छहढाला(46)
अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत
छहढाला(46)
९--निर्जरा भावना
निज काल पाय विधि झरना, तासों निज काज न सरनाय तप करि जो कर्म खिपार्वै, सोई शिवसुख दरसार्वै ॥११॥
अन्वयार्थ --जो (निज काल) अपनी-अपनी स्थिति (पाय) पूर्ण होने पर (विधि) कर्म (झरना) खिर जाते हैं, (तासों) उससे (निज काज) जीव का धर्मरूपी कार्य (न सरना) नहीं होता, किन्तु (जो) निर्जरा, (तप करि) आत्मा के शुद्ध प्ररूपण द्वारा (कर्म) कर्मों का (खिपार्वै) नाश करती है, वह अविपाक अथवा सकाम निर्जरा है। (सोई) वह (शिवसुख) मोक्ष का सुख (दरसार्वै) दिखलाती है।
भावार्थ- अपनी-अपनी स्थिति पूर्ण होने पर कर्मों का खिर जाना तो प्रति समय अज्ञानी को भी होता है, वह कहीं शुद्धि का कारण नहीं होता। परन्तु सम्यग्दर्शन--ज्ञान--चारित्र द्वारा अर्थात् आत्मा के शुद्ध प्ररूपण द्वारा जो कर्म खिर जाते हैं, वह अविपाक अथवा सकाम निर्जरा कहलाती है। तदनुसार शुद्धि की वृद्धि होते होते सम्पूर्ण निर्जरा होती है। तब जीव शिवसुख (सुख की पूर्णतारूप मोक्ष) प्राप्त करता है। ऐसा जानता हुआ सम्यग्दृष्टि जीव स्वद्रव्य के आलम्बन द्वारा जो शुद्धि की वृद्धि करता है, वह "निर्जरा भावना" है ॥ ११ ॥
१०- लोक भावना
किनहू न करौ न धरै को, षडद्रव्यमयी न हरै को;
सो लोकमाँहि बिन समता, दुख सहै जीव नित भ्रमता ॥ १२ ॥
अन्वयार्थ:- -- इस लोक को (किनहू) किसी ने (न करौ) बनाया नहीं है; (को) किसी ने (न धरै) टिका नहीं रखा है; (को) कोई (न हरै) नाश नहीं कर सकता; और यह लोक (षडद्रव्यमयी) छह प्रकार के द्रव्यस्वरूप है—छह द्रव्यों से परिपूर्ण है (सो) ऐसे (लोकमाँहि) लोक में (बिन समता) वीतरागी समता बिना (नित) सदैव (भ्रमता) भटकता हुआ (जीव)जीव (दुःख सहै) दुःख सहन करता है।
भावार्थ:- -- ब्रह्मा आदि किसी ने इस लोक को बनाया नहीं है; विष्णु या शेषनाग आदि किसी ने इसे टिका नहीं रखा है तथा महादेव आदि किसी से यह नष्ट नहीं होता; किन्तु यह छह द्रव्यमय लोक स्वयं से ही अनादि-अनन्त है; छहों द्रव्य नित्य स्व-स्वरूप में स्थित रहकर निरन्तर अपनी नई-नई पर्यायों (अवस्थाओं) से उत्पाद-व्ययरूप परिणमन करते रहते हैं। एक द्रव्य में दूसरे द्रव्य का अधिकार नहीं है, यह छह द्रव्यस्वरूप लोक वह मेरा स्वरूप नहीं है, वह मुझसे त्रिकाल भिन्न है, मैं उससे भिन्न हूँ; मेरा शाश्वत चैतन्य-लोक ही मेरा स्वरूप है - ऐसा धर्मी जीव विचार करता है और स्वोन्मुखता द्वारा विषमता मिटा कर, साम्यभाव और वीतरागता बढ़ाने का अभ्यास करता है, यह ‘लोक भावना’ है ।।१२।।1 - अपना काल पूरा होने पर जो कर्म स्वयं झर जाते हैं, उसे कैसी निर्जरा कहते हैं? (अविपाक निर्जरा)
2 - जो कर्म तप करने से झरते हैं, उसे कैसी निर्जरा कहते हैं? (सविपाक निर्जरा)
3 - सविपाक निर्जरा से क्या प्राप्त होता है? (शिवसुख)
4 - अपना काल पूरा होने पर किसके कर्म स्वयं झर जाते हैं? (अज्ञानी के)
5- इस लोक को किसने बनाया है? (किसी ने नहीं)
6 - यह लोक किस पर टिका हुआ है? (किसी पर नहीं)
7 - क्या कोई इस लोक का नाश कर सकता है? (नहीं)
8 - यह लोक कितने द्रव्यों से परिपूर्ण है? (छह)
9 - क्या एक द्रव्य में दूसरे द्रव्य का अधिकार है? (नहीं)
10 - मैं इस 6 द्रव्यों से भरे हुए लोक के स्वरूप से भिन्न हूँ, इस भावना को क्या कहते हैं? (लोक भावना)
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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