छठवीं ढाल (50)

 

अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत

छहढाला(50)

एषणा, आदान-निक्षेपण और प्रतिष्ठापन समिति छयालीस दोष विना सुकुल, श्रावकतनै घर अशनकोय लैं तप बढ़ावन हेतु, नहिं तन-पोषते तजि रसनको । शुचि ज्ञान संयम उपकरण, लखिकैं गहें लखिकैं धरैंय निर्जन्तु थान विलोकि तन-मल मूत्र श्लेष्म परिहरैं ॥ ३ ॥

अन्वयार्थ - वीतरागी मुनि (सुकुल) उत्तम कुलवाले (श्रावकतनें) श्रावक के घर और (रसनको) छहों रस अथवा एक-दो रसों को (तजि) छोड़कर (तन) शरीर को (नहिं पोषते) पुष्ट न करते हुए - मात्र (तप) तप की (बढ़ावन हेतु) वृद्धि करने के हेतु से आहार के (छयालीस) छियालीस (दोष बिना) दोषों को दूर करके (अशनको) भोजन को (लैं) ग्रहण करते हैं। (शुचि) पवित्रता के (उपकरण) साधन कमण्डलु को, (ज्ञान) ज्ञान के (उपकरण) साधन शास्त्र को, तथा (संयम) संयम के ( उपकरण ) साधन पीछी को (लखिकैं) देखकर (गहैं) ग्रहण करते हैं और (लखिकैं) देखकर (धरैं) रखते हैं और (मूत्र) पेशाब (श्लेष्म) श्लेष्म (तन-मल) शरीर के मैल को (निर्जन्तु) जीवरहित (थान) स्थान (बिलोकि) देखकर (परिहरैं) त्यागते हैं।

भावार्थ - वीतरागी जैन मुनि-साधु उत्तम कुल वाले श्रावक के घर, आहार के छियालीस दोषों को टालकर तथा अमुक रसों का त्याग करके अथवा स्वाद का राग न करके शरीर को पुष्ट करने का अभिप्राय न रखकर, मात्र तप की वृद्धि करने के लिये आहार ग्रहण करते हैं; इसलिये उनको (३) एषणासमिति होती है। पवित्रता के साधन कमण्डलु को, ज्ञान के साधन शास्त्र को और संयम के साधन पीछी को - जीवों की विराधना बचाने के हेतु देखभाल कर रखते हैं तथा उठाते हैं, इसलिए उनको (४) आदान-निक्षेपण समिति होती है। मल-मूत्र-कफ आदि इत्यादिक
मैल को जीवरहित स्थान देखकर त्यागते हैं, इसलिए उनको (५) उत्सर्ग अर्थात प्रतिष्ठापन समिति होती है।।

आहार के दोषों का विशेष वर्णन ‘अनगार धर्मामृत’ तथा ‘मूलाचार’ आदि शास्त्रों में देखें। उन दोषों को टालने के हेतु दिगम्बर साधुओं को कभी महीनों तक भोजन न मिले तथापि मुनि किंचित् खेद नहीं करते; अनासक्त और निर्मोह - इच्छारहित सहज होते हैं। कायर मनुष्यों - अज्ञानियों को ऐसा मुनि व्रत कष्टदायक प्रतीत होता है, ज्ञानी को वह सुखमय लगता है।

1 - वीतरागी मुनि कैसे श्रावक के घर पर आहार लेते हैं? (उत्तम कुल वाले) 2 - वीतरागी मुनि कितने रसों का त्याग करके आहार लेते हैं? (6 रसों या एक-दो रसों का ) 3 - वीतरागी मुनि कितने दोषों को टाल करके आहार लेते हैं? (छियालीस दोषों को टालकर) 4 - वीतरागी मुनि किसको पुष्ट करने का अभिप्राय नहीं रखते? (शरीर को) 5 - वीतरागी मुनि किसकी वृद्धि करने के लिये आहार ग्रहण करते हैं? (तप की वृद्धि) 6 - वीतरागी मुनि जीवों की विराधना बचाने के हेतु देखभाल कर क्या रखते हैं तथा उठाते हैं? (पवित्रता के साधन कमण्डलु को, ज्ञान के साधन शास्त्र को और संयम के साधन पीछी को)

7 - क्षेत्र-शुद्धि का ज्ञान कैसे किया जाता है? (मूत्र, श्लेष्म, शरीर के मैल को व जीवरहित स्थान को देखकर ) 8 - शुद्धि पूर्वक आहार ग्रहण करना कौन-सी समिति है? (एषणा समिति) 9 - कमण्डलु, पीछी आदि का जीवों की रक्षा के लिए प्रयोग करना कौन-सी समिति है? (आदान निक्षेपण समिति) 10 - मल-मूत्र, कफ आदि शरीर के मैल को जीवरहित स्थान पर त्यागना कौन-सी समिति है? (व्युत्सर्ग या प्रतिष्ठापन समिति)

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।


द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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