छहढाला(39)

अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत

छहढाला(39)

अचौर्याणुव्रत, ब्रह्मचर्याणुव्रत, परिग्रहपरिमाणाणुव्रत

तथा दिग्व्रत का लक्षण

जल-मृत्तिका बिन और नाहिं कछु गहै अदत्ता;

निज वनिता बिन सकल नारिसों रहै विरत्ता ।

अपनी शक्ति विचार, परिग्रह थोरो राखै;

दश दिश गमन प्रमाण ठान, तसु सीम न नाखै ॥ ११ ॥

अन्वयार्थः (जल-मृत्तिका बिन) पानी और मिट्टी के अतिरिक्त (और कछु) अन्य कोई वस्तु (अदत्ता) बिना दिये (नाहिं)नहीं (ग्रहे) लेना, उसे अचौर्याणुव्रत कहते हैं। (निज) अपनी (वनिता बिन) स्त्री के अतिरिक्त (सकल नारि सौं) अन्य सर्व स्त्रियों से (विरत्ता) विरक्त (रहे) रहना, वह ब्रह्मचर्याणुव्रत है। (अपनी) अपनी (शक्ति विचार) शक्ति का विचार करके (परिग्रह) परिग्रह (थोरो) मर्यादित (राखै) रखना, सो परिग्रहपरिमाणानुव्रत है। (दस दिश) दस दिशाओं में (गमन) जाने-आने की (प्रमाण) मर्यादा (ठान) रखकर (तसु) उस (सीम) सीमा का (न नाखै) उल्लंघन न करना, सो दिग्व्रत है।

भावार्थः--जन-समुदाय के लिये जहाँ रोक न हो तथा किसी विशेष व्यक्ति का स्वामित्व न हो- ऐसी पानी तथा मिट्टी जैसी वस्तु के अतिरिक्त परायी वस्तु (जिस पर अपना स्वामित्व न हो) उसके स्वामी के दिये बिना न लेना, तथा उठाकर दूसरे को न देना, उसे अचौर्याणुव्रत कहते हैं। अपनी विवाहित स्त्री के सिवा अन्य सर्व स्त्रियों से विरक्त रहना, सो ब्रह्मचर्याणुव्रत है। पुरुषको चाहिये कि अन्य स्त्रियों को माता, बहिन और पुत्री समान माने तथा स्त्री को चाहिये कि अपने स्वामी के अतिरिक्त अन्य पुरुषों को पिता, भाई तथा पुत्र समान समझे।

अपनी शक्ति और योग्यता का ध्यान रखकर जीवनपर्यन्त के लिये धन-धान्यादि बाह्य-परिग्रह का परिमाण (मर्यादा) बांधकर उससे अधिक की इच्छा न करे, उसे ’परिग्रहपरिमाणाणुव्रत कहते हैं।

टिप्पणी.--(१) यह पांच (अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और परिग्रहपरिमाण) अणुव्रत हैं। हिंसादिक को लोक में भी पाप माना जाता है; उनका इन व्रतों में एकदेश  (स्थूलरूपसे) त्याग किया गया है; इसी कारण वे अणुव्रत कहलाते हैं। दसों दिशाओं में जाने-आने की मर्यादा निश्चित करके जीवनपर्यन्त उसका उल्लंघन न करना सो दिग्व्रत है। दिशाओं की मर्यादा निश्चित की जाती है इसलिये उसे दिग्व्रत कहा जाता है।

देशव्रत (देशावगाशिक) नामक गुणव्रत का लक्षण

ताहूँमें फिर ग्राम गली, गृह बाग बाजारा;

गमनागमन प्रमाण ठान अन, सकल निवारा ॥ १२ ॥

अन्वयार्थः--(फिर) फिर (ताहूँमें) उसमें किन्हीं प्रसिद्ध- प्रसिद्ध (ग्राम) गाँव (गली) गली (गृह) मकान (बाग) उद्यान तथा (बाजारा) बाजार तक (गमनागमन) जाने-आने का (प्रमाण) माप (ठान) रखकर (अन) अन्य (सकल) सबका (निवारा) त्याग करना, उसे देशव्रत अथवा देशावगाशिक व्रत कहते हैं।

 भावार्थः-दिग्व्रत में जीवनपर्यन्त की गई जाने-आने के क्षेत्र की मर्यादा में भी (घड़ी घण्टा, दिन, महीना आदि काल के नियम से) किसी प्रसिद्ध ग्राम, मार्ग, मकान तथा बाजार तक जाने-आने की मर्यादा करके उससे आगे की सीमा में न जाना, सो देशव्रत कहलाता है। ११। (पूर्वार्द्ध)

1- दिशाओं की संख्या कितनी है? (10)

2 - दसों दिशाओं के नाम बताओ। (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, आग्नेय, र्नैऋत्य, वायव्य, ईषान, ऊर्ध्व, अधो)

3 - किसी वस्तु को बिना दिए ग्रहण न करना कौन-सा अणुव्रत है? (अचौर्याणुव्रत)

4 - स्वदारा-संतोष व्रत किस अणुव्रत के अन्तर्गत आता है? (ब्रह्मचर्य)

5 - मर्यादा में  परिग्रह रखना किस अणुव्रत के अन्तर्गत आता है? (परिग्रह-परिमाण)

6 - दसों दिशाओं में आने-जाने की मर्यादा रखना किस अणुव्रत के अन्तर्गत आता है? (दिग्व्रत)

7 - आने-जाने में घड़ी, घण्टा, दिन, महीने आदि की मर्यादा रखना किस अणुव्रत के अन्तर्गत आता है? (देशव्रत)

8 - कौन-सी वस्तु बिना दिए ग्रहण की जा सकती है? (जल-मिट्टी)

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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