छठवीं ढाल (51)
अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत
छहढाला(51)
मुनियोंकी तीन गुप्ति और पाँच इन्द्रियों पर विजय
समस्त प्रकार निरोध मन वच काय, आतम ध्यावते;
तिन सुखिर मुद्रा देखि मृगगण उपल खाज खुजावते।
रस रूप गंध तथा फरस अरु शब्द शुभ अशुभावने;
तिनमें न राग विरोध पंचेन्द्रिय-जयन् पद पावने।।४।।
अन्वयार्थ:- वीतरागी मुनि (मन वच काय) मन-वचन-काया का (सम्यक् प्रकार) भलीभाँति-बराबर (निरोध) निरोध करके, जब (आतम) अपने आत्मा का (ध्यावते) ध्यान करते हैं, तब (तिन) उन मुनियों की (सुथिर) सुस्थिर-शांत (मुद्रा) मुद्रा (देखि) देखकर, उन्हें (उपल) पत्थर समझकर (मृगगण) हिरन अथवा चौपाये प्राणियों के समूह (खाज) अपनी खाज-खुजली को (खुजावते) खुजाते हैं। जो (शुभ) प्रिय और (असुहावने)अप्रिय पांच इन्द्रियों सम्बन्धी (रस) पांच रस, (रूप) पांच वर्ण (गंध) दो गंध, (फरस) आठ प्रकार के स्पर्श (अरु) और (शब्द) शब्द - (तिनमें) उन सबमें ( राग-विरोध ) राग या द्वेष (न) मुनि को नहीं होते, इसलिये वे मुनि (पंचेन्द्रिय जयन) पांच इन्द्रियों को जीतने वाला अर्थात् जितेन्द्रिय (पद) पद (पावने) प्राप्त करते हैं ।
भावार्थः— इस गाथा में निश्चय गुप्ति का तथा भावर्लिंगी मुनि के अट्ठाईस मूलगुणों में पांच इन्द्रियों की विजय के स्वरूप का वर्णन करते हैं।
भावर्लिंगी मुनि जब उग्र पुरुषार्थ द्वारा शुद्धोपयोगरूप परिणमित होकर निर्विकल्प रूप में स्वरूप में गुप्त होते हैं—वह निश्चय गुप्ति है । उस समय मन-वचन-काय की क्रिया स्वयं रुक जाती है । उनकी शांत और अचल मुद्रा देखकर, उनके शरीर को पत्थर समझकर मृगों के झुण्ड (पशु ) खाज (खुजली) खुजाते हैं; तथापि वे मुनि अपने ध्यान में निश्चल रहते हैं । उन भावर्लिंगी मुनियों को तीन गुप्तियाँ हैं।
प्रश्नः— गुप्ति किसे कहते हैं ?
उत्तरः— मन-वचन-काय की बाह्य चेष्टा मिटाना चाहे, पाप का चिंतवन न करे, मौन धारण करे, तथा गमनादि न करे, उसे अज्ञानी जीव गुप्ति मानते हैं । उस समय मन में तो भक्ति आदिरूप अनेक प्रकार के शुभरागादि विकल्प उठते हैं; इसलिये प्रवृत्ति में तो गुप्तिपना हो नहीं सकता। (सम्यग्दर्शन-ज्ञान और आत्मा में लीनता द्वारा) वीतरागभाव होने पर जहाँ मन-वचन-काया की चेष्टा न हो वही गुप्ति है। (मोक्षमार्ग-प्रकाशक पृ० २३५) ।
मुनि प्रिय (अनुकूल) पाँच इन्द्रियों के पाँच रस, पाँच रूप, दो गंध, आठ स्पर्श तथा शब्दरूप पाँचों विषयों में राग नहीं करते और अप्रिय (प्रतिकूल) ऊपर कहे हुए पाँच विषयों में द्वेष नहीं करते। —इस प्रकार (५) पाँच इन्द्रियों को जीतने के कारण वे जितेन्द्रिय कहलाते हैं। ४ ।
मुनियों के छह आवश्यक और शेष सात मूलगुण
समता सम्हारें, थुति उचारें, वन्दना जिनदेवको;
नित करें श्रुतरति करें प्रतिक्रम, तजैं तन अहमेवको।
जिनके न न्हौन, न दंतधोवन, लेश अम्बर आवन;
भूमांहि पिछली रयनिमें कछु शयन एकासन करन॥ ५॥
अन्वयार्थ:-- वीतरागी मुनि (नित) सदा (समता) सामायिक (सम्हारें) सम्भालकर करते हैं, (थुति) स्तुति (उचारें) बोलते हैं, (जिनदेवको) जिनेन्द्र भगवान की (वन्दना) वन्दना करते हैं; (श्रुतरति) स्वाध्याय में प्रेम (करें) करते हैं, (प्रतिक्रम) प्रतिक्रमण (करें) करते हैं, (तन) शरीर की (अहमेवको) ममता को (तजैं) छोड़ते हैं। (जिनके) जिन मुनियों को (न्हौन) स्नान और (दंतधोवन) दांतों को स्वच्छ करना (न) नहीं होता, (अंबर आबरन) शरीर ढँकने के लिये वस्त्र (लेश) किंचिद् भी उनके (न) नहीं होता और (पिछली रयनिमें) रात्रि के पिछले भाग में (भूमांहि) धरती पर (एकासन) एक करवट (कछु) कुछ समय तक (शयन) शयन (करन) करते हैं।
भावार्थ:-- वीतरागी मुनि सदा (१) सामायिक, (२) सच्चे देव-गुरु-शास्त्र की स्तुति, (३) जिनेन्द्र भगवान की वन्दना, (४) स्वाध्याय, (५) प्रतिक्रमण, (६) कायोत्सर्ग (शरीरके प्रति ममता का त्याग) करते हैं; इसलिये उनको छह आवश्यक होते हैं; और वे मुनि कभी भी (१) स्नान नहीं करते, (२) दांतों की सफाई नहीं करते, (३) शरीरको ढँकने के लिये थोड़ा-सा भी वस्त्र नहीं रखते, तथा (४) रात्रि के पिछले भाग में एक करवट से भूमि पर कुछ समय शयन करते हैं॥५॥
इस सम्बन्ध में सुकुमाल मुनि का दृष्टान्तः— जब वे ध्यान में लीन थे, उस समय एक सियारिन और उसके दो बच्चे उनका आधा पैर खा गये थे, किन्तु वे अपने ध्यान से किंचित् चलायमान नहीं हुए।
( संयोग से दुःख होता ही नहीं, शरीरादि में ममत्व करे तो उस ममत्वभाव से ही दुःख का अनुभव होता है—ऐसा समझना । )
1 - वीतरागी मुनि किसका भली भांति निरोध करके अपनी आत्मा का ध्यान करते हैं? (मन, वचन, काया का) 2 - मुनिराज की ध्यान में लीन मुद्रा किस प्रकार दिखाई देती है? (पाषाण के समान) 3 - मुनिराज की ध्यान में लीन मुद्रा से कौन अपना शरीर खुजाते हैं? (हिरण आदि पशु) 4 - मुनिराज रस, रूप, गंध, स्पर्श तथा शब्द में क्या नहीं करते? (राग और द्वेष) 5 - पाँच इन्द्रियों को जीतने वाले मुनि क्या कहलाते हैं? (जितेन्द्रिय) 6 - वीतरागी मुनिराज किस प्रकार आत्मा का ध्यान करते हैं?(सामायिक करके) 7 - वीतरागी मुनिराज क्या त्याग कर सामायिक करते हैं? (प्रमाद) 8 - वीतरागी मुनिराज किस प्रकार सामायिक करते हैं? (स्तुति, जिनेन्द्र भगवान की वन्दना, स्वाध्याय, प्रतिक्रमण, शरीर के प्रति ममता का त्याग करके) 9 - वीतरागी मुनिराज किस का आजीवन त्याग करते हैं? (स्नान, दांतों की सफाई, वस्त्र) 10 - वीतरागी मुनिराज रात्रि को शयन कैसे करते हैं? (एक करवट से भूमि पर कुछ समय के लिए)
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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