना ग्रहण नहीं करते, वे कौन-से महाव्रत का पालन करते हैं? (अचौर्य महाव्रत का)

10- शील महाव्रत के कितने भेद ह।? (18 हज़ार) 11 - शील के 18 हज़ार भेदों का पालन करने वाले व आत्म-स्वरूप में लीन रहने वाले तपस्वी कौन-से महाव्रत का पालन करते हैं? (ब्रह्मचर्य महाव्रत का)

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।


द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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