छहढाला(42) पाँचवीं ढाल

अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत

छहढाला(42)

 पाँचवीं ढाल


भावनाओं के चिंतवन का कारण, उसके अधिकारी और उसका फल

मुनि सकलव्रती बड़भागी भव-भोगन तें वैरागी;

वैराग्य उपावन माई, चिन्तैं अनुप्रेक्षा भाई ॥१॥

अन्वयार्थ - (भाई) हे भव्य जीव! (सकलव्रती) महाव्रतों के धारक (मुनि) भावलिंगी मुनिराज (बड़भागी) महान

पुरूषार्थी हैं, क्योंकि वे (भव-भोगनतैं) संसार और भोगों से (वैरागी) विरक्त होते हैं और (वैराग्य) वीतरागता को (उपावन) उत्पन्न करने के लिये (माई) माता समान (अनुप्रेक्षा) बारह भावनाओं का (चिन्तैं) चिंतवन करते हैं।

भावार्थ - पाँच महाव्रतों को धारण करने वाले भावलिंगी मुनिराज महापुरूषार्थवान हैं, क्योंकि वे संसार, शरीर और भोगों से अत्यन्त विरक्त होते हैं और जिस प्रकार कोई माता पुत्र को जन्म देती है, उसी प्रकार यह बारह भावनाएँ वैराग्य उत्पन्न करती हैं; इसलिये मुनिराज इन बारह भावनाओं का चिंतन करते हैं।

भावनाओं का फल और मोक्षसुख की प्राप्ति का समय

इन चिन्तत सम सुख जागै, जिमि ज्वलन पवन के लागै;

जब ही जिय आतम जानै, तब ही जिय शिवसुख ठानै ॥ २ ॥

अन्वयार्थः—(जिमि) जिस प्रकार (पवनके ) वायु के (लागै) लगने से (ज्वलन) अग्नि (जागै) भभक उठती है,  उसी प्रकार इन बारह भावनाओं का (चितत) चिंतवन करने से (सम सुख) समतारूपी सुख (जागै) प्रगट होता है। (जब ही ) जब (जिय) जीव (आतम) आत्मस्वरूप को (जानै) जानता है (तब ही) तभी (जीव) जीव (शिवसुख) मोक्षसुखको (ठानै) प्राप्त करता है ।

भावार्थः— जिस प्रकार वायु लगने से अग्नि एकदम भभक उठती है, उसी प्रकार इन बारह भावनाओं का बारंबार चिंतवन करने से समता ( शांति ) रूपी सुख प्रगट हो जाता है—बढ़ जाता है । जब यह जीव आत्मस्वरूप को जानता है, तब पुरुषार्थ बढ़ाकर परपदार्थों से सम्बन्ध छोड़कर परमानन्दमय स्वरूप में लीन होकर समतारस का पान करता है और अंत में मोक्षसुख प्राप्त करता है ॥ २ ॥

[उन बारह भावनाओंका स्वरूप कहा जाता है ]

१ — अनित्य भावना

जोबन गृह गो धन नारी, हय गय जन आज्ञाकारी;

इन्द्रिय-भोग छिन थाई, सुरधनु चपला चपलाई ॥ ३ ॥

अन्वयार्थः — ( जोबन ) यौवन, (गृह) मकान, (गो) गाय-भैंस, (धन) लक्ष्मी, ( नारी ) स्त्री, ( हय ) घोड़ा, ( गय ) हाथी, (जन) कुटुम्ब, ( आज्ञाकारी ) नौकर-चाकर तथा (इन्द्रिय-भोग) पाँच इन्द्रियों के भोग—यह सब (सुरधनु ) इन्द्रधनुष तथा ( चपला ) बिजली की (चपलाई ) चंचलता—क्षणिकता की भाँति (छिन थाई) क्षणमात्र रहने वाले हैं ।

भावार्थः—यौवन, मकान, गाय-भैंस, धन-सम्पत्ति, स्त्री, घोड़ा-हाथी, कुटुम्बीजन, नौकर-चाकर तथा पांच इन्द्रियों के विषय—यह सर्व वस्तुएँ क्षणिक हैं — अनित्य हैं — नाशवान हैं । जिस प्रकार इन्द्रधनुष और बिजली देखते ही देखते विलीन हो जाते हैं, उसीप्रकार यह यौवनादि कुछ ही काल में नाश को प्राप्त होते हैं; वे कोई पदार्थ नित्य और स्थायी नहीं हैं; किन्तु निज शुद्धात्मा ही नित्य और स्थायी है ।

ऐसा स्वोन्मुखतापूर्वक चिंतवन करके, सम्यग्दृष्टि जीव वीतरागता की वृद्धि करता है वह "अनित्य भावना" है । मिथ्यादृष्टि जीवको अनित्यादि एक भी भावना यथार्थ नहीं होती ॥३॥

1  - महाव्रतों के धारक मुनिराज कैसे भाग्य वाले होते हैं? (बड़भागी)

2- जिस प्रकार माता पुत्र को जन्म देती है, उसी प्रकार बारह भावनाएँ किस को जन्म देती हैं? (वैराग्य को)

3 - हमें मोक्ष प्राप्त करने के लिए कितनी भावनाओं का चिंतन करना चाहिए? (बारह भावनाओं का)

4 - जैसे वायु के वेग से अग्नि भभक उठती है, वैसे ही बारह भावनाओं के चिंतन से क्या प्रदीप्त हो उठता है?            (समता रूपी सुख)

5 - जीव आत्म स्वरूप को जानने से क्या प्राप्त करता है? (मोक्ष सुख)

6 - इन्द्रधनुष तथा बिजली के समान क्या अस्थाई हैं? (यौवन, मकान, गाय-भैंस, धन-सम्पत्ति, स्त्री, घोड़ा-हाथी, कुटुम्बीजन, नौकर-चाकर तथा पांच इन्द्रियों के विषय)

7 - अस्थाईपने की वस्तुओं का चिंतन करना कौन-सी भावना है? (अनित्य भावना)


।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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