छठवीं ढाल (52)

 

अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत

छहढाला(52)


मुनियों के शेष गुण तथा राग-द्वेष का अभाव

इक बार दिनमें लें अहार, खड़े अलप निज-पानमें;  

कचलोंच करत न डरत परिपह सौं, लगै निज ध्यानमें। 

अरि मित्र महल मसान कञ्चन, काँच निन्दन थुति करन; 

अर्घावतारन असि-प्रहारनमें सदा समता धरन॥ ६॥

भूशयन , अल्पाहार केश-लुंचन सदा समता अन्वयार्थ -वे वीतराग मुनि ( दिनमें) दिन में, (इकबार ) एक बार (खड़े) खड़े रहकर और (निज-पानमें ) अपने हाथ में रखकर (अल्प) थोड़ा-सा (अहार) आहार (लें) लेते हैं ( कचलौंच ) केशलोंच (करत) करते हैं, (निज ध्यानमें) अपने आत्मा के ध्यान में (लगे) तत्पर होकर (परिषह सौं) बाईस प्रकार के परिषहों से (न डरत) नहीं डरते और (अरि मित्र) शत्रु या मित्र, (महल मसान) महल या श्मशान, (कंचन काँच) सोना या काँच (निन्दन थुति करन) निन्दा या स्तुति करने वाले, (अर्घावतारन) पूजा करने वाले और (असि प्रहारन) तलवार से प्रहार करने वाले - इन सबमें समभाव (राग-द्वेष का अभाव) रखते हैं अर्थात किसी पर राग-द्वेष नहीं करते। प्रश्न - सच्चा परिषह-जय किसे कहते हैं? उत्तर - क्षुधा, तृषा, शीत, उष्ण, डाँस-मच्छर, चर्या, शय्या, वध, रोग, तृण स्पर्श, मल, नग्नता, अरति, स्त्री, निषध, आक्रोश, याचना, सत्कार-पुरस्कार, अलाभ, अदर्शन, प्रज्ञा और अज्ञान - यह बाईस प्रकार के परिषह हैं। भाव-लिंगी मुनि को प्रति समय तीन कषाय का (अनन्तानुबंधी आदि का) अभाव होने से स्वरूप में सावधानी के कारण जितने अंश में राग-द्वेष की उत्पत्ति नहीं होती, उतने अंश में उनका निरंतर परिषह-जय होता है। क्षुधा आदि लगने पर उसके नाश का उपाय न करना उसे (अज्ञानी जीव) परिषह सहन करते हैं। वहाँ उपाय तो नहीं किया, किन्तु अंतरंग में क्षुधा आदि अनिष्ट सामग्री मिलने से दुःखी हुआ तथा रति आदि का कारण मिलने से सुखी हुआ, किन्तु वह तो दुःख-सुखरूप परिणाम हैं और वही आर्त-रौद्रध्यान हैं, ऐसे भावों से संवर किस प्रकार हो सकता है? प्रश्न - तो फिर परिषह-जय किस प्रकार होता है?

उत्तर : —तत्त्वज्ञान के अभ्यास से कोई पदार्थ इष्ट-अनिष्ट भासित न हो; दुःख के कारण मिलने से दुःखी न हो तथा सुख के कारण मिलने से सुखी न हो, किन्तु ज्ञेयरूप से उसका ज्ञाता ही रहे—वही सच्चा परिषहजय है । (मोक्षमार्ग प्रकाशक पृ० ३३६) । ६ ।

1 - वीतरागी मुनि दिन में कितनी बार आहार लेते हैं? (एक बार)

2 - वीतरागी मुनि खड़े-खड़े आहार लेते हैं या बैठ कर? (खड़े-खड़े) 3 - वीतरागी मुनि किस पात्र में आहार लेते हैं? (पाणि-पात्र अर्थात् अपने हाथों में रखकर थोड़ा आहार) 4 - क्या वीतरागी मुनि स्वयं केशलोंच करते हैं? (हाँ) 5 - क्या वीतरागी मुनि के लिए शत्रु-मित्र एक समान होते हैं? (हाँ) 6 - क्या वीतरागी मुनि के लिए महल-श्मशान एक समान होते हैं? (हाँ) 7 - क्या वीतरागी मुनि के लिए स्वर्ण-काँच एक समान होते हैं? (हाँ) 8 - क्या वीतरागी मुनि के लिए निंदा और स्तुति एक समान होते हैं? (हाँ) 9 - क्या वीतरागी मुनि के लिए पूजा-भक्ति करने वाले या तलवार प्रहार करने वाले एक समान होते हैं? (हाँ) 10 - वीतरागी मुनि कितने परिषह सहन करते हैं? (22 -क्षुधा, तृषा, शीत, उष्ण, डाँस-मच्छर, चर्या, शय्या, वध, रोग, तृण स्पर्श, मल, नग्नता, अरति, स्त्री, निषध, आक्रोश, याचना, सत्कार-पुरस्कार, अलाभ, अदर्शन, प्रज्ञा और अज्ञान - यह बाईस प्रकार के परिषह हैं।)

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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