छहढाला(38)

अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत

छहढाला(38)

 
सम्यक्चारित्र का समय और भेद तथा अहिंसाणुव्रत और

सत्याणुव्रत का लक्षण

सम्यग्ज्ञानी होय, बहुरि दिढ़ चारित लीजै;
एकदेश अरु सकलदेश, तसु भेद कहीजै ।
त्रसहिंसाको त्याग, वृथा थावर न सँहारै;
पर-वधकार कठोर निद्य नहिं वयन उचारै ॥ १० ॥
अन्वयार्थः- (सम्यग्ज्ञानी) सम्यग्ज्ञानी (होय) होकर(बहुरि) फिर (दिढ़) दृढ़ (चारित) सम्यक्चारित्र (लीजै) का पालन करना चाहिये; (तसु) उसके (उस सम्यक्चारित्र के) (एकदेश) एकदेश (अरु) और (सकलदेश) सर्वदेश (ऐसे दो) (भेद) भेद (कहीजै) कहे गये हैं। (उनमें) (त्रसहिंसा को) त्रस जीवों की हिंसा का (त्याग) त्याग करना और (वृथा) बिना कारण (थावर) स्थावर जीवों का (न सँहारै) घात न करना वअहिंसा-अणुव्रत कहलाता है (पर -वधकार) दूसरों को दुःखदायक (कठोर) कठोर और (निंद्य) निंदनीय (वयन) वचन (नहिं उच्चारै) न बोलना वह सत्य-अणुव्रत कहलाता है। भावार्थः--सम्यग्ज्ञान प्राप्त करके सम्यग्चारित्र प्रगट करना चाहिये। उस सम्यग्चारित्र के दो भेद हैं- (१) एकदेश (अणु, देश, स्थूल) चारित्र और (२) सर्वदेश (सकल, महा, सूक्ष्म) चारित्र। इनमें सकल चारित्र का पालन मुनिराज करते हैं और देश-चारित्र का पालन श्रावक करते हैं। इस चौथी ढाल में देशचारित्र कवर्णन किया गया है। सकलचारित्र का वर्णन छठीं ढाल में किया जायेगा। त्रस जीवों की संकल्पी हिंसा का सर्वथा त्याग करके निष्प्रयोजन स्थावर जीवों का घात न करना सो अहिंसा अणुव्रत है। दूसरे के प्राणों को घातक, कठोर तथा निंदनीय वचन न बोलना तथा दूसरों से न बुलवाना, न अनुमोदना सो सत्य-अणुव्रत है। टिप्पणीः-(१) अहिंसाणुव्रत का धारण करने वाला जीव “यह जीव घात करने योग्य है, मैं इसे मारूँ “--इस प्रकार संकल्प सहित किसी त्रस जीव की संकल्पी हिंसा नहीं करता; किन्तु इस व्रत का धारी आरम्भी, उद्योगिनी तथा विरोधिनी हिंसा का त्यागी नहीं होता।
(२) प्रमाद और कषाय में युक्त होने से जहाँ प्राणघात किया जाता है, वहीं हिंसा का दोष लगता है; जहाँ वैसा कारण नहीं है वहाँ प्राणघात होने पर भी हिंसा का दोष नहीं लगता। जिस प्रकार प्रमादरहित मुनि गमन करते हैं; वैद्य डॉक्टर करुणा बुद्धिपूर्वक रोगी का उपचार करते हैं; जहाँ सामने वाले का प्राणघात होने पर भी हिंसा का दोष नहीं है।
(३) निश्चय सम्यग्दर्शन - ज्ञानपूर्वक पहले दो कषायों का अभाव हुआ हो, उस जीव को सच्चे अणुव्रत होते हैं। जिसे निश्चय सम्यग्दर्शन न हो, उसके व्रत को सर्वज्ञ देव ने बालव्रत (अज्ञान व्रत) कहा है। 
1 - जीव को मोक्ष प्राप्त करने के लिए किसका ध्यान करना चाहिए? (आत्मा-परमात्मा का) 2 - सम्यक् चारित्र मोक्ष की कौन-सी सीढ़ी है? (द्वितीय) 3 -सम्यक् चारित्र के कितने भेद है? (2) 4- सम्यक् चारित्र के दो भेदों के नाम बताओ। (एकदेशचारित्र और सर्वदेशचारित्र) 5 - अणुव्रत कितने होते हैं? (5) 6 - पाँच अणुव्रतों के नाम बताओ। (अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) 7 - गुणव्रत कितने होते हैं? (3) 8 - तीन गुणव्रतों के नाम बताओ। (दिग्व्रत, देशव्रत, अनर्थदण्डव्रत) 9 - शिक्षाव्रत कितने होते हैं? (4)
10 - चार शिक्षाव्रतों के नाम बताओ। (सामायिक, प्रोषधोपवास, भोगोपभोगपरिमाण, अतिथिसंविभाग) 11 - अनर्थदण्ड के कितने भेद हैं? (5) 12 - अनर्थदण्ड के पाँच भेदों के नाम बताओ। (अपध्यान, पापोपदेश, प्रमादचर्या, हिंसादान, दुश्श्रुति) 13 - हिंसा के कितने भेद हैं? (4) 14 - हिंसा के चार भेदों के नाम बताओ। (संकल्पी, विरोधी, उद्योगी, आरम्भी) 15 - दूसरे के प्राणों के घातक, कठोर व निंद्यनीय वचन न बोलना, न बुलवाना और न अनुमोदना करना कौन-सा अणुव्रत है? (सत्य अणुव्रत) 16 - पाप व पुण्य कर्म कितने प्रकार से किया जा सकता है? (3) 17- पाप व पुण्य कर्म तीन प्रकार से किया जा सकता है, तो उनके नाम बताओ। (कृत, कारित, अनुमोदना)

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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