छहढाला(36)
अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत
छहढाला(36)
कोटि जन्म तप तपैं, ज्ञान बिन कर्म झरें जे;
ज्ञानीके छिनमें त्रिगुप्ति तैं सहज टरैं ते।
मुनिव्रत धार अनन्तवार ग्रीवक उपजायो;
पै निज आतमज्ञान बिना, सुख लेश न पायौ ।। ५ ।।
अन्वयार्थः अज्ञानी जीव को (ज्ञान बिना) सम्यग्ज्ञान के बिना (कोटि जन्म) करोड़ों जन्मों तक (तप तपैं) तप करने से (जे कर्म) जितने कर्म (झरें) नाश होते हैं (तै) उतने कर्म(ज्ञानीके) सम्यग्ज्ञानी जीव के (त्रिगुप्ति तें) मन, वचन और काय की प्रवृत्ति को रोकने से निर्विकल्प शुद्ध स्वभाव से (छिनमें) क्षणमात्र में (सहज) सरलता से (टरें) नष्ट हो जाते हैं। यह जीव (मुनिव्रत ) मुनियों के महाव्रतों को (धार) धारण कर के (अनन्तबार) अनन्त बार (ग्रीवक) नवें ग्रैवेयक तक (उपजायो) उत्पन्न हुआ, (पै) परन्तु (निज आतम) अपने आत्मा के (ज्ञान विना) ज्ञान बिना (लेश) किंचितमात्र (सुख) सुख (न पायो) प्राप्त न कर सका।
भावार्थः- मिथ्यादृष्टि जीव आत्मज्ञान (सम्यग्ज्ञान) के लिए करोड़ों जन्मों-भवों तक बालतपरूप उद्यम करके जितने कर्मों का नाश करता है, उतने कर्मों का नाश सम्यग्ज्ञानी जीव-स्वोन्मुख ज्ञातापने के कारण स्वरूपगुप्ति से क्षणमात्र में सहज ही कर डालता है। यह जीव, मुनि के (द्रव्यलिंगी मुनि के) महाव्रतों को धारण करके उनके प्रभाव से नवें ग्रैवेयक तक के विमान में अनन्तबार उत्पन्न हुआ, परन्तु आत्मा के भेदविज्ञान (सम्यग्ज्ञान अथवा स्वानुभव) के बिना जीव को वहाँ भी लेशमात्र सुख प्राप्त नहीं हुआ।
ज्ञान के दोष और मनुष्य पर्याय आदि की दुर्लभता
तातें जिनवर-कथित तत्त्व अभ्यास करीजे;
संशय विभ्रम मोह त्याग, आपो लख लीजे।
यह मानुष पर्याय, सुकुल, सुनिवौ जिनवानी;
इह विध गये न मिलै, सुमणि ज्यों उदधि समानी ॥ ६ ॥
अन्वयार्थ : (तातैं) इसलिये (जिनवर-कथित) जिनेन्द्र भगवान के कहे हुए (तत्त्व) परमार्थ तत्त्व का (अभ्यास) अभ्यास (करीजे) करना चाहिये और (संशय) संशय (विभ्रम) विपर्यय तथा (मोह) अनध्यवसाय/अनिश्चितता को (त्याग) छोड़कर (आपो) अपने आत्मा को (लख लीजे) लक्ष में लेना चाहिये अर्थात् जानना चाहिये। यदि ऐसा नहीं किया तो (यह) यह (मानुष)पर्याय) मनुष्य भव (सुकुल) उत्तम कुल और (जिनवाणी) जिनवाणी का (सुनिवौं) सुनना (इह विध) ऐसा सुयोग (गये) बीत जाने पर, (उदधि) समुद्र में (समानो) समाये हुए (सुमणि ज्यों) सच्चे रत्न की भाँति पुनः (न मिलै) मिलना कठिन है।
भावार्थः--आत्मा और परवस्तुओं के भेदविज्ञान को प्राप्त करने के लिये जिनदेव द्वारा प्ररूपित सच्चे तत्त्वों का पठन-पाठन (मनन) करना चाहिये और संशय, विपर्यय तथा अनध्यवसाय - इन सम्यग्ज्ञान के तीन दोषों को दूर करने के आत्मस्वरूप को जानना चाहिये। क्योंकि जिस प्रकार समुद्र में डूबा हुआ अमूल्य रत्न पुनः हाथ नहीं आता, उसी प्रकार मनुष्य शरीर, उत्तम श्रावककुल और जिनवचनों का श्रवण आदि सुयोग भी बीत जाने के बाद पुनः पुनः प्राप्त नहीं होते। इसलिये यह अपूर्व अवसर न गँवाकर आत्मस्वरूप की पहिचान (सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति) करके यह मनुष्य-जन्म सफल करना चाहिये।
१ संशयः- जो परस्पर विरुद्धतापूर्वक दो प्रकाररूप ज्ञान होता है, उसे संशय कहते हैं।
२ विपर्ययः - वस्तुस्वरूप से विरुद्धता पूर्वक ’यह ऐसा ही है’ - इस प्रकार एकरूप ज्ञान का नाम विपर्यय है। उसके तीन भेद हैं - करणविपर्यय, स्वरूपविपर्यय तथा भेदाभेद विपर्यय
३ अनध्यवसायः-- “कुछ है “- ऐसा निर्णय रहित विचार, सो अनध्यवसाय है ।
1 - क्या अज्ञानी जीव के कर्म सम्यक् ज्ञान के बिना नाश हो सकते हैं? (नहीं)
2 - अज्ञानी जीव का करोड़ों वर्षों तक किया गया तप क्या कहलाता है? (बाल तप)
3- सम्यग्ज्ञानी जीव तप करने के लिए किस की प्रवृत्ति को रोकता है? (मन-वचन-काय की)
4 - जीव ने 9वें ग्रैवेयक तक का पद कितनी बार पाया है? (अनन्त बार)
5 - हमें सम्यग्ज्ञान प्राप्त करने के लिए किस का अभ्यास करना चाहिए? (जिनेन्द्र भगवान द्वारा कहे गए परमार्थ तत्त्व का)
6 - हमें सम्यग्ज्ञान प्राप्त करने के लिए किस का त्याग करना चाहिए? (संशय, विभ्रम और मोह का)
7 - मनुष्य भव, उत्तम कुल और जिनवाणी का श्रवण किस योग से मिलता है? (सुयोग से)
8 - मनुष्य भव, उत्तम कुल और जिनवाणी की तुलना किस से की गई है? (सच्चे रत्न से)
9 - कोई रत्न समुद्र में खो जाने पर कैसे मिलता है? (कठिनाई से)
10 -मनुष्य भव एक बार छूट जाने पर पुनः कैसे मिलता है? (कठिनाई से)
11- क्या 9वें ग्रैवेयक में उत्पन्न होने से सम्यक् ज्ञान प्राप्त हो जाएगा? (नहीं)
12 - आत्मा का हित क्या आने से पहिले कर लेना चाहिए? (रोग व जरा दोनों के)
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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