छहढाला (44)

 

अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत

छहढाला(44)


५-अन्यत्व भावना

जल-पय ज्यों जिय-तन मेला, पै भिन्न-भिन्न नहिं भेला;

तो प्रगट जुदे धन धामा, क्यों है इक मिलि सुत रामा ।।७।।

अन्वयार्थ - (जिय-तन) जीव और शरीर (जल-पय ज्यों) पानी और दूध की भांति (मेला) मिले हुए हैं (पैं) तथापि (भेला) एकरूप (नहिं) नहीं हैं, (भिन्न-भिन्न) पृथक्-पृथक् हैं, (तो) तो फिर (प्रगट) जो बाह्य में प्रगटरूप से (जुदे) पृथक् दिखाई देते हैं। ऐसे (धन) लक्ष्मी, (धामा) मकान, (सुत) पुत्र और (रामा) स्त्री आदि (मिलि) मिलकर (इक) एक (क्यों) कैसे (ह्वै) हो सकते हैं? 

भावार्थ-- जिस प्रकार दूध और पानी एक आकाश-क्षेत्र में मिले हुए हैं, परन्तु अपने अपने गुण आदि की अपेक्षा से दोनों बिल्कुल भिन्न-भिन्न हैं; उसी प्रकार यह जीव और शरीर भी मिले हुए- एकाकार दिखाई देते हैं, तथापि वे दोनों अपने अपने स्वरूप आदि की अपेक्षा से (स्वद्रव्य क्षेत्र-काल-भाव से ) बिल्कुल पृथक् पृथक् हैं, तो फिर प्रगटरूप से भिन्न दिखाई देने वाले ऐसे मोटर गाडी, धन, मकान, बाग, पुत्र, पुत्री, स्त्री आदि अपने साथ कैसे एक हो सकते हैं? अर्थात् स्त्री पुत्र आदि कोई भी परवस्तु अपनी नहीं है - इस प्रकार सर्व पदार्थों को अपने से भिन्न जानकर स्वसन्मुखतापूर्वक सम्यग्दृष्टि जीव वीतरागता की वृद्धि करता है, वह “अन्यत्व भावना” है ॥ ७ ॥

६-अशुचि भावना

पल रुधिर राध मल थैली, कीकस वसादि मैली,

नव द्वार बहैं घिनकारी, अस देह करें किम यारी ॥ ८ ॥

 अन्वयार्थ-- जो (पल) मांस (रुधिर) रक्त (राध) पीव और (मल) विष्ठा की (थैली) थैली है, (कीकस) हड्डी,

(वसादितैं) चरबी आदि से (मैली) अपवित्र है और जिसमें (घिनकारी) घृणा-ग्लानि उत्पन्न करने वाले (नव द्वार) नौ

दरवाजे (बहैं) बहते हैं (अस) ऐसे (देह) शरीर में (यारी) प्रेम-राग (किमि) कैसे (करै) किया जा सकता है?

भावार्थ--यह शरीर तो मांस, रक्त, पीव, विष्ठा आदि की थैली है और वह हड्डियों, चरबी आदि से भरा होने के कारण अपवित्र है; तथा नौ द्वारों से मैल बाहर निकलता है, ऐसे शरीर के प्रति मोह-राग कैसे किया जा सकता है? यह शरीर ऊपर से तो मक्खी के पंख समान पतली चमड़ी में मढ़ा हुआ है इसलिये बाहर से सुन्दर लगता है, किन्तु यदि उसकी भीतरी हालत का विचार किया जाये, तो उसमें अपवित्र वस्तुएँ भरी हैं, इसलिये उसमें ममत्व, अहंकार या राग करना व्यर्थ है ।

यहाँ शरीर को मलिन बतलाने का आशय- भेदज्ञान द्वारा शरीर के स्वरूप का ज्ञान कराके, अविनाशी निज पवित्र पद में रुचि कराना है, किन्तु शरीर के प्रति द्वेषभाव उत्पन्न कराने का आशय नहीं। शरीर तो उसके अपने स्वभाव से ही अशुचिमय है; और यह भगवान आत्मा निजस्वभाव से ही शुद्ध एवं सदा शुचिमय पवित्र चैतन्य पदार्थ है। इसलिये सम्यग्दृष्टि जीव अपने शुद्ध आत्मा की सन्मुखता द्वारा अपनी पर्याय में शुचिता की (पवित्रता की) वृद्धि करता है, वह ‘अशुचि भावना’ है ॥८॥

1 - जीव और शरीर कैसे मिले हुए दिखाई देते हैं? (पानी और दूध की भांति)

2 - जीव और शरीर बाह्य रूप से कैसे दिखाई देते हैं? (एकसाथ मिले हुए)

3 - जीव और शरीर वास्तव में मिले हुए हैं या पृथक्-पृथक्? (पृथक्-पृथक्)

4 - धन, धाम, सुत और स्त्री जीव से अलग हैं या मिले हुए? (अलग हैं)

5 - पर वस्तु को स्वयं से पृथक् समझना कौन-सी भावना है? (अन्यत्व भावना)

6 - शरीर में निकासी के कितने द्वार हैं? (9-नव)

7 - शरीर की थैली में क्या-क्या भरा है? (मांस, रक्त, पीव, विष्ठा आदि)

8 - शरीर की थैली को कैसी बताया गया है? (मल की थैली)

9 - शरीर को पवित्र बताया गया है या अपवित्र? (अपवित्र)

10 - शरीर से मोह करना हेय है या उपादेय? (हेय)

11 - शरीर को अपवित्र समझना कौन-सी भावना है? (अशुचि भावना)

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।

धन्यवाद

Comments

Popular posts from this blog

बालक और राजा का धैर्य

सती कुसुम श्री (भाग - 11)

चौबोली रानी (भाग - 24)

सती नर्मदा सुंदरी की कहानी (भाग - 2)

हम अपने बारे में दूसरे व्यक्ति की नैगेटिव सोच को पोजिटिव सोच में कैसे बदल सकते हैं?

मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 18 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश

जैन धर्म के 24 तीर्थंकर व उनके चिह्न

बारह भावना (1 - अथिर भावना)

रानी पद्मावती की कहानी (भाग - 4)

चौबोली रानी (भाग - 28)