छठवीं ढाल (53)

 

अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत

छहढाला()



मुनियों के तप, धर्म, विहार तथा स्वरूपाचरणचारित्र

तप तपें द्वादश, धरैं वृष दश, रतनत्रय सेवैं सदा; 

मुनि साथमें वा एक विचरैं चहैं नहिं भवसुख कदा । 

यों है सकल संयम चरित, सुनिये स्वरूपाचरन अब; 

जिस होत प्रगटै आपनी निधि, मिटै परकी प्रवृत्ति सब ॥ ७ ॥

अन्वयार्थ:— वे वीतरागी मुनि सदा  ( द्वादश ) बारह प्रकार के ( तप तपें ) तप करते हैं; ( दश ) दस प्रकार के ( वृष ) धर्म को ( धरैं ) धारण करते हैं और ( रतनत्रय ) सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र का ( सदा ) सदा ( सेवैं ) सेवन करते हैं । ( मुनि साथमें ) मुनियों के संघ में ( वा ) अथवा ( एक ) अकेले ( विचरैं ) विचरते हैं और ( कदा ) किसी भी समय ( भवसुख ) सांसारिक सुखों की ( नहिं चहें ) इच्छा नहीं करते । ( यों ) इस प्रकार ( सकल संयम चरित ) सकल संयम चरित्र ( है ) है; ( अब ) अब ( स्वरूपाचरण ) स्वरूपाचरण चरित्र सुनो । ( जिस ) जो स्वरूपाचरण चरित्र  स्वरूप में रमणतारूप चारित्र ( होत ) प्रगट होने से ( आपनी ) अपने आत्मा की ( निधि ) ज्ञानादिक सम्पत्ति ( प्रगटै ) प्रगट होती है, तथा ( परकी ) परवस्तुओं की ओर की ( सब ) सर्व प्रकार की ( प्रवृत्ति ) प्रवृत्ति ( मिटैं ) मिट जाती है ।

भावार्थ:—( १ ) भावलिंगी मुनि का शुद्धात्मस्वरूप में लीन रहकर प्रतपना—प्रतापवन्त वर्तना सो तप है । तथा हठरहित बारह प्रकार के तप के शुभ विकल्प होते हैं, वह व्यवहार तप है । वीतरागभावरूप उत्तमक्षमादि परिणाम सो धर्म है । भावलिंगी मुनि को उपरोक्तानुसार तप और धर्म का आचरण होता है; वे मुनियों के संघ में अथवा अकेले विहार करते हैं; किसी भी समय सांसारिक सुखकी इच्छा नहीं करते ।—इस प्रकार सकलचारित्रका स्वरूप कहा ।

(२) अज्ञानी जीव अनशनादि तप से निर्जरा मानते हैं; किन्तु मात्र बाह्य तप करने से तो निर्जरा होती नहीं है । शुद्धोपयोग निर्जरा का कारण है, इसलिये उपचार से तप को भी निर्जरा का कारण कहा है । यदि बाह्य दुःख सहन करना ही निर्जरा का कारण हो, तब तो पशु आदि भी क्षुधा-तृषा सहन करते हैं ।

प्रश्न:—वे तो पराधीनतापूर्वक सहन करते हैं । जो स्वाधीनरूप से धर्मबुद्धिपूर्वक उपवासादि तप करे उसे तो निर्जरा होती है ना ?

उत्तर:— धर्मबुद्धि से बाह्य उपवासादि करे तो वहाँ उपयोग तो अशुभ, शुभ या शुद्धरूप—जिस प्रकार जीव परिणमे—परिणमित होगा; उपवास के प्रमाण में यदि निर्जरा हो तो निर्जरा का मुख्य कारण उपवासादि सिद्ध हो, किन्तु ऐसा तो हो नहीं सकता, क्योंकि परिणाम दुष्ट होने पर उपवासादि करनेसे भी, निर्जरा कैसे सम्भव हो सकती है ? यहाँ यदि ऐसा कहोगे कि—जैसे अशुभ, शुभ या शुद्धरूप उपयोग परिणमित हो तदनुसार बन्ध-निर्जरा हैं, तो उपवासादि तप निर्जरा का मुख्य कारण कहाँ रहा ?—वहाँ अशुभ और शुभ परिणाम तो बन्ध के कारण सिद्ध हुए तथा शुद्ध परिणाम निर्जरा का कारण सिद्ध हुआ ।

प्रश्न:—यदि ऐसा है तो, अनशनादि को तप की संज्ञा किस प्रकार कही गई ?

उत्तर:—उन्हें बाह्य-तप कहा है; बाह्य का अर्थ यह है कि—बाहर में दूसरों को दिखाई दे कि यह तपस्वी है; किन्तु स्वयं तो जैसे अंतरंग-परिणाम होंगे वैसा ही फल प्राप्त करेगा ।

(३) तथा अन्तरंग तपों में भी प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्त्य, स्वाध्याय, त्याग और ध्यानरूप क्रिया में बाह्य प्रवर्तन है वह तो बाह्य-तप जैसा ही जानना; जैसी बाह्य-क्रिया है उसी प्रकार यह भी बाह्य-क्रिया है; इसलिये प्रायश्चित्त आदि बाह्य-साधन भी अन्तरंग तप नहीं है ।

परन्तु ऐसा बाह्य प्रवर्तन होने पर जो अन्तरंग परिणामों की शुद्धता हो उसका नाम अन्तरंग तप जानना; और वहाँ तो निर्जरा ही है, वहाँ बन्ध नहीं होता; तथा उस शुद्धता का अल्पांश भी रहे तो जितनी शुद्धता हुई उससे तो निर्जरा है, तथा जितना शुभभाव है उससे बन्ध है । इस प्रकार अनशनादि क्रिया को उपचार से तप संज्ञा दी गई है—ऐसा जानना, और इसलिये उसे व्यवहारतप कहा है । व्यवहार और उपचार का एक ही अर्थ है ।

अधिक क्या कहें ? इतना समझ लेना कि—निश्चयधर्म तो वीतरागभाव है तथा अन्य अनेक प्रकार के भेद निमित्त की अपेक्षा से उपचार से कहे हैं; उन्हें व्यवहारमात्र धर्म संज्ञा जानना । इस रहस्य को (अज्ञानी) नहीं जानता, इसलिये उसे निर्जरा का—तप का—भी सच्चा श्रद्धान नहीं है । (मोक्षमार्गप्रकाशक पृष्ठ २३३, टोडरमल स्मारक ग्रन्थमालासे प्रकाशित)

प्रश्न:—क्रोधादि का त्याग और उत्तम क्षमादि धर्म कब होता है ?

उत्तर:—बन्धादि के भय से अथवा स्वर्ग-मोक्ष की इच्छा से (अज्ञानी जीव) क्रोधादिक नहीं करता, किन्तु वहाँ क्रोध-मानादि करने का अभिप्राय तो गया नहीं है । जिस प्रकार कोई राजादि के भय से अथवा बड़प्पन-प्रतिष्ठा के लोभ से परस्त्री सेवन नहीं करता तो उसे त्यागी नहीं कहा जा सकता, उसी प्रकार यह भी क्रोधादि का त्यागी नहीं है । तो फिर किस प्रकार त्यागी होता है ?—कि पदार्थ इष्ट-अनिष्ट भासित होने पर क्रोधादि होते हैं, किन्तु जब तत्त्वज्ञान के अभ्यास से कोई इष्ट-अनिष्ट भासित न हो तब स्वयं क्रोधादि की उत्पत्ति नहीं होती और तभी सच्चे क्षमादि धर्म होते हैं । ( मोक्षमार्ग पृष्ठ २२९ टोडरमल स्मारक ग्रन्थमालासे प्रकाशित )

(४) अब, आठवीं गाथा में स्वरूपाचरणचारित्र का वर्णन करेंगे उसे सुनो—कि जिसके प्रगट होने से आत्मा की अनन्तज्ञान, अनन्तदर्शन, अनन्तसुख और अनन्तवीर्य आदि शक्तियों का पूर्ण विकास होता है और परपदार्थ के ओर की सर्व प्रकार की प्रवृत्ति दूर होती है—वह स्वरूपाचरणचारित्र है । ७ ।

1 - भावलिंगी मुनि कितने प्रकार का तप तपते हैं?  (बारह प्रकार के)

2 - भावलिंगी मुनि कितने प्रकार का धर्म धारण करते हैं? (10 प्रकार  का)

3 - भावलिंगी मुनि कैसे विहार करते हैं? (मुनियों के संघ में अथवा अकेले )

4 - भावलिंगी मुनि कैसे सुख की इच्छा नहीं करते? (सांसारिक सुख की)

5 - अन्तरंग परिणामों की शुद्धता किससे होती है?  (अन्तरंग तप से)

6 - कर्मों की शुद्धोपयोग निर्जरा का कारण क्या है?  (धर्मबुद्धिपूर्वक उपवासादि तप)

7 - क्या क्रोधादि का त्याग भय या स्वर्ग-मोक्ष की इच्छा से किया जाता है? (नहीं)

8 - उत्तम क्षमादि धर्म कब होता है ? (जब तत्त्वज्ञान के अभ्यास से कोई इष्ट-अनिष्ट भासित न हो, तब)

9 - भावलिंगी मुनिराज की आत्मा की निधि कब प्रकट होती है? (स्वरूपाचरण से)

10 - आत्मा की निधि प्रकट होने से कौन-सी प्रवृत्ति मिट जाती है? (पर की)

11 - आत्मा की निधि धन-सम्पत्ति है या ज्ञान की सम्पत्ति? (ज्ञान की सम्पत्ति)

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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