छठवीं ढाल (49)

 

अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत

छहढाला(49)


परिग्रह त्याग महाव्रत, ईर्या समितिः और भाषा समिति

अंतर चतुर्दस भेद बाहिर, संग दसधा तैं टलैं; परंमाद तजि चैकर मही लखि, समिति ईर्या तैं चलैं। जग-सुहितकर सब अहितहर, श्रुति सुखद सब संशय हरैं; भ्रमरोग-हर जिनके वचन मुखचन्द्र तैं अमृत झरैं ।।२।।

अन्वयार्थ-- वे वीतरागी दिगम्बर जन मुनि (चतुर्दस भेद) चौदह प्रकार के (अन्तर) अंतरंग तथा (दसधा) दस प्रकार के (बहिर) बहिरंग (संग) परिग्रह से (टलैं) रहित होते हैं। (परमाद) प्रमाद -असावधानी (तजि) छोड़कर (चौकर) चार हाथ (मही) जमीन (लखि) देखकर (ईर्या) ईर्या (समिति तें) समिति से (चलै) चलते हैं, और (जिनके) जिन मुनिराजों के (मुखचन्द्र तैं) मुखरूपी चन्द्र से (जग सुहितकर) जगत का सच्चा हित करनेवला तथा (सब अहितकर) सर्व अहित का नाश करने वाला, (श्रुति सुखद) सुनने में प्रिय लगे ऐसा (सब संशय) समस्त संशयों का (हरैं) नाशक और (भ्रम रोगहर) मिथ्यात्व रूपी रोग को हरने वाला (वचन अमृत) वचनरूपी अमृत (झरैं) झरता है।

भावार्थ--वीतरागी मुनि चौदह प्रकार के अन्तरंग और दस प्रकार के बहिरंग परिग्रहों से रहित होते हैं, इसलिये उनको (५) परिग्रह त्याग महाव्रत होता है। दिन में सावधानीपूर्वक चार हाथ आगे की भूमि देखकर चलने का विकल्प उठे वह (१) ईर्या समिति है, तथा जिस प्रकार चन्द्र से अमृत झरता है उसी प्रकार मुनिके मुखचन्द्रसे जगतका हित करनेवाले, सर्व अहितका नाश करनेवाले, सुननेमें सुखकर, सर्व प्रकार की शंकाओं को दूर करनेवाले और मिथ्यात्व (विपरीतता या सन्देह) रूपी रोग का नाश करने वाले ऐसे अमृत-वचन निकलते हैं । इस प्रकार समितिरुप बोलने का विकल्प मुनि को उठता है वह (२) भाषा समिति है ।

—उपर्युक्त भावार्थ में आये हुए वाक्यों को बदलने से क्रमशः परिग्रह-त्याग-महाव्रत तथा ईर्या समिति और भाषा समिति का लक्षण हो जायेगा ।

प्रश्नः- सच्ची समिति किसे कहते हैं ?

उत्तरः- पर जीवों की रक्षा के हेतु यत्नाचार प्रवृत्ति को अज्ञानी जीव समिति मानते हैं; किन्तु हिंसा के परिणामों से तो पापबन्ध होता है । 

प्रश्नः- यदि रक्षा के परिणामों से संवर कहोगे तो पुण्यबन्ध का कारण क्या सिद्ध होगा ?

उत्तर - मुनि एषणा समिति में दोष को टालते हैं, वहाँ रक्षा का प्रयोजन नहीं है, इसलिये रक्षा के हेतु समिति नहीं है । 

प्रश्नः- तो फिर समिति किस प्रकार होती है ? 

उत्तरः- मुनि को किंचित् राग होने पर गमनादि क्रियाएँ होती हैं, वहाँ उन क्रियाओं में अति आसक्ति के अभाव से प्रमादरुप प्रवृत्ति नहीं होती, तथा दूसरे जीवों को दुःखी करके अपना गमनादि प्रयोजन सिद्ध नहीं करते, इसलिये उनसे स्वयं दया का पालन होता है।-इस प्रकार सच्ची समिति है । ( मोक्षमार्ग—प्रकाशक ( देहली ) पृ० ३३५ ) ।२।

1 - अन्तरंग परिग्रह कितने प्रकार के होते हैं? (14 प्रकार के) 2 - बहिरंग परिग्रह कितने प्रकार के होते हैं? (10 प्रकार के) 3 - क्या वीतरागी मुनि सभी प्रकार के परिग्रह से रहित होते हैं? (हाँ) 4 - परिग्रह से रहित मुनि किस महाव्रत का पालन करने वाले होते हैं? (परिग्रहत्याग महाव्रत) 5 - दिन में सावधानीपूर्वक चार हाथ जमीन देखकर चलने के विकल्प को क्या कहते हैं? (ईर्या समिति) 6 - मुनिराजों के मुखरूपी चन्द्र से निकलने वाले वचनों की तुलना किस से की है? (अमृत से) 7 - मुनिराजों के मुखरूपी चन्द्र से निकलने वाले वचन कैसे होते हैं? (जगत का सच्चा हित करने वाले) 8 - मुनिराजों के मुखरूपी चन्द्र से निकलने वाले वचन कैसे होते हैं? (सुखकर) 9 - मुनिराजों के मुखरूपी चन्द्र से निकलने वाले वचन कैसे होते हैं? (समस्त संशयों के नाशक) 10 - मुनिराज का समिति रूप बोलना किस के अन्तर्गत आता है? (भाषा समिति)

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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